बाल्मीकि रामायण में हमने यह पढ़ा कि चैत्र मास में श्री राम के राज्याभिषेक के लिए तैयारी करने का आदेश महाराज दशरथ ने वशिष्ठ मुनि आदि को दिया । तथा अगले दिन जब पुष्य नक्षत्र होगा तब युवराज पद राम को सौंपने के लिए कहा। राम ने भी पिताजी की आज्ञा से राजभार ग्रहण करने का आदेश स्वीकार किया।
लेकिन रानी कैकेई ने विघ्न उत्पन्न किया। राम को 14 वर्ष का वनवास और भरत को राज सिंहासन दिलाने की बात राजा दशरथ से कहीं।
राजा दशरथ राम को वन नहीं भेजना चाहते थे तथा कैकेई ने ही राम को वन में जाने का आदेश राजा दशरथ की ओर से दिया।
ये तथ्य बाल्मीकि रामायण के अनुसार निश्चित हो चुके।
अब हम इससे आगे पढ़ेंगे।
राम के वनवास चले जाने के पश्चात राजा दशरथ को छठे दिन श्रवण कुमार वध की स्मृति आई और स्वप्न आया। श्रवण कुमार के पिता ने जो श्राप दिया था वह महाराज दशरथ को दिखाई देने लगा।
प्रसंगवश यह भी थोड़ा सा ध्यान रखें कि
श्री राम को वनवास जाते समय पहले रात्रि का विश्राम गंगा नदी के किनारे पर निषाद राज के साथ वर्तमान के जनपद प्रतापगढ़ में इलाहाबाद के मध्य बहती हुई गंगा नदी के किनारे पर श्रृंगवेर पुरम (महर्षि श्रंग की तपोस्थली ) में करना पड़ा। दूसरी रात्रि का विश्राम गंगा जमुना के संगम पर प्रयाग में भरद्वाज ऋषि के आश्रम में किया और तीसरे दिन हुए चित्रकूट पहुंचे।
इससे आगे पढ़ने के लिए पृष्ठ संख्या 147 बाल्मीकि रामायण, अयोध्या कांड, सर्ग 48 में निम्न प्रकार उल्लेख आता है।
“श्री राम के वन जाने के पश्चात छठी रात को आधी रात के समय महाराज दशरथ को अपने एक पाप व्रत का स्मरण हो आया”
उन्होंने अपनी पत्नी कौशल्या से कहा”
हे कल्याणी! मनुष्य अच्छा या बुरा जैसा भी काम करता है उस भले या बुरे कर्म का फल कर्ता को अवश्य मिलता है।”
पृष्ठ संख्या 150 व 151 पर निम्न प्रकार पढ़ें।
“जिस प्रकार आज मैं पुत्र वियोग से दुखी हो रहा हूं उसी प्रकार तुम भी अपने प्राणप्रिय पुत्र के शोक में प्राण त्यागोगे ”
ऐसा जो श्रवण के पिता ने कहा था उसको याद करते हैं।
“कौशल्या और सुमित्रा महाराज को देखकर तथा उनके शरीर को स्पर्श कर उन्हें मृतक जान हा नाथ! कह कर चिल्लाती पछाड़ खाकर पृथ्वी पर गिर पड़ी”
अर्थात राम के वन गमन के पश्चात छठवीं रात में दशरथ महाराज की मृत्यु हो गई।
