प्रोफेसर राजकुमार जैन
हालांकि इस आंदोलन की शुरुआत नीट पेपर की गोपनीयता भंग होने के सवाल पर हुई थी परंतु जाने अनजाने इसमें जाति का विमर्श भी उभर कर सामने आया। कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभीजीत दिपके पहली बार स्टेज पर जब दिखाई दिए तो बाबा साहेब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का विशाल चित्र उनके हाथ में था। स्टेज के नीचे कम्युनिस्ट पार्टी के युवा संगठन के कुछ छात्र जय-जय भीम का उद्घोष कर रहे थे, स्टेज पर नीला झंडा भी लहरा रहा था। डॉ आंबेडकर को संविधान निर्माता के साथ-साथ हिंदुस्तान की जाति व्यवस्था के कोढ़ को नष्ट करने की मुहिम के अगुवा के रूप में भी जाना जाता है। आंदोलन के दौरान मंच से लेकर नीचे के जमावड़े मैं गांधी का चित्र, नारे दिखाई नहीं दिए, बाद में मामूली एक स्केच चित्र में अंबेडकर गांधी का संयुक्त चित्र जरूर लगा। सोनम वांगचुक जो अक्सर अपने भाषणों में गांधी का नाम लेते थे उन्होंने भी गांधी का नाम लेने से परहेज किया। यह दीगर बात है कि अनशन की समाप्ति पर सपत्नीक गांधी की समाधि पर जाकर नमन किया।
गांधी और अंबेडकर भारतीय इतिहास की वह दो महान हस्तियां हैं, जिनको राजनीति फायदे नुकसान के मद्देनजर ओझल नहीं किया जा सकता। बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने एक अछूत मां के पेट से जन्म लेकर व्यक्तिगत रूप में जो यातनाएं सही उसके प्रतिकार को अपनी जिंदगी का मिशन बना लिया तथा अपना पूरा जीवन इसमें ही खपा दिया। गांधी ने जन्म तो रियासत के दीवान (प्रधानमंत्री) के वैष्णव परिवार में लिया परंतु दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए काले- गोरे चमड़ी के रंगभेद, नस्लीय भेदभाव पर आधारित अमानुषिता को देखते, झेलते यहां तक की बैरिस्टर होते प्रथम श्रेणी का टिकट होते हुए भी जब अफ्रीका में रेल से डरबन से प्रिटोरियामें जा रहे थे तो गोरे गार्ड ने यह कहते हुए कि तुम्हें क्या यह नहीं पता की कुत्ते और काले आदमी फर्स्ट क्लास के डब्बे में सफर नहीं कर सकते पीटरमैरिट्जबर्ग के स्टेशन पर सामान सहित धक्का देकर नीचे उतार दिया। गांधी जी ने भारत की जातिवादी मानसिकता के घिनौने रूप को अपने अनुभवों और संवेदना से सीख और महसूस कर अपना संपूर्ण जीवन हरिजन उत्थान में समर्पित कर दिया। यह बात अलग है कि अब कुछ लोग इस शब्द को नापसंद करते हैं।
भारत में मानव मल को साफ करने वाले जिनको कई नामो से जाना गया, वाल्मीकि, मेहतर, जमादार, भंगी, अब सफाई कर्मचारी के नाम से जाना जाता है, भारतीय जाति व्यवस्था में सबसे सबसे निचले पायदान पर रखा गया। गांधीजी अपनी संवेदना से यहां तक जातिवाद के विरुद्ध आंदोलनकारी बन गए कि उन्होंने अपनी पत्नी कस्तूरबा गांधी को आदेश दिया कि मेरे घर पर जो मेहमान भी आएंगे उसका पाखाना भी तुम्हें साफ करना होगा। वैष्णव संस्कारों में पली, बढ़ी कस्तूरबा ने रोते हुए कहा कि मैं आपका मल तो साफ कर दूंगी परंतु बाहर के मेहमानों का यह काम मुझसे नहीं हो पाएगा। गांधी ने कस्तूरबा के मना करने पर घर से बाहर निकलने हुकुम सुना दिया, आखिर में कस्तूरबा ने इसे कबूल कर लिया।
