कांग्रेस से दूरी बनाने को अखिलेश पर बड़ा दबाव, विधानसभा चुनाव में अलग अलग होंगे रास्ते!  

चरण सिंह 

सपा प्रमुख अखिलेश यादव और उनकी पत्नी डिंपल यादव के यूपीए अध्यक्ष रहीं सोनिया गांधी के जन्मदिन पर पहुंचने पर भले ही आज की तारीख में कांग्रेस और सपा में मधुर संबंध दिखाई दे रहे हों पर आने वाले समय में सपा और कांग्रेस की दूरी बढ़ने वाली है। मानकर चलिए कि 2027 का विधानसभा चुनाव सपा और कांग्रेस अलग अलग लड़ेंगी। इसका कारण विचाधारा नहीं बल्कि बीजेपी का दबाव बताया जा रहा है।

बात जरूर अटपटी लग रही होगी पर जमीनी हकीकत यह है कि जिस तरह से बीएसपी केंद्र सरकार के दबाव में है उसी तरह से सपा पर भी केंद्र सरकार ने दबाव बना रखा है। सपा के दिग्गज नेता आजम खान की दुर्दशा पर सपा का आक्रामक रुख न अपनाना इसका बड़ा उदाहरण है। अब जानकारी मिल रही है कि गृह मंत्री अमित शाह का सपा के राष्ट्रीय मुख्य महासचिव रामगोपाल के पास संदेश पहुंच गया है कि अखिलेश यादव राहुल गांधी से दूरी बनाएं।

दरअसल बीजेपी का खुलकर यदि कोई नेता सामना कर रहा है वह प्रतिपक्ष नेता राहुल गांधी हैं। बीजेपी की रणनीति है कि राहुल गांधी को अलग-थलग कर दिया जाए। क्षेत्रीय दल कांग्रेस से न सट पाएं। लालू प्रसाद, हेमंत सोरेन और एमके स्टालिन को छोड़ दिया जाए देश के लगभग सभी क्षेत्रीय दल बीजेपी के दबाव में हैं और किसी न किसी रूप में कांग्रेस से दूरी बनाकर चल रहे हैं।
टीएमसी मुखिया ममता बनर्जी को भले ही विपक्ष का दमदार नेता माना जाता हो पर इंडिया गठबंधन को कमजोर करने वाली ममता बनर्जी ही हैं। नीतीश कुमार को एनडीए में जाने के लिए मजबूर करने वाली ममता बनर्जी ही थीं। जब नीतीश कुमार ने विपक्ष को एकजुट किया था तो दिल्ली की मीटिंग में ममता बनर्जी ने ही कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन का नाम संयोजक के लिए प्रस्तावित किया था। नीतीश कुमार नाराज होकर चले गए थे।
भले ही लोकसभा चुनाव में किसी दल को एक सीट न दी हों पर इंडिया गठबंधन का नेतृत्व करने का दम्भ ममता बनर्जी भर रही थी। महाराष्ट्र में शरद पवार अजित पवार के साथ उद्धव ठाकरे एकनाथ शिंदे का अलग अलग होना सभी ने देखा है। जम्मू कश्मीर में उमर अब्दुल्ला भी बीजेपी के सामने म्याऊं म्याऊं करने लगे हैं। यह बीजेपी की साम दाम दंड भेद की राजनीति और विपक्ष की कमजोरी ही है कि बीजेपी अपनी मनमानी कर रही है। रोजगार और महंगाई जैसे जमीनी मुद्दों पर कोई बात कारण को  तैयार नहीं। 10 घंटे वंदेमातरम की बहस पर खत्म कर दिए पर इंडिगो की मनमानी के चलते यात्रियों को जो परेशानी हुई इस पर किसी का कोई ध्यान नहीं गया। 5000 रुपए वाला टिकट 30 हजार में क्यों बिका ? गोवा के नाइट क्लब में 26 लोग जिंदा जल गए। किसी की संवेदना नहीं जागी।
विपक्ष के जनहित के मुद्दे पर एकजुट होकर एक भी आंदोलन न करना विपक्ष की बड़ी कमजोरी को दर्शाता है। पीएम मोदी के खिलाफ व्यक्तिगत आग उगलने वाले केजरीवाल दिल्ली विधानसभा चुनाव हारते ही बीजेपी के दबाव आ गए। पंजाब में जाकर भूमिगत हो गए। जगदीप धनखड़ की दुर्दशा का कारण भी अरविन्द केजरीवाल ही बताए जा रहे हैं। इस तरह की जानकारी मिलती रही है कि जगदीप धनखड़ नीतीश कुमार को चंद्रबाबू नायडू को विपक्ष का साथ देने का माहौल बना रहे थे कि केजरीवाल ने यह बात बीजेपी नेतृत्व को बता दी। बेचारे धनखड़ का क्या हुआ सबने देखा। इन परिस्थितियों में विपक्ष बदलाव का सपना देख रहा है। देश की इस सियासत का खामियाजा जनता को भुगतना पड़ रहा है। जनता को भी जाति धर्म में इस तरह से बांट दिया है कि लोगों के संबंध भी ख़राब हो रहे हैं।
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