जहर की खेंपे आती थीं
हमारी आत्मा में धंसा दी जाती थीं
अन्याय की बोई गई सारी फसलें जवान हो गई थीं
हत्यारे अब हत्या करके छुपते नहीं थे
बेगुनहानों के रक्त से तिलक करके
सिंहासन पर आ बैठते थे
न्याय के गलियारे में फेंके गये जूते
प्रसाद की तरह सिर माथे लगाए जा रहे थे
जो तलबगार हो सकते थे उजाले के
वे भिश्ती बन उनका अंधेरा
अपनी पीठ पर लाद लिए थे
एक हाथ से वो स्कूलों पर ताले जड़ते
दूसरे से कांवड़ ढोते अबोधों पर फूल फेंकते
और इसी तरह देश को देश के अर्थ से
बहुत पीछे धकेल दिया
और एकदिन उस पीछे छूटते देश को
तुमने विकल हो कर पुकारा
जैसे भूखा -दूखा बच्चा माँ को पुकारता है
और वो जो अपना देश था
अपने जन थे
वे धुरियाये पांव चले आये थे ।
– रूपम मिश्र

