तिब्बती नेता दलाई लामा के सम्मान समारोह में भी शामिल हो आशीर्वाद लिए अजय खरे गायत्री खरे
सोनम वांगचुक की रिहाई की मांग हुई
रीवा / धर्मशाला । हिमाचल प्रदेश के तिब्बती निर्वासित सरकार के मुख्य केंद्र धर्मशाला में बुधवार 11 मार्च को तिब्बत के सर्वोच्च नेता 14 वें दलाई लामा के 90 वें वर्ष प्रवेश के उपलक्ष्य में उनके दीर्घायु एवं स्वस्थ जीवन के लिए तिब्बती मठ में हुईं प्रार्थना सभा में रीवा से भारत तिब्बत मैत्री संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष लोकतंत्र सेनानी अजय खरे एवं उनकी धर्मपत्नी प्रो. डॉ गायत्री खरे ने प्रतिनिधि भागीदारी निभाते हुए उनसे रूबरू हो आशीर्वाद लिया।
12 एवं 13 मार्च को सम्पन्न हुए अखिल भारतीय तिब्बत समर्थक समूह सम्मेलन में देश के विभिन्न राज्यों से आए सैकड़ों प्रतिनिधियों ने भागीदारी की। सम्मेंलन को प्रमुख रूप से भारत तिब्बत मैत्री संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ आनंद कुमार के अलावा निर्वासित तिब्बती सरकार के प्रधानमंत्री पेन्पा तेसेरिंग, रक्षा मंत्री डोल्मा ग्यारी, विदेश मंत्री नोरजिन डोल्मा, तिब्बती संसद के अध्यक्ष खेनपो सोनम तेनफेल , तिब्बत समर्थन समूह के राष्ट्रीय संयोजक आर के खिरमे आदि ने तिब्बत प्रश्न पर गहन चिंतन मनन के साथ अपने विचार रखे।
एक प्रेस विज्ञप्ति में भारत तिब्बत मैत्री संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष लोकतंत्र सनानी अजय खरे ने कहा कि तिब्बत की आजादी का सवाल दुनिया के स्वतंत्रता पक्षधरों के लिए बड़ी चुनौती है। 20 वीं शताब्दी के मध्य में जब दुनिया के अधिकांश देश आजाद हो रहे थे तब साम्राज्यवादी चीन ने षड़यंत्र करके तिब्बत को गुलाम बना तिब्बतियों के जीवन के साथ लम्बे समय से क्रूर खिलवाड़ किया जा रहा है। निर्वासित जीवन में तिब्बतियों की कई पीढ़ियां खप गई हैं। तिब्बतियों को लम्बे समय से अपने देश को आजादी की सख्त जरूरत है। तिब्बत दिवस पर तिब्बतियों की यह पीड़ा पर पूरी दुनिया की नजर है। श्री खरे ने कहा कि दुनिया में तिब्बत की आजादी और अस्मिता की रक्षा के लिए विश्व जनमत को संगठित करने की ऐतिहासिक जरुरत है। तिब्बत का सवाल भारतीय संदर्भ में सबसे अहमियत रखता है।
तिब्बत की आजादी और भारत की सुरक्षा का सवाल परस्पर पूरक है। दुनिया के हर देश में तिब्बत प्रश्न पर आवाज मुखर करने की जरूरत है। श्री खरे ने सम्मेलन में चीन के अनाधिकृत कब्जे वाले तिब्बत से लगे भारतीय सीमावर्ती राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग की। 14 नवंबर 1962 के संसदीय संकल्प को प्रभावी बनाने की मांग की। इसके साथ ही हिमाचल बचाओ आंदोलन के पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की बिना शर्त रिहाई की मांग भी उठाई है।







