2023 में चुनाव आयुक्तों के खिलाफ कोई एफआईआर दर्ज न होने का कानून बनाने के पीछे चुनाव में खेल करने की नीयत थी सरकार की
विपक्ष के सड़कों पर उतरने पर दोनों चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी भी खुलकर आ सकते हैं सामने
चरण सिंह
देश में सत्तापक्ष की मनमानी इसलिए बढ़ रही है क्योंकि विपक्ष जमीनी संघर्ष नहीं कर पा रहा है बस बयानबाजी तक सिमट कर रह जा रहा है। इंडियन एक्सप्रेस में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की पोल खुलने के बाद भी विपक्ष सड़कों पर नहीं उतर पाया। बयानों के दम पर चुनाव आयोग और केंद्र सरकार को घेरने में लगा है। सरकार की घेराबंदी में विपक्ष लगातार गलती कर रहा है। 2023 में जब चुनाव आयुक्त के खिलाफ कोई एफआईआर दर्ज न होने का कानून केंद्र सरकार ने बनाया तो विपक्ष को समझ लेना चाहिए था कि सरकार चुनाव आयोग से ऐसा कुछ कराने जा रही जो आपराधिक है। उसी समय सड़कों पर उतरकर यह कानून वापस कराना चाहिए था। अंदोलन के दम पर किसान तीन कानून वापस करा सकते हैं पर विपक्ष नहीं करा पाया।
चुनाव आयोग के दम पर जब बिहार विधानसभा चुनाव जीता गया तो विपक्ष ने चुनावों का बहिष्कार क्यों नहीं किया ? जब चुनाव हारने के बाद ममता बनर्जी ने चुनाव को अवैध करार दिया तो फिर सड़कों पर क्यों नहीं उतरीं। सभी दल चुनाव में धांधली बताते रहे और चुनाव भी लड़ते रहे। क्यों नहीं चुनाव का बहिष्कार किया गया ? अब जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की पूरी तरह से पोल खुल चुकी है तो फिर विपक्ष चुनाव आयोग कार्यालय का घेराव क्यों नहीं कर पाया ?
विपक्ष को यह बात भलीभांति समझ लेनी चाहिए कि जब तक सड़कों पर नहीं उतरा जाएगा। तब तक सरकार पर कोई दबाव नहीं पड़ने वाला है। हो सकता है कि विपक्ष के सड़कों पर उतरने के बाद ज्ञानेश कुमार को कटघरे में खड़ा करने वाले दूसरे चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी भी खुलकर सामने आ जाएं। यदि अभी भी विपक्ष बयानबाजी तक ही सीमित रहा तो सरकार की मनमानी और बढ़ेगी। बिल्ली के भाग से छींका टूटने की नीयत से कोई बदलाव नहीं होने जा रहा है। देश का युवा सरकार को बैकफुट पर धकेल सकता है। शिक्षा मंत्री का इस्तीफा ले सकता है पर विपक्ष सरकार पर दबाव नहीं बना पा रहा है। एक भी मुद्दे पर एकजुटता दिखाकर आंदोलन नहीं कर पा रहा है।
दरअसल द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि गत साल स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न यानी एसआईआर अभियान के दौरान चुनाव आयुक्तों को कई फ़ैसलों की जानकारी नहीं दी गई थी और दोनों चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मुख्य चुनाव आयुक्त के फ़ैसलों पर बार-बार आपत्ति जताई थी। इंडियन एक्सप्रेस की जर्नलिस्ट रितिका चोपड़ा ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में आयोग के कई फ़ैसलों पर आपत्ति दर्ज की।
दरअसल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का कार्यकाल विवादों में घिरा रहा है। वह अपने कई फ़ैसलों को लेकर विपक्ष के निशाने पर रहे हैं। ज्ञानेश कुमार पर इसलिए भी आरोप लग रहे हैं क्योंकि उन्होंने इससे पहले पांच साल गृह मंत्रालय में काम किया है। वह मई 2016 से लेकर सितंबर 2018 तक संयुक्त सचिव और उसके बाद सितंबर 2018 से लेकर अप्रैल 2021 तक अतिरिक्त सचिव के पद पर थे।
यह माना जा रहा है कि गृह मंत्री अमित शाह ने चुनाव में खेल करने के लिए ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त बनवाया है। एसआईआर भी इसी का ही हिस्सा है। ज्ञानेश कुमार का बड़ा खेल यह है कि एसआईआर में दस्तावेजों में खामियां बताकर बड़े स्तर पर नाम कटवाते हैं। जिसमें बीजेपी समर्थक भी होते हैं।
असली खेल नाम जुड़वाने में होता है। लगभग 90 प्रतिशत जुड़ने वाले नाम बीजेपी कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों के अनुसार जुड़ते हैं। जैसे उत्तर प्रदेश में लगभग ढाई करोड़ नाम काटे गए। उसमें बीजेपी समर्थक भी थे। यही वजह रही कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बोला था कि बड़े स्तर पर बीजेपी समर्थकों के नाम काटे गए हैं। बाद में 80 लाख नाम जोड़े गए। जोड़े गए नाम अधिकतर बीजेपी समर्थक बताए जा रहे हैं। पश्चिम बंगाल में तो 27 लाख मतदाताओं के नाम नाम ही वोटर लिस्ट से हटा दिए गए। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का रुख भी गैरजिम्मेदाराना रहा। इन मतदाताओं को अगली बार वोट डालने को कह दिया गया।

