-ये भी तो आपातकाल है-

आतंक का साया गहराया,
जन मन में डर समाया।
राहु-केतु संविधान पर बैठे,
आज़ादी के कान उमेठे।
लोकतंत्र की बिगड़ी चाल
सद्भाव का टूटा सुर-ताल।
झुकी रीढ़ और नत है भाल
फिर भी कहते देश खुशहाल।
ये भी तो आपातकाल है।

बुल्डोज़र-राज की देखो झाँकी,
इंसाफ़ कहाँ रह गया बाक़ी?
कहीं न कोई सुनवाई है,
हर आवाज़ दबाई है।
मीडिया पर पहरा भारी,
सच की साँस हुई दुश्वारी।
झूठ गूँज रहा दरबारों में,
न्याय फँसा इनकारों में।
मुश्किल में अब हर सवाल है,
साज़िशों का फैला जाल है।
ये भी तो आपातकाल है।

जनता को ख़ामोश करो,
झूठे वादों का जोश भरो।
जो सवाल करे, वो गद्दार,
जो सच बोले, वो गुनहगार।
जेलों में भर दो मतभेद,
भाटों से लिखवाओ नए वेद।
असहमति पर ताला डालो,
लोकलाज को छीलो-छालो।
राजा को बस यही ख़याल है,
उसको न कोई मलाल है।
लोकतंत्र बना फुटबाल है।
ये भी तो आपातकाल है।

न रोज़ी-रोटी, न रोज़गार है,
बोले तो लाठियों की मार है।
तिजोरी भर रही सेठों की,
मित्र हो रहे मालामाल हैं।
किसानों और मजूरों का,
हर दिन और बुरा हाल है।
उनकी थाली में छप्पन भोग,
अपना तो बस खाली थाल है।
राजा को इससे क्या मतलब
उसके गाल तो लाल-लाल हैं
ये भी तो आपातकाल है।

विचारों पर बंदिश भारी
रातों-रात होती गिरफ़्तारी
होंठ सीं दिए, जुबाँ पर ताले
ऐसे हैं ये आज़ादी के रखवाले
डर के साये में जीना सीखो,
सच को झूठ कहना सीखो।
कानून भूला अपनी चाल है
अदालतों का भी यही हाल है
कैसा यह लोकतंत्र विशाल है,
जहाँ आम आदमी बदहाल है?
ये भी तो आपातकाल है।

जब सत्ता सत्य बन जाए,
और प्रश्न असभ्य हो जाए,
जब अधिकार कुचले जाएँ,
और झूठ के नगाड़े बजाए जाएँ,
जब डर शासन की ढाल हो,
जब ज़ुल्म-ओ-सितम का माहौल हो
तब समझो आपातकाल है

ये भी तो आपातकाल है।

-मुकेश कुमार

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