मैं आंखें मलती हूं ऐनक का शीशा साफ़ करती हूं
मुझे दिखाई देते हैं ज़मीन आसमान ख़ला में डोर पट्टे तौक़ नकेल बुलकी
मैं मुसलसल कुछ खोज रही हूं
मेरे हाथ लगते हैं तमगे मेडल स्टैंप फीते
दरवाज़े खिड़की कब्ज़े से जुड़े हुए हैं
आंधी तूफान में ये गिरते हैं
मख़लूक़ फिर से दरवाज़े खिड़की कब्ज़े से जोड़ने पर लग जाती है
मैं मस्जिद से बाहर आती ध्वनि को सुन रही हूं
मंदिर की घंटी बज रही है
फर्ज़ी ख़ुदा अपनी ताक़त और ज़ोरा दिखा रहा है
मैं पाक़ पवित्र आवाज़ का राजनीतिकरण हथियारीकरण होते देख रही हूं
ख़ला में भी आज़ादी नहीं दिखती
ख़ुदा के पास चुंबक है बाज़ार में एक चुंबक है
लिपि भाषा मनुष्यता नैतिकता विवेक नागरिक बोध सब चिपके हुए हैं
मेरी तलाश ज़ारी है
जादूगर अपना जौहर बिखेर रहे हैं
वे सांप को रस्सी बनाकर दिखा रहे हैं पत्थर को नगीना
मख़लूक़ अमृत समझकर ज़हर पी रही है
सम्मोहन विद्या भ्रम झूठ प्रोपेगेंडा सच पर ग़ालिब है
सांसे भी क़ैद हैं
बाज़ार में पैसा फेंक कर मिल रही हैं
दम घुट रहा है
मौत भी संलग्न हैं कहीं न कहीं
कितने हज़ार के बिस्तर ज़मीन टायर वेंटीलेटर के ऊपर नीचे मरना है
ये निर्णय भी फाइल में नत्थी है
मैं देख रही हूं कुछ हाथ जो ढपली बजा रहे हैं
कुछ चेहरे जो आज़ादी आज़ादी चिल्ला रहे हैं
मैं देख रही हूं ढपली वाले हाथों में हथकड़ी चेहरों पर स्याही पुती हुई
आज़ादी को तलाश करती हुई
मैं हर बार यहीं अपनी इंद्रियों को स्थिर करती हूं !!
मेहजबीं








