बाजारवाद का मायाजाल: जब सुंदरता भी बाजार की गुलाम हो गई

नीरज कुमार

आज के बाजारवादी दौर में सुंदरता केवल प्रकृति की देन, स्वस्थ शरीर, सहज व्यक्तित्व और मनुष्य के स्वभाव से जुड़ी चीज नहीं रह गई है। उसे भी बाजार ने अपने कब्जे में ले लिया है। अब सुंदर दिखने के लिए व्यक्ति को अपनी सहजता, पसंद और जरूरतों से अधिक उन वस्तुओं पर भरोसा करना सिखाया जा रहा है, जिन्हें बड़ी-बड़ी कंपनियां विज्ञापनों के माध्यम से बेचती हैं। सुंदरता की परिभाषा तय करने का अधिकार धीरे-धीरे व्यक्ति और समाज के हाथों से निकलकर बाजार के हाथों में पहुंचता जा रहा है।

किसी विशेष कंपनी की साड़ी पहने सुंदर महिला, महंगे सूट में सजा नौजवान, कोल्ड ड्रिंक की बोतल हाथ में लिए समुद्र तट पर खड़े आकर्षक स्त्री-पुरुष और महंगे बाथिंग सूट में समुद्र की लहरों के बीच अठखेलियां करती युवतियां—विज्ञापनों की यह दुनिया केवल किसी वस्तु की खूबियां नहीं बताती, बल्कि एक खास तरह की जीवनशैली का सपना भी बेचती है। इन विज्ञापनों के माध्यम से यह धारणा बनाई जाती है कि सुंदरता, आकर्षण, आत्मविश्वास और आधुनिकता का संबंध विशेष कंपनियों के उत्पादों से है।

विज्ञापन में दिखाई देने वाले आकर्षक चेहरे और मनमोहक दृश्य उपभोक्ता के मन में एक ऐसी आकांक्षा पैदा करते हैं, जिसमें वह वस्तु की उपयोगिता से अधिक उसके साथ जुड़ी कल्पनाओं को खरीदने लगता है। उसे लगता है कि यदि वह भी उसी कंपनी के कपड़े पहनेगा, उसी ब्रांड का पेय पिएगा या उन्हीं सौंदर्य प्रसाधनों का इस्तेमाल करेगा, तो उसका व्यक्तित्व भी विज्ञापन के मॉडल जैसा आकर्षक बन जाएगा। इस तरह वस्तु की वास्तविक जरूरत पीछे छूट जाती है और उसके साथ जुड़ा हुआ सामाजिक प्रतिष्ठा का सपना अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।

यही बाजारवाद की सबसे बड़ी विशेषता है—वह केवल वस्तुएं नहीं बेचता, बल्कि इच्छाएं पैदा करता है। वह पहले व्यक्ति को यह महसूस कराता है कि उसके पास जो है, वह पर्याप्त नहीं है; फिर उस कमी को पूरा करने के लिए बाजार में मौजूद वस्तुओं की ओर उसका ध्यान खींचता है। इस प्रक्रिया में मनुष्य की सहज जरूरतें लगातार बढ़ती हुई उपभोक्ता इच्छाओं में बदलने लगती हैं।

एक समय था, जब सुंदरता का संबंध व्यक्ति के स्वास्थ्य, स्वभाव, व्यवहार, व्यक्तित्व और सहज आकर्षण से जोड़ा जाता था। लेकिन अब ‘सुंदर’ शब्द की जगह ‘स्मार्ट’ शब्द ने काफी हद तक ले ली है। स्मार्ट होने का अर्थ भी धीरे-धीरे विशेष तरह के कपड़े पहनने, आधुनिक दिखने, महंगे सामान इस्तेमाल करने और प्रचलित फैशन के अनुरूप स्वयं को प्रस्तुत करने से जोड़ दिया गया है।

