नीतीश कुमार को उपराष्ट्रपति बनाने की चर्चा बिहार की सियासत में गर्म है, खासकर जगदीप धनखड़ के इस्तीफे के बाद। कुछ बीजेपी नेताओं, जैसे हरिभूषण ठाकुर बचौल, ने इसका समर्थन किया है, यह कहते हुए कि नीतीश की साफ छवि और अनुभव बिहार और देश के लिए फायदेमंद होगा। लेकिन इस सुझाव को “अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारना” क्यों कहा जा रहा है?
नीतीश की सियासी ताकत: नीतीश कुमार बिहार में जेडीयू के प्रमुख चेहरा हैं और एनडीए के लिए महत्वपूर्ण हैं। उन्हें उपराष्ट्रपति बनाकर दिल्ली भेजने से बीजेपी बिहार में अपनी पकड़ मजबूत करना चाह सकती है, लेकिन यह कदम जोखिम भरा हो सकता है। नीतीश का बिहार में मजबूत जनाधार और क्षेत्रीय प्रभाव है। उनकी अनुपस्थिति में जेडीयू कमजोर पड़ सकती है, जिससे बीजेपी को 2025 के विधानसभा चुनाव में नुकसान हो सकता है।
विपक्ष का दावा: विपक्ष, खासकर आरजेडी और कांग्रेस, इसे बीजेपी की रणनीति के रूप में देख रहे हैं, जिससे नीतीश को बिहार की सक्रिय राजनीति से हटाया जा सके। तेजस्वी यादव ने कहा है कि नीतीश के साथ भी वही हो सकता है जो धनखड़ के साथ हुआ। यह बीजेपी के लिए जोखिम भरा हो सकता है, क्योंकि नीतीश के बिना एनडीए का गठबंधन कमजोर हो सकता है।
जेडीयू-बीजेपी गठबंधन: नीतीश ने हाल ही में बीजेपी के साथ स्थायी गठबंधन की प्रतिबद्धता जताई है। अगर बीजेपी उन्हें उपराष्ट्रपति बनाने की कोशिश करती है, तो यह गठबंधन में तनाव पैदा कर सकता है, क्योंकि जेडीयू के कार्यकर्ता इसे नीतीश को “साइडलाइन” करने की चाल मान सकते हैं।
सियासी अटकलें: कुछ का मानना है कि बीजेपी नीतीश के बेटे निशांत को उपमुख्यमंत्री बनाकर जेडीयू को अपने साथ रखना चाहती है। लेकिन यह रणनीति उलटी पड़ सकती है, क्योंकि नीतीश का व्यक्तिगत प्रभाव निशांत के पास नहीं है, और इससे जेडीयू का आधार खिसक सकता है।
निष्कर्ष: नीतीश को उपराष्ट्रपति बनाना बीजेपी के लिए फायदेमंद हो सकता है, अगर वे बिहार में अपना मुख्यमंत्री लाना चाहते हैं। लेकिन नीतीश की सियासी ताकत और जेडीयू की क्षेत्रीय अहमियत को देखते हुए, यह कदम गठबंधन को कमजोर कर सकता है और विपक्ष को मजबूत करने का मौका दे सकता है। यह वाकई “पैर पर कुल्हाड़ी मारने” जैसा हो सकता है, अगर बीजेपी की रणनीति ठीक से काम न करे।