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श्रद्धांजलि : समाजवादी आंदोलन के अमर सेनानी डॉक्टर जी. जी. पारिख को नमन

जंग-ए-आज़ादी के सिपाही, समाजवादी आंदोलन के वरिष्ठतम नेता, विचार और कर्म के प्रतीक डॉ. जी. जी. पारिख अब हमारे बीच नहीं रहे। यह समाचार सुनते ही मन भारी हो गया और आंखें नम हो गईं। उनका स्नेह, अपनापन, और सबकी चिंता करने वाली सहज प्रवृत्ति आज भी यादों में जीवंत है।

डॉ. जी. जी. पारिख सिर्फ एक व्यक्ति नहीं थे — वे एक संस्था, एक विचारधारा, एक आंदोलन थे। आज़ादी की लड़ाई से लेकर समाजवाद की पुनर्स्थापना तक उनका जीवन जनसेवा, संघर्ष और आदर्शों की अखंड साधना का प्रतीक रहा।

मुझे याद है जब मुझे सोशलिस्ट युवजन सभा का अध्यक्ष बनाया गया था, उस सम्मेलन में जी. जी. स्वयं उपस्थित थे। शाम को उनसे लंबी बातचीत हुई थी — बेहद आत्मीय, गहरी और प्रेरणादायक। उन्होंने कहा था,

> “युवाओं और छात्रों को समाजवाद से जोड़ने की जिम्मेदारी अब तुम्हारे कंधे पर है। यह कठिन नहीं है। तुम्हारे पास विचारों की पूंजी है — उसी विचार को युवाओं तक लेकर जाओ, और संघर्ष करो, लोग अपने आप जुड़ेंगे। पर याद रखना, सिर्फ विचार का होना काफी नहीं है — विचार के साथ सड़क पर संघर्ष जरूरी है।”

 

उनके ये शब्द आज भी कानों में गूंजते हैं — “लालच या डर से कभी समाजवादी आंदोलन से हटना या डिगना नहीं।”
यह सीख ही शायद उनके जीवन का सार है — सिद्धांत, सत्य और संघर्ष का अडिग मेल।

डॉ. जी. जी. पारिख का जीवन इस बात का सजीव उदाहरण था कि समाजवाद केवल नारा नहीं, बल्कि जीवन जीने की शैली है। वे विचारों की विरासत छोड़कर नहीं गए, बल्कि संघर्ष की मशाल हमारे हाथों में सौंप गए हैं। अब हमारी जिम्मेदारी है कि उनके बताए मार्ग पर चलें, समाजवाद की उस मशाल को और ऊंचा उठाएं।

उनकी स्मृति में नमन करते हुए यही कहना उचित होगा —

> “वो शरीर से जा सकते हैं, पर उनके विचार, उनके कर्म, उनका स्नेह और उनका समाजवादी जीवन दृष्टिकोण सदैव जीवित रहेगा।”

 

डॉ. जी. जी. पारिख अमर रहें।
समाजवाद अमर रहे।

— नीरज कुमार

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