यह बदलाव केवल भाषा का बदलाव नहीं है। इसके पीछे एक ऐसी व्यावसायिक मानसिकता काम करती है, जो व्यक्ति के आत्मविश्वास को उसके पहनावे और उपभोग की क्षमता से जोड़ना चाहती है। व्यक्ति कैसा है, उसकी सोच कैसी है, उसका व्यवहार कैसा है और वह समाज के प्रति कितना संवेदनशील है—इन सवालों की जगह इस बात को अधिक महत्व मिलने लगता है कि वह कैसा दिखाई देता है और किन ब्रांडों का इस्तेमाल करता है।

नतीजा यह है कि बाजार द्वारा निर्मित बाहरी आकर्षण को वास्तविक व्यक्तित्व का पर्याय बना दिया जाता है। व्यक्ति अपने भीतर की खूबियों को विकसित करने के बजाय बाहरी सजावट पर अधिक ध्यान देने लगता है। बाजार की इस व्यवस्था में व्यक्तित्व का मूल्यांकन भी धीरे-धीरे वस्तुओं और ब्रांडों के आधार पर होने लगता है।

फैशन की दुनिया में बाजार किस तरह हमारी सौंदर्य-दृष्टि को प्रभावित करता है, इसका एक दिलचस्प उदाहरण कपड़ों और दूसरी वस्तुओं की रंगों के आधार पर मैचिंग करने की प्रवृत्ति है।

रंगों की सुंदरता उनकी विविधता, उनके विरोधाभास और उनके उपयुक्त संयोजन में निहित होती है। अलग-अलग रंग जब एक-दूसरे के साथ संतुलित ढंग से मिलते हैं, तो वे एक आकर्षक दृश्य रचते हैं। राजस्थान की ग्रामीण महिलाओं के पारंपरिक परिधानों में रंगों का ऐसा ही सुंदर संसार दिखाई देता है। सीमित आर्थिक संसाधनों के बावजूद वे रंगों के सहज संयोजन से अपने पहनावे में एक अलग ही आकर्षण पैदा कर देती हैं।

लेकिन बाजार ने इस सहज सौंदर्य-बोध को भी उपभोग की एक नई व्यवस्था में बदलने की कोशिश की है। अब कपड़ों के साथ जूते, चप्पल, हैंडबैग, लिपस्टिक और दूसरी सजावटी वस्तुओं के रंगों का एक जैसा होना आधुनिकता और स्मार्टनेस का प्रतीक बताया जाने लगा है।

पहले एक-दो जोड़ी जूते, कुछ उपयोगी हैंडबैग और सीमित सौंदर्य प्रसाधनों से काम चल सकता था। लेकिन रंगों की मैचिंग का दबाव बढ़ने पर हर रंग के कपड़े के साथ उसी रंग के जूते, बैग और दूसरे सामान खरीदने की जरूरत महसूस होने लगती है। इस तरह एक साधारण-सी फैशन संबंधी पसंद बाजार के लिए अतिरिक्त बिक्री का अवसर बन जाती है।

विडंबना यह है कि फैशन के इस दबाव में कभी-कभी प्राकृतिक रंग-सौंदर्य को भी पीछे छोड़ दिया जाता है। कपड़ों के रंग से मेल बैठाने के लिए होंठों तक को अस्वाभाविक रंगों में रंगने की प्रवृत्ति इसी मानसिकता का उदाहरण है।

यहां सवाल किसी व्यक्ति की निजी पसंद का विरोध करना नहीं है। सवाल यह है कि क्या हमारी पसंद वास्तव में हमारी अपनी है, या उसे विज्ञापनों, फैशन उद्योग और बाजार की लगातार चलने वाली प्रचार मशीनरी के माध्यम से गढ़ा जा रहा है?

