तेजस्वी यादव के बिहार का CM बनने के सपने को चकनाचूर करेंगे यह 3 सियासी दुश्मन

दीपक कुमार तिवारी 

आरजेडी नेता और बिहार के पूर्व डेप्युटी सीएम 2025 में होने वाले विधानसभा चुनाव में बड़ी कामयाबी का सपना देख रहे हैं। वे अगली बार सीएम बनने के प्रति आश्वस्त भी हैं। हालांकि यह उतना आसान नहीं, जितना वे सोचते हैं। सब कुछ जनता पर निर्भर है। जनता का कितना साथ उन्हें मिलेगा, उनकी कामयाबी उसी पर निर्भर करेगी। उन्हें 2020 के विधानसभा चुनाव में बड़ी कामयाबी मिली थी, लेकिन सीएम बनने लायक विधायकों की संख्या से कुछ ही कदम दूर रह गए थे। तब से ही उनके मन में सीएम बनने की इच्छा पनपती रही है।
हालांकि बिहार में नीतीश को पटा कर महागठबंधन ने 10 अगस्त 2022 को सरकार बना ली थी। नीतीश कुमार ने आठवीं बार सीएम पद की शपथ ली थी। आरजेडी को भी सत्ता में भागीदारी का मौका मिल गया। तेजस्वी 2015 के बाद दूसरी बार डेप्युटी सीएम बने। सत्ता का स्वाद तेजस्वी ने चख लिया है। इसीलिए अब उनकी नजर सीधे सीएम की कुर्सी पर है। हाल ही संपन्न लोकसभा चुनाव के दौरान वे इंडिया ब्लाक के प्रत्याशियों के लिए वोट के लिए जितनी अपील करते रहे, उससे अधिक उनका जोर अगले विधानसभा में चुनाव में खुद को सीएम बनाने का आग्रह उनका होता था। लोकसभा चुनाव में इंडिया ब्लाक को नौ सीटें मिलने के बाद तेजस्वी को मनोबल और बढ़ा है। अब उन्हें सीएम की कुर्सी ज्यादा दूर नहीं दिखती।
तेजस्वी यादव ने अपने पिता आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव से सियासत की बारीकियां समझें तो हैं, लेकिन उसमें 1990 के दौर की राजनीति क झलक अधिक दिखती है। लालू ने 90 के दशक में मंडल कमीशन और आरक्षण के आधार पर जातीय गोलबंदी की थी। उनका यह प्रयोग सफल भी रहा। लगातार 15 साल तक बिहार की सत्ता उनके ही परिवार में सिमटी रही। सामाजिक न्याय के नाम पर उन्होंने दलित-पिछड़ों की जो गोलबंदी की, उसी की फसल वे काटते रहे। पर, हर चीज की एक्सपायरी डेट होती है। तब लालू के साथ रहे नीतीश कुमार उस जातीय गोलबंदी से बाहर निकले और दूसरे प्रयास में ही लालू को चित्त कर दिया। 2005 से लालू घराने की राजनीति कुंद हुई तो उसे उभार का मौका 10 साल बाद 2015 में नीतीश के साथ आने पर ही मिल पाया। अर्सा बाद लालू परिवार को सत्ता का स्वाद चखने को मिला। बेटे तेजस्वी यादव को आगे कर लालू ने बिहार की राजनीति में उन्हें स्थापित करने की पूरी कोशिश 2015 से करते रहे हैं।
तेजस्वी यादव की ताकत यही है कि वे नीतीश कुमार की बदौलत दो बार डेप्युटी सीएम बने। यह अलग बात है कि दोनों बार रिश्ते की मियाद लंबी नहीं रही। हां, इतना जरूर हुआ कि तेजस्वी को अपना व्यक्तित्व प्रदर्शित करने का नीतीश कुमार ने मंच मुहैया करा दिया। तेजस्वी ने पिता लालू की जातीय गोलबंदी के नुस्खे पर ही थोड़े संशोधन-परिमार्जन के साथ काम किया है। लालू ने एम-वाई (मुस्लिम-यादव) की गोलबंदी से राजनीतिक रोटियां सेकीं तो तेजस्वी ने इसका दायरा बढ़ाते हुए अपनी पार्टी आरजेडी को ए टू जेड की पार्टी बनाने की घोषणा की। बाद में तो तेजस्वी ने जातीय गोलबंदी को और परिमार्जित किया।
उन्होंने आरजेडी को ड-ल् (मुस्लिम-यादव) के साथ ‘बीएएपी’ (बहुजन, अगड़ा, आधी आबादी और पूअर) की अवधारणा बनाई। जातीय-सामाजिक गोलबंदी के इन तमाम प्रयासों का नतीजा यह निकला कि इस बार लोकसभा चुनाव में इंडिया ब्लॉक के खाते में नौ सीटें आ गईं। इससे वे ज्यादा उत्साहित हैं और अगले साल बिहार का सीएम बन जाने का अति विश्वास मन में पाले हुए हैं। पर, वे भूल गए हैं कि उनके दुश्मन भी अलग-अलग तरीके से उन्हें शिकस्त देने के लिए अपनी रणनीति पर काम कर रहे हैं।
चुनावी रणनीतिकार से सक्रिय राजनीति में कदम रखने जा रहे प्रशांत किशोर उर्फ पीके तेजस्वी के लिए परेशानी का सबब बन कर उभर रहे हैं। जाति-धर्म का बंदन तोड़ लोगों की भागीदारी जिस तरह पीके की सभाओं-बैठकों में होती रही है, उससे आरजेडी नेतृत्व भी चिंतित है। 6 जुलाई 2024 को आरजेडी के बिहार प्रदेश जगदानंद सिंह ने पार्टी पदाधिकारियों को पत्र लिख कर इस बारे में आगाह भी किया है। प्रशांत किशोर 2 अक्टूबर को पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में अपनी जन सुराज पार्टी को विधिवत लांच करने वाले हैं।
साल भर से वे बिहार के गांव-गांव घूमते रहे। संगठन का ढांचा उन्होंने पंचायत स्तर पर खड़ा कर लिया है। प्रशांत के निशाने पर नीतीश कुमार भी होते हैं, लेकिन जोरदार हमला वे लालू यादव और उनके बेटे तेजस्वी यादव पर करते रहे हैं। जाहिर है कि उनके साथ जुड़े लोगों में लालू परिवार के प्रति नफरत का बीजोरोपण होने लगा है। एआईएमआईएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी भी आरजेडी से मुस्लिम वोटरों को अलग करने में लगे हैं। उन्होंने इसका ट्रेलर भी पिछले विधानसभा चुनाव में दिखा दिया था। उनकी पार्टी के पांच उम्मीदवार विधानसभा पहुंच गए थे। सीमांचल में ओवैसी का प्रभाव अधिक है। नीतीश कुमार तो भाजपा के साथ मिल कर तेजस्वी की खाट खड़ी करने में पहले से ही लगे हुए हैं। भाजपा से नीतीश को अलग करने की लालू-तेजस्वी ने जितनी चालें चलीं, वे अब बेअसर हो चुकी हैं। इनके अलावा सीबीआई और ईडी की तलवारें तो तेजस्वी की गर्दन पर लटक ही रही हैं।

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