अफ्रीकी राजा ओबाटाला के समय की यह कहानी-
तीन लोग एक युवक को अपने साथ घसीटते हुए राजा के पास आए और उनसे कहा, “हे राजन! इस आदमी ने हमारे पिता की हत्या कर दी है।”
ओबाटाला- “तुमने उनके पिता को क्यों मारा?
जवान- “मैं चरवाहा हूँ। मेरी बकरी इनके पिता के खेत में चरने चली गई थी। इनके पिता ने मेरी बकरी को पत्थर से मारा और वह मर गई। इसलिए मैंने भी वही पत्थर लेकर इनके पिता को मारा और वह मर गए।”
ओबाटाला- “इस घटना की वजह से मैं तुम्हें हत्या के आरोप में मौत की सजा सुनाता हूँ।”
जवान- “मैं आपके फैसले को स्वीकार करता हूँ, पर मेरी आपसे एक विनती है। मैं सजा पाने से पहले 3 दिन का समय मांगता हूँ। मेरे दिवंगत पिता ने कुछ संपत्ति छोडी और मेरी एक बहन है जिसके गुजर बसर की मैं व्यवस्था करना चाहता हूँ। यदि आप मुझे अभी मौत की सजा दे दोगे तो मेरे धन और मेरी बहन का कोई संरक्षक नहीं होगा।”
ओबाटाला- “तुम्हारी जमानत कौन देगा?”
जवान ने भीड़ को देखते हुए लमुरुडु की ओर इशारा किया।
ओबाटाला- “क्या आप इसकी जमानत देने के लिए सहमत हैं, लमुरुडु?”
लमुरुडु- “बीनी (हाँ)।”
ओबाटाला- “आप किसी ऐसे व्यक्ति की जमानत देने के लिए सहमत हैं, जिसे आप जानते तक नही हैं और यदि वह वापस नहीं आता है तो आपको उसका दंड मिलेगा।”
लमुरुडु- “मैं स्वीकार करता हूँ।”
वह जवान चला गया, परन्तु दो दिन के बाद और तीसरे दिन तक उसका कोई पता न चला।
लमुरुडु के लिए हर कोई चिंतित था जिसने उस आदमी के वापस नहीं लौटने की स्थिति में उसकी मौत की सजा को स्वीकार कर लिया था।
अचानक रात के खाने के समय से ठीक पहले, जवान चरवाहा राजा ओबाटाला के सामने पेश हो गया।
जवान-“मैंने अपनी संपत्ति और बहन की परवरिश अपने चाचा को सौंप दी है और मैं दंड स्वीकार करने के लिए वापस आ गया हूँ। आप अब मुझे दंड दे सकते हैं।”
ओबाटाला ने बड़े आश्चर्य से पूछा, “मौत की सजा से बचने का मौका पाकर भी तुम वापस क्यों आए?”
जवान-“मैं तो बच जाता, पर मुझे डर था, ऐसा करने से यह संदेश जाएगा कि मानवता ने दयाभाव और अपने वचन को पूरा करने की काबिलियत खो दी है।”
ओबाटाला ने मुड़कर लमुरुडु की ओर देखा और उससे पूछा, “और तुम उसके लिए जमानत देने के लिए क्यों खड़े हुए?”
लमुरुडु- “मुझे डर था कि ऐसा नहीं करने से लगेगा कि मानवता ने दूसरों का भला करने की इच्छा खो दी है।”
इन शब्दों और घटनाओं ने शिकायतकर्ता भाइयों को बहुत प्रभावित किया जो अपने पिता की मृत्यु के लिए न्याय चाहते थे और उन्होंने जवान चरवाहे को माफ करने का फैसला किया।
ओबाटाला ने आवेश में पूछा, “क्यों?”
उन्होंने कहा, “हमें डर हैं कि कहीं ऐसा नहीं लगे जैसे मानवता के दिल में क्षमा का भाव खो गया है।”
दोस्तों हम में से हरेक की सच्चाई के बारे में अपनी-अपनी धारणा होती है। सच एक ही है, इंसानियत। इसे अलग-अलग व्यक्तियों द्वारा अलग-अलग तरीके से समझा और व्यक्त किया जाता है। यह आपसी विश्वास से पोषित होती है।
मानवता एक दूसरे के प्रति प्रेम और करुणा का प्रतीक है।
मानवता, न्याय से इस मायने में भिन्न है कि न्याय में पाई जाने वाली निष्पक्षता की तुलना में मानवता में शामिल परोपकारिता का भाव अधिक होता है।
अर्थात् ‘मानवता, प्रेम, परोपकारिता और ‘सामाजिक बुद्धिमत्ता के कार्य’ आम तौर पर व्यक्तिगत कारक हैं जबकि ‘निष्पक्षता’ आम तौर पर सर्व कारक है।