यदि कपड़ों और दूसरी वस्तुओं का चयन केवल व्यक्तिगत पसंद, उपयोगिता और आर्थिक जरूरतों के आधार पर होता, तो लोग एक ही वस्तु का लंबे समय तक इस्तेमाल कर सकते थे। अलग-अलग रंगों और डिजाइनों के कुछ कपड़ों को अदल-बदलकर पहनने से उनका उपयोग और अधिक समय तक किया जा सकता था।

लेकिन बाजार की समस्या यह है कि उसकी वृद्धि केवल लोगों की वास्तविक जरूरतों को पूरा करने से सुनिश्चित नहीं होती। उसे लगातार बढ़ती बिक्री भी चाहिए। इसलिए फैशन की दुनिया में नएपन का ऐसा वातावरण तैयार किया जाता है, जिसमें पुरानी वस्तुओं को जल्दी ही अप्रासंगिक और पुराना घोषित कर दिया जाता है।

इस साल का फैशनेबल परिधान अगले साल तक आउट ऑफ डेट बताया जाने लगता है। जूते, घड़ियां, बैग, चश्मे और दूसरे सामानों के मामले में भी यही प्रक्रिया दिखाई देती है। वस्तु पूरी तरह उपयोगी होती है, उसकी गुणवत्ता भी बनी रहती है, लेकिन बाजार उसके पुराने होने का एहसास पैदा कर देता है।

धीरे-धीरे व्यक्ति वस्तु की उपयोगिता से अधिक उसके फैशनेबल होने को महत्व देने लगता है। उसे आशंका होने लगती है कि पुराने डिजाइन के कपड़े पहनकर वह अपने मित्रों, सहकर्मियों या सामाजिक समूह में कम आधुनिक दिखाई देगा। सामाजिक प्रतिष्ठा की यह चिंता उसे अनावश्यक खरीदारी के लिए प्रेरित करती है।

इस प्रकार फैशन केवल पहनावे का मामला नहीं रह जाता, बल्कि वह सामाजिक स्वीकृति और आत्मसम्मान से भी जुड़ जाता है। व्यक्ति अपनी जरूरत के कारण नहीं, बल्कि दूसरों के सामने पीछे छूट जाने के डर से नई वस्तुएं खरीदने लगता है।

पश्चिमी देशों में प्रचलित ‘थ्रो-अवे कल्चर’, अर्थात इस्तेमाल के बाद वस्तुओं को जल्दी फेंक देने की संस्कृति, इसी उपभोक्तावादी मानसिकता का एक रूप है। इस संस्कृति में वस्तुओं की टिकाऊ उपयोगिता की तुलना में उनका नया होना अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। भारत में भी बदलती जीवनशैली, तेज फैशन और लगातार नए उत्पादों के प्रचार के साथ इस प्रवृत्ति के विभिन्न रूप दिखाई देने लगे हैं।

इसका असर केवल व्यक्ति की जेब पर नहीं पड़ता। अनावश्यक उत्पादन, तेजी से बढ़ता कचरा, संसाधनों की बर्बादी और पर्यावरण पर पड़ने वाला दबाव भी इस उपभोग संस्कृति के महत्वपूर्ण परिणाम हैं।

विज्ञापनों की चमक-दमक के पीछे एक महत्वपूर्ण आर्थिक सवाल भी छिपा है। कंपनियां अपने उत्पादों के प्रचार पर भारी धन खर्च करती हैं। महंगे मॉडल, बड़े-बड़े होर्डिंग, टेलीविजन विज्ञापन, फैशन शो, डिजिटल प्रचार और बाजार अनुसंधान—इन सब पर होने वाला खर्च आखिरकार कहां से आता है?

कंपनियां अपने उत्पादों की कीमत तय करते समय उत्पादन, वितरण, प्रचार और दूसरे व्यावसायिक खर्चों को ध्यान में रखती हैं। इसलिए विज्ञापन पर होने वाला खर्च भी किसी न किसी रूप में वस्तुओं की कीमत और कंपनी के व्यावसायिक गणित का हिस्सा बनता है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर वस्तु की कीमत में विज्ञापन का हिस्सा समान होता है या हर कंपनी का खर्च एक जैसा होता है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि बड़े पैमाने पर प्रचार की व्यवस्था बाजार की लागत और प्रतिस्पर्धा से अलग नहीं है।

विडंबना यह है कि जिस उपभोक्ता को विज्ञापन के माध्यम से अधिक खर्च करने के लिए प्रेरित किया जाता है, वही उपभोक्ता अंततः इस पूरी व्यावसायिक व्यवस्था को चलाने वाली खरीदारी का आधार भी बनता है।