पृष्ठ संख्या 152 पर निम्न प्रकार पढ़ें।
“मंत्री लोगों ने तेलपूर्ण पात्र में महाराज के शव को रख दिया जिससे शव बिगड़े नहीं।”
उन्होंने दाह संस्कार करना स्वयं उचित नहीं समझा बल्कि उनके पुत्रों की अनुपस्थिति में भरत और शत्रुघ्न को बुलाने के लिए दूत भेजा। इस प्रकार राम वनगमन की बाद की सातवीं रात गुजर गई।
भरत और शत्रुघ्न को नाना के घर कैकेय देश से बुलाने के लिए दूत भेजा गया ।वह नाना के घर से वापस लौटे। लेकिन दूत का जाना और लौटकर भरत शत्रुघ्न के साथ आना इसमें कितना समय लगा यह बाल्मीकि रामायण में इस प्रकार लिखा गया है।
परंतु पृष्ठ संख्या 156 पर प्रकार पढ़ें।
लेकिन जिस दिन वह दूत चले उसी रात गिरिवृज नामक नगर में प्रविष्ट हो गए जो महारानी कैकेई के पिता राजा पशुपति की राजधानी थी। अतः इसको आठवीं रात माना जा सकता है।
पृष्ठ संख्या 159 पर पढ़ें।
“अतः अपने नाना अश्वपति और मामा युद्ध जीत से आज्ञा मांग शत्रुघ्न सहित रथ में सवार हो भरत ने वहां से प्रस्थान किया”।
160 पर पढ़ें।
“पराक्रमी भरत राजगृह से निकलकर पूर्व की ओर चले और घोड़े के थक जाने पर भी बहुत शीघ्र ही वे अयोध्या नगरी में पहुंच गए.”
भरत के लौटने के बाद दाह संस्कार की तैयारी वशिष्ठ मुनि जी ने करवाई।
पृष्ठ संख्या 1 72 पर पढ़ें।
“महाराज के मृत शरीर को तेल पात्र से निकलकर भूमि पर रखा गया ।तेल में पड़े रहने के कारण शरीर पीला पड़ गया था। तथापि ऐसा जान पड़ता था कि वह गाढ निद्रा में सो रहे हैं”
अंत्येष्टि करने के बाद की स्थिति क्या है?
पृष्ठ संख्या 173 पर पढ़ें।
“भरत के साथ मंत्री पुरोहित और रानियां ने सरयू नदी में स्नान किया। स्नान से निवृत हो सब लोग आंखों में आंसू बहाते हुए नगर में प्रविष्ट हुए तथा व्रतपूर्वक भूमि पर शयन करते हुए 10 दिन तक राजकीय शोक मनाया।”
अब हम देखते हैं कि राम वन- गमन के पश्चात छठवें दिन राजा दशरथ की मृत्यु होती है। उसके बाद भरत को दूत के माध्यम से बुलाने में दो दिन लगे ।तीसरे दिन राजा दशरथ की अंतिम संस्कार का कार्यक्रम होता है ।उसके बाद 10 दिन तक शोक मनाया जाता है। यह कल समय 19 दिन का होता है।
पृष्ठ संख्या 175 सर्ग 61 पर निबंध प्रकार पढ़ें।
“14वें दिन प्रातः काल सब मंत्री गण मिलकर भरत जी के पास आए और उनसे कहने लगे ,
“हे महा यशस्वी राजकुमार!
