कोई भी मानव-भविष्य के समाजवादी या गैर-समाजवादी युटोपिया (काल्पनिक आदर्श) का उद्देश्य मनुष्य को उस स्थिति से मुक्त करने का रहा है जिसमें उसके व्यक्तित्व का चतुर्दिक विकास अवरुद्ध होता है। यही कारण है कि समाजवादी आंदोलन के पीछे वही मानवता काम कर रही है जो किसी बड़े धार्मिक उत्थान के पीछे होती है। इसी से हजारों लोगों को अपने उद्देश्यों के लिए अपने आप के बलि कर देने की प्रेरणा मिलती रही है। इसी कारण अपने विशुद्ध अर्थ में समाजवाद की राजनीति अन्य तरह की राजनीति से अलग रही है।
मोटे तौर से राजनीति का केंद्रबिंदु संपत्ति का एक या दूसरी तरह से बँटवारा रहा है। राजनीति के मुद्दे होते हैं- कौन संपत्ति का हकदार होगा, किस व्यक्ति या समूह को किस भूमि या भूभाग पर अधिकार मिलेगा, किसकी क्या आमदनी होगी? और इन्हीं से जुड़ा यह सवाल कि किस व्यक्ति या समूह की क्या सामाजिक राजनीतिक हैसियत होगी। जब मार्क्स ने यही बात कही थी तो उस समय यह कुछ चौंकाने वाली बात लगी थी। लेकिन आज सभी लोग इस सच्चाई को मानने लगे हैं। इस कारण उन लोगों के सामने जिन्होंने नए तरह के समाज के निर्माण की कल्पना की थी, नक्शा ऐसे ‘आर्थिक-मनुष्यों’ का समाज बनाने का नहीं था।
इस निरंतर चलने वाली संपत्ति के बँटवारे की ऊहापोह को लेकर कोई मनीषी क्यों अपना पूरा जीवन लगाता? समाजवाद की कल्पना के पीछे असली भावना आदमी के जीवन को संपत्ति और उसके उन प्रतीकों से मुक्त करना था, जो उसे गुलाम बनाते हैं तथा उसके समुदायभाव को नष्ट करते हैं। इससे एक पूर्ण उन्मुक्त मानव की कल्पना जुड़ी थी। उपभोक्तावाद असंख्य नई कड़ियाँ जोड़कर मनुष्य पर संपत्ति की जकड़न को मजबूत करता है और इसीलिए हमारे युग में समाजवाद के सीधे प्रतिरोधी के रूप में उभरता है।
— सच्चिदानन्द सिन्हा
— सच्चिदानन्द सिन्हा