जंगे आजादी में अंग्रेजी हुकूमत की गुलामी के खिलाफ चल रहा संघर्ष कांग्रेस पार्टी के झंडे के तले तथा महात्मा गांधी के नेतृत्व में चल रहा था। बाबा साहब इसके उलट दूसरे पाले में थे। उनकी जायज मान्यता थी की आजादी के बाद हिंदुस्तानियों का राज आने पर मुझे तो और अधिक गुलामी का जीवन जीने के लिए मजबूर किया जाएगा कम से कम अंग्रेज रूल ऑफ लो में यकीन रखते हैं, जो उनके शासन के साथ है उसके वे हमदर्द हैं। अंग्रेजी हुकूमत अपनी चालबाजी से कांग्रेस के खिलाफ हिंदुस्तान के जाति मजहब का प्रतिनिधित्व करने वाले नेताओं को प्रतिनिधि करार देते हुए लंदन में आयोजित राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस में बहस करवा कर यह दिखलाने का प्रयास कर रहा था कि कांग्रेस पार्टी भारत का सही प्रतिनिधित्व नहीं करती अन्य संगठन इसके विरोध में है। सामने की कुर्सी पर गांधी बैठे हुए थे, जो कांग्रेस की नुमाइंदी कर रहे थे, उनके सामने डॉ अंबेडकर ने हिंदुस्तान में जाति के नाम पर होने वाले जुल्म, गैरबराबरी, अमानुष व्यवहार से कुपित होते गांधी को हिंदुओं का प्रतिनिधि मानते हुए भयंकर अपमानित करते हमले किए। अंत में गांधी खड़े हुए और उन्होंने डॉक्टर अंबेडकर का धन्यवाद करते हुए कहा आपका शुक्रिया, आपने जो कुछ भी कहा वह बहुत कम है, अगर आप मेरे मुंह पर थूक भी देते तो वह भी कम ही होता, बैठ गए। जातिवाद के खिलाफ लड़ने का गांधी का लंबा इतिहास है। उन्होंने हरिजन अर्थात ईश्वर के जन मानकर हरिजन सेवक संघ आश्रम स्थापित किए। अपने मुख पत्र का नाम भी ‘हरिजन’ रखा। आखिर में उन्होंने यहां तक भी निर्णय कर लिया कि मैं केवल अंतरजातिय विवाह में ही आशीर्वाद देने जाऊंगा। गांधी जी के पुत्र के समान उनके निजी सचिव महादेव देसाई के पुत्र नारायण देसाई के विवाह के अवसर पर इसी नियम के कारण गांधी जी विवाह समारोह में सम्मिलित न होकर खत लिखकर कहा कि मेरा आशीर्वाद नव दंपति के साथ है परंतु सजातीय विवाह होने के कारण मैं अपनै नियम के कारण इस मांगलिक अवसर पर उपस्थित नहीं हो सकता। डॉ आंबेडकर अपनी दूसरी शादी एक ब्राह्मण युवती डॉक्टर सविता के साथ कर रहे थे तो वह अपने विवाह का निमंत्रण लेकर सरदार पटेल के घर पर गए वहां पर हुई वार्ता में आजादी के बाद संविधान निर्मात्री सभा का निर्माण हुआ। डॉ अंबेडकर को संविधान सभा में लाने का श्रेय भी गांधी को जाता है। आजादी के बाद कांग्रेस पार्टी का विशाल बहुमत था। संविधान सभा के संयोजक पद पर गांधी जी ने कई कांग्रेसियों के विरोध के बावजूद न केवल उनको संविधान सभा का सदस्य बनने में मदद की बल्कि संविधान सभा के संयोजक पद पर भी सुशोभित करने में अपना योगदान दिया। आज देखने में आ रहा है की अपनी राजनीतिक दुकान चलाने के लिए गांधी जी को दलित विरोधी फतवा देने का प्रयास भी हो रहा है। कॉकरोच के मंच पर अभिजीत दिपके डॉ आंबेडकर के फोटो के साथ अगर आते हैं और जय जय भीम के नारे लगाते हैं तो वह स्वाभाविक है, एक दलित होने के कारण वह नौजवान अगर अंबेडकर से प्रेरणा पाता है, तो इसमें क्या हैरानगी। मगर दूसरी और वोटो के हिसाब किताब से नारे और नेता को बदलने को क्या कहा