हमे परीक्षा नहीं, शिक्षा और रोजगार चाहिए

राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) के प्रश्नपत्र पहले ही पता चल जाने के विवाद का अंत होता नहीं दिख रहा है। इसके ऊपर, केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सी.बी.एस.ई) की ऑन-स्क्रीन मार्किंग (ओ एम एस) प्रणाली भी समस्याओं में घिर गई, और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एन टी ए), जो पहले ही नीट पेपर लीक के कारण बदनाम हो चुका था, द्वारा आयोजित कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (सी.यू.ई.टी.) तकनीकी समस्याओं के चलते 3,765 अभ्यर्थियों के लिए दोबारा आयोजित करना पड़ा। विद्यार्थी इन बड़े पैमाने पर आयोजित होने वाली परीक्षाओं के संचालन में सरकारी संस्थाओं पर से भरोसा खोते जा रहे हैं। उपरोक्त उदाहरण तो केवल जिनका खुलाया हो गया वह का एक छोटा-सा हिस्सा हैं। भारतीय शिक्षा व्यवस्था गम्भीर रूप से संकट-ग्रस्त है। नकल, अनुचित साधनों का प्रयोग, साहित्यिक चोरी, भाई-भतीजावाद आदि व्यापक रूप से विद्यमान हैं, क्योंकि हमने शिक्षा की प्रक्रिया से अधिक महत्व परीक्षा में प्राप्त अंकों को देना शुरू कर दिया है। भारत में शिक्षा एक दिखावा बनकर रह गई है इसलिए इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि परीक्षा में धंाधली होती है।
यदि हम शिक्षा को सीखने की एक प्रक्रिया मानते हैं, तो उसी को सबसे अधिक महत्व दिया जाना चाहिए। जो शिक्षक किसी विषय को छात्र को पढ़ाता है, वही छात्र की उपलब्धि का सबसे अच्छा मूल्यांकन कर सकता है। इसलिए शिक्षक द्वारा छात्र के सीखने के स्तर का गुणात्मक वर्णन करने वाला प्रमाणपत्र मूल्यांकन के लिए पर्याप्त माना जाना चाहिए। प्रारम्भिक से लेकर स्नातकोत्तर स्तर तक शिक्षा की प्रक्रिया में परीक्षाओं को पूरी तरह समाप्त किया जा सकता है।
जब छात्र अपनी विद्यालयी शिक्षा पूरी कर उच्च शिक्षा कार्यक्रम में प्रवेश लेना चाहता है, तब भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त समान अवसर के अधिकार के तहत प्रत्येक छात्र को वह विषय पढ़ने का अवसर मिलना चाहिए जिसे वह पढ़ना चाहता है। उदाहरण के लिए, चिकित्सा शिक्षा प्राप्त करने के इच्छुक सभी विद्यार्थियों को चिकित्सा शिक्षा कार्यक्रम में प्रवेश का अवसर मिलना चाहिए। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह इतने संस्थान या विभिन्न संस्थानों में इतनी जगहें उपलब्ध कराए कि सभी इच्छुक विद्यार्थियों को समायोजित किया जा सके। प्रधान मंत्री भी शिक्षा से ज्यादा परीक्षा को ही महत्व देते हैं इसीलिए परीक्षा पर चर्चा कराते हैं। देश की खस्ताहाल शिक्षा व्यवस्था और बार-बार परीक्षा के पर्चे समय से पहले उजागर हो जाने की जिम्मेदारी लेते हुए प्रधान मंत्री को इस्तीफा देना चाहिए। यदि वे परीक्षा निष्पक्ष तरीके से नहीं करा सकते तो सरकार क्या चलाएंगे?

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