अब तुम हमारे राजा बनो ।आप अपना राज्याभिषेक कर हम सब का पालन करो।”
लेकिन भरत अपने भाई राम को वापस लेने के लिए अपनी यात्रा की तैयारी की घोषणा मंत्री सुमंत्र से कराते हैं।
यहां चौदहवें दिन का तात्पर्य है महाराज दशरथ की मृत्यु के उपरांत का है और उससे 6 दिन पहले राम वन चले गए थे अर्थात यह बात 20वें दिन की होती हैं।
पृष्ठ संख्या 178 निम्न प्रकार पढ़ें।
“रथ, घोड़े, हाथी और अन्य सवारियों के द्वारा बहुत दूर चलने के पश्चात ये लोग श्रंगवेरपुरम के पास गंगा के तट पर पहुंचे जहां पर अपने बंधु बंधावों से युक्त राम का परम मित्र वीर निषादराज सावधानी के साथ उस देश का पालन करता हुआ निवास करता था”
संख्या 179 पर ऐसे लिखा है
“आज यहीं विश्राम कर कल हम इस नदी को पार करेंगे”
इस प्रकार राम को वन गए यहां तक 21 दिन हो चुके थे।
पृष्ठ संख्या 181, तथा 64 वां सर्ग।
,”नाविकों ने उस पुण्य ध्वजा पताका वाली विशाल वाहिनी को गंगा के उस पार उतार दिया सूर्योदय के तीसरे प्रहर मैत्र नामक मुहूर्त में उस सेना ने प्रयाग वन की ओर प्रस्थान किया।”
पृष्ठ संख्या 183 पर पढ़ें।
“राजकुमार भरत ने ऋषि की आज्ञा मान रात भर ऋषि के आश्रम में रहना स्वीकार कर लिया”
अर्थात उस रात को भरत अपनी सुना सहित भरद्वाज ऋषि के आश्रम प्रयाग में गंगा जमुना के संगम तट पर रुके।
तथा अगले दिन भारद्वाज ऋषि से आज्ञा मांगकर चित्रकूट के लिए प्रस्थान किया।
हम केवल काल गणना के दृष्टिकोण से संदर्भ प्रस्तुत कर रहे हैं पूरा प्रकरण आप स्वयं रामायण से पढ़ सकते हैं।
चित्रकूट पहुंचने पर राम ने अपने भाई को हृदय से लगाया। यह राम का वन में 22 वां दिन था। जब भारत उनके पास पहुंचे।
पृष्ठ संख्या 200 पर 74 वां सर्ग।
शुभचिंतक बंधु बांधवों और मित्र मंडल से घिरे नरशार्दूल उन राजकुमारों की वह सारी रात सोच ही सोच में दुख पूर्वक व्यतीत हो गई। प्रातः काल होने पर बंधु बंधावों सहित भरत आदि सभी भाइयों ने मंदाकिनी नदी पर जा स्नान ,संध्या और यज्ञ आदि नित्य कर्म किए तथा वे सब राम के समीप लौट आए।
पृष्ठ संख्या 203
“यद्यपि भरतजी दुखी होकर गिड़गिड़ा कर श्री राम के चरणों में अपना सिर रखकर बार-बार उन्हें मना रहे थे। तथापि राम पिताजी की आज्ञा पालन में ऐसे कटिबद्ध थे कि वे तनिक भी विचलित नहीं हुए अर्थात उन्होंने अयोध्या लौटना स्वीकार नहीं किया।_”
अंत में भरत ने रामचंद्र जी से कहा।
पृष्ठ संख्या 212 एवं 213
“हे वीर रघुनंदन!
मैं भी 14 वर्ष तक जटा चीर धारण कर और कंदमूल फल खाकर अपना जीवन निर्वाह करूंगा। आपके आगमन की प्रतीक्षा करता हुआ मैं नगर से बाहर बसूंगा। परंतु आपकी चरण पादुकाओं को राज सिंहासन पर रखकर रखकर मैं राज्य शासन का प्रबंध करूंगा।
जिस बात के लिए इतना प्रकरण मैंने लिखा वह अभी तक भूमिका थी। अब मैं उस महत्वपूर्ण तथ्य को आपके समक्ष प्रस्तुत करना चाहता हूं।
भरत अपने बड़े भाई राम से क्या कहते हैं ।
“है रघुकुल श्रेष्ठ !