इसके अतिरिक्त, कंपनियों के वैध व्यावसायिक खर्चों के लिए उपलब्ध कर-नियमों का भी आर्थिक महत्व है। पात्रता और लागू कानूनों के अनुसार विज्ञापन एवं अन्य व्यावसायिक खर्चों पर कर संबंधी कटौतियां मिल सकती हैं। हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि हर विज्ञापन खर्च सीधे उतनी ही राशि का सरकारी राजस्व कम कर देता है या उसका पूरा बोझ समान रूप से आम लोगों पर पड़ता है। कर व्यवस्था का वास्तविक प्रभाव कंपनी की आय, लागू नियमों और अन्य आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

फिर भी व्यापक प्रश्न अपनी जगह बना रहता है: क्या समाज के सीमित संसाधनों का इतना बड़ा हिस्सा ऐसी इच्छाएं पैदा करने और उपभोग बढ़ाने में लगाया जाना चाहिए, जिनकी आवश्यकता व्यक्ति को पहले महसूस भी नहीं होती थी?

जब बाजार में किसी वस्तु की उपयोगिता से अधिक उसके ब्रांड, पैकेजिंग और प्रचार पर ध्यान दिया जाने लगता है, तो आर्थिक गतिविधियों की प्राथमिकताओं पर विचार करना जरूरी हो जाता है। उत्पादन का उद्देश्य केवल अधिक बिक्री और अधिक मुनाफा होना चाहिए, या उसे मनुष्य की वास्तविक जरूरतों, सामाजिक कल्याण और पर्यावरणीय संतुलन से भी जुड़ना चाहिए?

बाजार आधुनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। वस्तुओं का उत्पादन, व्यापार और विज्ञापन अपने आप में गलत नहीं हैं। विज्ञापन उपभोक्ताओं तक उपयोगी जानकारी पहुंचा सकते हैं, नए उत्पादों से परिचित करा सकते हैं और कारोबार को आगे बढ़ाने में भी भूमिका निभा सकते हैं। समस्या तब पैदा होती है, जब विज्ञापन जानकारी देने के बजाय असंतोष पैदा करने लगते हैं; जब वस्तुओं की उपयोगिता से अधिक उनके साथ जुड़ी सामाजिक प्रतिष्ठा बेची जाती है; और जब मनुष्य को यह विश्वास दिलाया जाता है कि उसकी पहचान उसके पास मौजूद ब्रांडों से तय होती है।

इसलिए जरूरत बाजार को पूरी तरह नकारने की नहीं, बल्कि उसके प्रति विवेकपूर्ण दृष्टिकोण विकसित करने की है। हमें यह समझना होगा कि फैशन बदलने से किसी वस्तु की वास्तविक उपयोगिता समाप्त नहीं हो जाती। महंगा ब्रांड किसी व्यक्ति को अपने आप अधिक सुंदर, अधिक बुद्धिमान या अधिक संवेदनशील नहीं बना देता। बाहरी सजावट व्यक्तित्व का एक हिस्सा हो सकती है, लेकिन वह व्यक्तित्व का संपूर्ण परिचय नहीं है।

समाज में ऐसी समझ विकसित होनी चाहिए, जिसमें व्यक्ति का सम्मान उसके कपड़ों, जूतों, गाड़ियों और ब्रांडों के आधार पर नहीं, बल्कि उसके विचारों, व्यवहार, श्रम और सामाजिक योगदान के आधार पर किया जाए।

आर्थिक रूप से भी विवेकपूर्ण उपभोग जरूरी है। वस्तु खरीदने से पहले यह विचार करना चाहिए कि उसकी वास्तव में जरूरत है या नहीं, उसकी गुणवत्ता कैसी है और उसका उपयोग कितने समय तक किया जा सकता है। टिकाऊ वस्तुओं को प्राथमिकता देना, उपयोगी कपड़ों को केवल फैशन बदलने के कारण न छोड़ना और विज्ञापनों के प्रभाव में आकर अनावश्यक खरीदारी से बचना व्यक्ति की आर्थिक स्वतंत्रता के साथ-साथ पर्यावरण के लिए भी उपयोगी है।

अंततः सवाल यह है कि हम अपनी जरूरतों के अनुसार बाजार का इस्तेमाल कर रहे हैं या बाजार हमारी इच्छाओं को नियंत्रित करके हमें अपने अनुसार चला रहा है?

