नए साल की शुरुआत में गुरु शिष्य के रिश्ते को लेकर दो ऐसे वीडियो देखने को मिले जिसकी सीख बड़े से बड़े किताबी ज्ञान के पुलंदों से भी शायद ही मिल पाती। शास्त्रीय व सूफी संगीत के दो महारथियों उस्ताद शाहिद परवेज तथा हंसराज हंस ने अपनी संगीत यात्रा में ज्ञान हासिल करने के रास्ते तथा गुरु के द्वारा अपने शागिर्द को गढ़ने में अपना सब कुछ अर्पण करने की ख्वाहिश, ज़िद का जो वर्णन किया है, उसको देखकर पढ़ने पढ़ाने सीखने सीखाने को जो रेखांकित किया है वह तालीमी दुनिया काअर्क है। दुनिया भर में अपने सूफी संगीत से शोहरत हासिल करने वाले पंजाबी सूफी संगीतकार हंस राज हंस जब अपने और अपने गुरु पूरन शाह कोटी की गुरबत जिसमें गुरु मांग कर न केवल अपना अपने शागिर्द का भी पेट भरते हैं तथा साथ ही हंसराज हंस जब पूरन शाह कोटि का शागिर्द बनने की रस्म अदायगी के वक्त, लड्डू खरीदने के पैसे भी न होने के कारण बताशे (चीनी से बने) का इस्तेमाल करके गुरु से गंडा बंधवा लेते हैं। एक तरफ गुरु वात्सल्य में अपना सब कुछ चेले पर न्योछावर करने में खुशी महसूस करते हैं, वही तालीम के वक्त इतने सख्त हैं की गायन के स्वर ठीक से न लगने पर एक बार, दो बार टोकते हैं, परंतु तीसरी बार गलती करने पर सिर पर हथौड़ी मारने से भी गुरेज नहीं करते का भक्ति भाव से जो जिक्र करते हैं वह तालीम पाने की दुर्गम यात्रा का बहुत ही मार्मिक वर्णन है।
दूसरे वीडियो में आज के दौर के हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के सितार वादन के सरताज उस्ताद शाहिद परवेज ने तालीम हासिल करने वालों के लिए किस मिजाज, सोच, जहनियत, रियाज की जरूरत को जरूरी बतलाया बड़ा कलाकार बनने के लिए वह नितांत जरूरी है। उस्ताद परवेज हिंदुस्तान के मशहूर मारूफ कलाकारों को ‘अनुभव’ के सेमिनार में जवाब सवाल मैं बताते हैं कि इस कार्य में मंजिल नहीं रास्ता ही रास्ता है। उपरोक्त वार्ता में जो बयां किया है उससे बेहतर तालीम बड़ी से बड़ी पोथियों की श्रृंखला से भी नहीं मिल सकती।
यह केवल संगीत की शिक्षा तक ही महदूद नहीं है, ज्ञान की हर विधा पर यह लागू है।
राजकुमार जैन
दूसरे वीडियो में आज के दौर के हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के सितार वादन के सरताज उस्ताद शाहिद परवेज ने तालीम हासिल करने वालों के लिए किस मिजाज, सोच, जहनियत, रियाज की जरूरत को जरूरी बतलाया बड़ा कलाकार बनने के लिए वह नितांत जरूरी है। उस्ताद परवेज हिंदुस्तान के मशहूर मारूफ कलाकारों को ‘अनुभव’ के सेमिनार में जवाब सवाल मैं बताते हैं कि इस कार्य में मंजिल नहीं रास्ता ही रास्ता है। उपरोक्त वार्ता में जो बयां किया है उससे बेहतर तालीम बड़ी से बड़ी पोथियों की श्रृंखला से भी नहीं मिल सकती।
यह केवल संगीत की शिक्षा तक ही महदूद नहीं है, ज्ञान की हर विधा पर यह लागू है।
राजकुमार जैन








