JNU (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय) को लेफ्ट का किला कहा जाता है, क्योंकि यहां 50 साल से ज्यादा समय से छात्र राजनीति पर वामपंथी संगठनों का दबदबा बना हुआ है। 1971 में पहली JNUSU (जेएनयू स्टूडेंट्स यूनियन) चुनाव से लेकर 2025 के हालिया चुनाव तक, जहां अदिति मिश्रा को प्रेसिडेंट चुना गया, यह किला दरकने का नाम नहीं लेता। ओ.एन. शुक्ला से अदिति मिश्रा तक की यह कहानी न सिर्फ ऐतिहासिक घटनाओं की है, बल्कि विचारधारा, छात्र संस्कृति और सामाजिक न्याय की लड़ाई की भी।
ओ.एन. शुक्ला का दौर (1971) – बिना संगठन के हुई थी जीत
JNU की स्थापना 1969 में हुई, जब देश में भाषाई आंदोलन, नक्सलवाद और इमरजेंसी जैसी उथल-पुथल मची थी। पहला बैच इंटरनेशनल स्टडीज (SIS) और रूसी स्टडीज का था, जहां प्रोफेसरों में अमेरिकी प्रभाव वाले और सोवियत समर्थक दोनों थे। 30 नवंबर 1971 को पहला JNUSU चुनाव हुआ। कोई संगठित पार्टी नहीं थी – ओ.एन. शुक्ला, एक SIS रिसर्चर और ब्राह्मण पृष्ठभूमि के स्वतंत्र उम्मीदवार, प्रेसिडेंट बने। यह जीत व्यक्तिगत थी, लेकिन JNU के संविधान ने ही लेफ्ट की नींव रखी: छात्रों को राष्ट्रीय विकास में भागीदार बनाने, यूनिवर्सिटी की लोकतांत्रिक करण और सामाजिक आंदोलनों से जोड़ने का जोर। यह संविधान छात्रों ने खुद लिखा, जो लेफ्ट की मांगों से मेल खाता था।
लेफ्ट का उदय : एसएफआई और गठबंधन (1972-80)
दूसरा चुनाव 1972 में हुआ, जहां वी.सी. कोशी (SFI के उम्मीदवार) प्रेसिडेंट बने। SFI (CPI(M) की छात्र इकाई) ने SIS यूनियन को अपने साथ मिला लिया, जिसका नेतृत्व प्रकाश करात (बाद में CPI(M) महासचिव) ने किया। प्रगतिशील डेमोक्रेटिक फ्रंट (PDF) गठबंधन बना – SFI, AISF (CPI की इकाई) और अन्य। 1973 में ‘फ्री थिंकर्स’ ग्रुप ने लेफ्ट की आलोचना की, लेकिन आंतरिक बहस ही रही।
विचारधारा का मेल: JNU के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज (SSS) में रैडिकल प्रोफेसर (जैसे बिपन चंद्रा) आए, जो मार्क्सवाद पढ़ाते। छात्र-शिक्षक रिश्ता गहरा था।
चुनावी तंत्र: डायरेक्ट प्रेसिडेंशियल सिस्टम ने लेफ्ट लीडर्स को चेहरा दिया।
कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं: ABVP जैसी दक्षिणपंथी ताकतें कमजोर रहीं, क्योंकि छात्र परिपक्व थे और सांप्रदायिकता से दूर।
1974-2008 और 2012-2017 तक SFI ने 22 बार, AISF ने 11 बार प्रेसिडेंसी जीती। 1980-90 में नक्सली प्रभाव बढ़ा, लेकिन लेफ्ट ने किसान-मजदूर मुद्दों पर फोकस रखा।
चुनौतियां: ABVP का उभार और लेफ्ट की एकता (2000-2020)
2000 और 1991 में ABVP जीती, लेकिन 2019 के CAA विरोध और 2020 की फीस हाइक के बाद लेफ्ट ने वापसी की। मोदी सरकार के दौर में JNU को ‘एंटी-नेशनल’ कहा गया, लेकिन यह उल्टा पड़ा – छात्रों में एकजुटता बढ़ी। लेफ्ट की आलोचना हुई कि वे ‘फार-लेफ्ट’ हैं, लेकिन वे मुद्दों (फीस, हॉस्टल, आरक्षण) पर सक्रिय रहे। BAPSA (दलित-बहुजन) जैसे ग्रुप उभरे, लेकिन लेफ्ट ने गठबंधन बनाए।
अदिति मिश्रा का दौर: 2025 की जीत और लेफ्ट यूनिटी
6 नवंबर 2025 को JNUSU चुनाव में लेफ्ट यूनिटी (AISA, SFI, AISF, DSF) ने सभी चार पद जीते। अदिति मिश्रा (AISA, CCPPT की पीएचडी स्कॉलर, वाराणसी से) पहली महिला प्रेसिडेंट बनीं (2019 के बाद) – 1,861 वोट से ABVP के विकास पटेल को हराया। गोपिका बाबू वाइस प्रेसिडेंट, सुनील यादव जनरल सेक्रेटरी और दानिश अली जॉइंट सेक्रेटरी बने। वोटर टर्नआउट 67% रहा। यह जीत कैंपस जस्टिस, फीस हाइक विरोध और समावेशिता पर केंद्रित थी। ABVP एक पद भी नहीं जीत सकी।
क्यों नहीं दरकता लेफ्ट का किला?
एकता और अनुकूलन: लेफ्ट यूनिटी ने आंतरिक विभाजन (SFI vs AISA) को संभाला। बाहरी हमलों (जैसे 2020 हमला) ने एकजुट किया।
कोई मजबूत विकल्प: ABVP/NSUI मुद्दों से दूर लगते हैं; लेफ्ट की विचारधारा कैंपस की विविधता (दलित, मुस्लिम, महिलाएं) को समाहित करती है।
ऐतिहासिक जड़ें: प्रारंभिक लीडर्स (करात, कोशी) से लेकर आज (मिश्रा) तक, लेफ्ट ने कैंपस को ‘रेड’ बनाए रखा – एलीटिज्म की आलोचना झेलते हुए भी।