जाए। आप पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल पहले अपनी पार्टी के चित्र मैं गांधी का फोटो लगाते थे परंतु पंजाब चुनाव को ध्यान में रखते हुए गांधी का फोटो निकालकर डॉक्टर अंबेडकर का फोटो लगा दिया। हालांकि जब भी कभी उन पर मुसीबत पड़ती है तो वह भी सीधे राजघाट पर गांधी की शरण में जाकर अपनी रक्षा की मिन्नत करते हैं। भारत की कम्युनिस्ट पार्टियां जो कार्ल मार्क्स, माओ, लेनिन, के वर्ग संघर्ष के सिद्धांत मैं यकीन रखते हुए ‘हैव और हैव नॉट,’ अर्थात शासक और शासित, के सिद्धांत में यकीन रखते हुए अन्य राजनीतिक थ्योरी को अमान्य मानते थे, सोशलिस्ट चिंतक डॉक्टर राममनोहर लोहिया ने मार्क्स गांधी एन सोशलिज्म ग्रंथ की रचना में जब यह सिद्धांत दिया कि भारत में वर्ग और वर्ण अर्थात क्लास एंड कॉस्ट दोनों एक सिक्के के दो पहलू है। जब तक कास्ट यानी जातिवाद का खात्मा नहीं होता वर्ग संघर्ष भी स्थापित नहीं हो सकता क्योंकि वर्ग परिवर्तनशील है आज जो मजदूर है भविष्य में वह मालिक भी बन सकता है परंतु जाति अपरिवर्तनशील है, भारत की जाति व्यवस्था में एक बार जो जन्म जिस जगह ले लेता है तमाम उम्र वह उसी से शापित होता रहता है। धर्म परिवर्तन भी जाति के जहर का दंश नहीं मिटा पा रहा। उस समय कम्युनिस्ट पार्टियों ने डॉक्टर लोहिया के इस सिद्धांत को अमान्य मानकर संशोधन वादी विचार कहा। डॉ लोहिया ने हर समाजवादी को जाति तोड़ो आंदोलन तथा सहभोज आयोजित करने के लिए प्रेरित किया।
कॉकरोच आंदोलन में देखने में आया की कम्युनिस्ट पार्टी के नेता और युवा संगठन कार्ल मार्क्स, माओ, लेनिन, का नाम ना लेकर जय जय भीम का अपनी डफली से गायन कर रहे थे। हालांकि बाबा साहब कम्युनिस्ट विचारधारा और उसके नेतृत्व के प्रति कटु आलोचक थे। अंबेडकर ने प्रथम लोकसभा चुनाव मुंबई में सोशलिस्ट पार्टी के साथ समझौते में लड़ा था परंतु उनके मुकाबले में कम्युनिस्ट पार्टी के श्रीपाद अमृत डांगे चुनाव लड़े थे जिसमें बहुत आरोप प्रत्यारोप भी लगे।
अगर यह कम्युनिस्टों की ऐतिहासिक सोच की गलती का सचमुच परिमार्जन है, तो यह एक बहुत बड़ा क्रांतिकारी कदम होगा। आज देखने में आ रहा है की घोर जातिवादी समूह, नेता, कार्यकर्ता अपने सभा, सम्मेलनों, जलूसों में डॉक्टर अंबेडकर के फोटो, नारे लगा रहे है, अगर उनका हृदय परिवर्तन हो गया है तो यह शोषण, विहीन,जाति मुक्त भारत के नव निर्माण का प्रतीक है, परंतु अगर यह केवल और केवल दलित वोटरों को अपनी ओर आकर्षित करने, उनका समर्थन पाने के लिए ऊपरी दिखावा है तो इससे कुछ भी हासिल होने वाला नहीं। आज का दलित मतदाता बहुत अधिक जागृत है, वह किसी लुभावने नारे या फोटो से किसी का वोटर समर्थक बनने वाला नहीं, इसके लिए वह गहन सूक्ष्म दृष्टि से परीक्षण करता है की क्या ये सचमुच जातिवादी मानसिकता के खिलाफ संघर्ष करने वाले बाबा साहब के सच्चे अनुयायी हैं।
गांधी और अंबेडकर अलग नहीं दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू है। इन दो महान भारतीयों के बीच में प्रतिद्वंद्विता, दुश्मनी, अलगाव दिखाने का प्रयास करने वाले कभी अपने मंसूबे में कामयाब नहीं हो पाएंगे।