यदि सुंदरता की परिभाषा कंपनियां तय करेंगी, आधुनिकता का पैमाना फैशन उद्योग बनाएगा और सामाजिक प्रतिष्ठा का निर्धारण ब्रांड करेंगे, तो मनुष्य धीरे-धीरे अपनी स्वतंत्र पसंद और सहज व्यक्तित्व से दूर होता जाएगा।

एक स्वस्थ समाज वही होगा, जहां सुंदर दिखने के लिए महंगे ब्रांड की अनिवार्यता न हो, आधुनिक होने के लिए हर साल फैशन बदलना जरूरी न हो और सम्मान पाने के लिए व्यक्ति को अपनी आर्थिक क्षमता से अधिक खर्च न करना पड़े।

क्योंकि मनुष्य की असली पहचान उसके द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली वस्तुओं में नहीं, बल्कि उसके विचारों, संवेदनाओं, व्यवहार और जीवन-मूल्यों में होती है। बाजार को हमारी जरूरतें पूरी करनी चाहिए, हमारी जरूरतों और इच्छाओं का मालिक नहीं बन जाना चाहिए।

  • Related Posts

    अमीरों पर टैक्स लगाओ और सभी को शिक्षा, स्वास्थ्य, एवं रोजगार की गारंटी दो : आर्थिक न्याय की वकालत
    • TN15TN15
    • October 19, 2026

    एस आर दारापुरी  भारत दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं…

    Continue reading
    उत्तर प्रदेश और केरल: विकास सूचकांकों, मानव विकास और सामाजिक रूपांतरण का तुलनात्मक अध्ययन

    एस आर दारापुरी   विकास को केवल आर्थिक वृद्धि,…

    Continue reading

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    You Missed

    तेजप्रताप यादव के घर पूजा में सारी लालू फैमिली, सिर्फ तेजस्वी यादव नहीं आए!

    • By TN15
    • October 19, 2026
    तेजप्रताप यादव के घर पूजा में सारी लालू फैमिली, सिर्फ तेजस्वी यादव नहीं आए!

    Opinion: दवाएं सस्ती करना काफी नहीं, भारत में गैर जरूरी दवाएं लिखने, ज्यादा जांच कराने की आदत

    • By TN15
    • October 19, 2026
    Opinion: दवाएं सस्ती करना काफी नहीं, भारत में गैर जरूरी दवाएं लिखने, ज्यादा जांच कराने की आदत

    बाजारवाद का मायाजाल: जब सुंदरता भी बाजार की गुलाम हो गई

    • By TN15
    • October 19, 2026
    बाजारवाद का मायाजाल: जब सुंदरता भी बाजार की गुलाम हो गई

    यूपी में हर सीट का हिसाब लगा रही सपा, अखिलेश यादव ने बनाई खास रणनीति

    • By TN15
    • October 19, 2026
    यूपी में हर सीट का हिसाब लगा रही सपा, अखिलेश यादव ने बनाई खास रणनीति

    लॉरेंस के गैंग : कितने लोग हैं और कहां-कहां फैलाई दहशत?

    • By TN15
    • October 19, 2026
    लॉरेंस के गैंग : कितने लोग हैं और कहां-कहां फैलाई दहशत?

     टाइगर श्रॉफ फायरिंग केस, तीन शूटर गिरफ्तार, तीनों मुंबई से जा रहे थे दिल्ली

    • By TN15
    • October 19, 2026
     टाइगर श्रॉफ फायरिंग केस, तीन शूटर गिरफ्तार, तीनों मुंबई से जा रहे थे दिल्ली