यह है यूपी में सपा-कांग्रेस की ‘दोस्ती’ टूटने की असल वजह

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस के बीच लोकसभा चुनाव 2024 में बनी गठबंधन की जोड़ी पंचायत चुनाव 2026 के लिए टूट चुकी है। दोनों पार्टियां अब अकेले-अकेले (या सपा के मामले में आधिकारिक तौर पर न लड़ने) उतरने का फैसला ले चुकी हैं। यह फैसला यूं ही नहीं लिया गया, बल्कि 2027 विधानसभा चुनाव की बड़ी जंग को ध्यान में रखते हुए रणनीतिक दांव है। आइए, विस्तार से समझते हैं कि इसके पीछे क्या-क्या कारण हैं और दांव क्या हैं।

 

कांग्रेस का फैसला: स्वतंत्र लड़ाई से संगठन मजबूत करने का दांव

 

कांग्रेस ने जनवरी 2025 में ही ऐलान कर दिया कि वह 2026 के तीन स्तरीय पंचायत चुनाव (ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत, जिला पंचायत) में पूरे दमखम के साथ अकेले लड़ेगी। इसका मुख्य कारण है पार्टी का आंतरिक पुनर्गठन अभियान ‘संगठन सृजन अभियान’। एक हफ्ते लंबे सर्वे से कार्यकर्ताओं ने फीडबैक दिया कि पार्टी को पूर्ण ताकत से उतारना चाहिए, ताकि ग्रामीण स्तर पर बूथ मजबूत हो सकें।
रणनीति: पंचायत चुनाव को ‘लिटमस टेस्ट’ मानते हुए कांग्रेस इसे 2027 विधानसभा चुनाव के लिए आधार तैयार करने का मौका देख रही है। 2024 लोकसभा में सपा के साथ गठबंधन से 17 में से 6 सीटें जीतने के बाद कांग्रेस ‘जूनियर पार्टनर’ की भूमिका से ऊब चुकी है। अब वह ज्यादा सीटें मांग रही है – अगर पंचायत में अच्छा प्रदर्शन हुआ, तो 2027 में सपा से 100+ सीटों की बातचीत मजबूत होगी। अगर नहीं, तो स्वतंत्र लड़ाई या बसपा से गठबंधन का विकल्प खुला रखा है।
उत्तर प्रदेश कांग्रेस प्रभारी अविनाश पांडेय का बयान: “हम पंचायत, नगर पालिका सबमें अकेले लड़ेंगे। 15 अगस्त तक प्रत्याशियों की सूची तैयार हो जाएगी।” यह फैसला पार्टी के पांच स्तरीय संगठन (राज्य-मंडल-जिला-ब्लॉक-बूथ) को मजबूत करने का हिस्सा है।

 

सपा का फैसला: आधिकारिक तौर पर न लड़ना, आंतरिक कलह से बचने का दांव

 

सपा ने अक्टूबर 2025 में संकेत दिया कि वह 2026 पंचायत चुनाव में आधिकारिक उम्मीदवार नहीं उतारेगी। कार्यकर्ता चाहें तो स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में लड़ सकते हैं, लेकिन पार्टी चिन्ह के बिना। 57,694 ग्राम पंचायतों में टिकट वितरण से होने वाली आंतरिक लड़ाई को रोकना मुख्य वजह है – इससे कैडर बंट सकता है और 2027 की एकजुटता प्रभावित हो सकती है।
रणनीति: सपा लोकल मुद्दों (जैसे जल-जंगल-जमीन) पर उलझने के बजाय बड़े मुद्दों (महंगाई, बेरोजगारी, जाति जनगणना) पर फोकस करना चाहती है। ‘पीडीए’ (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को मजबूत करने के लिए ‘पीडीए पंचायत’ की तैयारी कर रही है। अखिलेश यादव ने जून 2025 में कहा, “हम पंचायत चुनाव के लिए पूरी तरह तैयार हैं,” लेकिन बाद में रणनीति बदल गई – भाजपा के खिलाफ जनाक्रोह को 2027 के लिए संभालना प्राथमिकता।
अगर सपा अच्छा प्रदर्शन करती (भले ही अप्रत्यक्ष रूप से), तो मुस्लिम-यादव कोर वोट बैंक मजबूत होगा। लेकिन हार से 2027 में भाजपा को फायदा हो सकता है।

 

गठबंधन टूटने के पीछे गहरी दरारें और दांव

 

सीट बंटवारे की जंग: 2024 लोकसभा में सफलता के बावजूद कांग्रेस सपा से नाराज है – सपा सिर्फ 17 सीटें देती रही, जबकि कांग्रेस पूरे 403 में से 100+ चाहती है। एक वरिष्ठ सपा नेता ने कहा कि 2027 में कांग्रेस को सिर्फ 40 सीटें मिल सकती हैं, जिससे गठबंधन टूटने का खतरा है।
बिहार चुनाव का असर: नवंबर 2025 के बिहार विधानसभा परिणामों (जहां महागठबंधन हार गया) ने यूपी में संशय पैदा किया। सपा को डर है कि कांग्रेस का कमजोर प्रदर्शन वोट स्प्लिट करेगा।

बड़े दांव

कांग्रेस के लिए: पंचायत में सफलता से ग्रामीण वोटर बेस (खासकर दलित-मुस्लिम) मजबूत, जिससे 2027 में ‘तीन कोनों की लड़ाई’ (सपा vs कांग्रेस vs भाजपा) संभव। असफलता से संगठन कमजोर।
सपा के लिए: आंतरिक एकता बचाकर पीडीए फॉर्मूले पर फोकस, लेकिन अगर कांग्रेस मजबूत हुई तो सीट शेयरिंग में दबाव। दोनों का अकेला उतरना वोट बंटवारा कर सकता है, जो भाजपा को फायदा देगा।
कुल मिलाकर: इंडिया गठबंधन 2027 के लिए बरकरार है (अखिलेश का दावा), लेकिन पंचायत को ‘ट्रायल रन’ मानकर दोनों पार्टियां अपनी ताकत आंक रही हैं। अगर गठबंधन टूटा, तो यूपी में भाजपा का रास्ता साफ।

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