यदि 14वां वर्ष पूर्ण हो जाने पर पहले दिन ही मैंने अयोध्या में आपके दर्शन नहीं किए तो मैं अग्नि में कूद कर भस्म हो जाऊंगा।”
इस अयोध्या कांड के प्रसंगों को पढ़ने के उपरांत मैं सीधे आपको युद्ध कांड के आवश्यक प्रसंग की तरफ ले चलना चाहूंगा।
रावण से युद्ध करते हुए राम की सेना ने बहुत कुछ तहस-नहस जब कर दिया तो एक दिन चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी आई और उस दिन रावण ने स्वयं अगले दिन अमावस्या को युद्ध करने का प्रण लिया। रावण कहता है अपनी सेना के लिए,
“आज कृष्णपक्ष (चैत्र कृष्ण पक्ष) की चतुर्दशी है आज आप युद्ध की पूर्ण तैयारी कीजिए और कल अमावस्या को सी को साथ ले विजय के लिए दुर्ग से बाहर निकलिए”
राम रावण युद्ध 10 दिन चला था और चतुर्दशी को 9 दिन हो चुके थे दसवां दिन अमावस्या का अगला आने वाला था जिस दिन रावण का वध होगाचौथा प्रश्न है कि रामचंद्र जी के 14 वर्ष वनवास के कौन से महीने में पूरे हुए?
बाल्मीकि रामायण में हमने यह पढ़ा कि चैत्र मास में श्री राम के राज्याभिषेक के लिए तैयारी करने का आदेश महाराज दशरथ ने वशिष्ठ मुनि आदि को दिया । तथा अगले दिन जब पुष्य नक्षत्र होगा तब युवराज पद राम को सौंपने के लिए कहा। राम ने भी पिताजी की आज्ञा से राजभार ग्रहण करने का आदेश स्वीकार किया।
लेकिन रानी कैकेई ने विघ्न उत्पन्न किया। राम को 14 वर्ष का वनवास और भरत को राज सिंहासन दिलाने की बात राजा दशरथ से कहीं।
राजा दशरथ राम को वन नहीं भेजना चाहते थे तथा कैकेई ने ही राम को वन में जाने का आदेश राजा दशरथ की ओर से दिया।
ये तथ्य बाल्मीकि रामायण के अनुसार निश्चित हो चुके।
अब हम इससे आगे पढ़ेंगे।
राम के वनवास चले जाने के पश्चात राजा दशरथ को छठे दिन श्रवण कुमार वध की स्मृति आई और स्वप्न आया। श्रवण कुमार के पिता ने जो श्राप दिया था वह महाराज दशरथ को दिखाई देने लगा।
प्रसंगवश यह भी थोड़ा सा ध्यान रखें कि
श्री राम को वनवास जाते समय पहले रात्रि का विश्राम गंगा नदी के किनारे पर निषाद राज के साथ वर्तमान के जनपद प्रतापगढ़ में इलाहाबाद के मध्य बहती हुई गंगा नदी के किनारे पर श्रृंगवेर पुरम (महर्षि श्रंग की तपोस्थली ) में करना पड़ा। दूसरी रात्रि का विश्राम गंगा जमुना के संगम पर प्रयाग में भरद्वाज ऋषि के आश्रम में किया और तीसरे दिन हुए चित्रकूट पहुंचे।
इससे आगे पढ़ने के लिए पृष्ठ संख्या 147 बाल्मीकि रामायण, अयोध्या कांड, सर्ग 48 में निम्न प्रकार उल्लेख आता है।
“श्री राम के वन जाने के पश्चात छठी रात को आधी रात के समय महाराज दशरथ को अपने एक पाप व्रत का स्मरण हो आया”
उन्होंने अपनी पत्नी कौशल्या से कहा”
हे कल्याणी! मनुष्य अच्छा या बुरा जैसा भी काम करता है उस भले या बुरे कर्म का फल कर्ता को अवश्य मिलता है।”
पृष्ठ संख्या 150 व 151 पर निम्न प्रकार पढ़ें।
“जिस प्रकार आज मैं पुत्र वियोग से दुखी हो रहा हूं उसी प्रकार तुम भी अपने प्राणप्रिय पुत्र के शोक में प्राण त्यागोगे ”
ऐसा जो श्रवण के पिता ने कहा था उसको याद करते हैं।
“कौशल्या और सुमित्रा महाराज को देखकर तथा उनके शरीर को स्पर्श कर उन्हें मृतक जान हा नाथ! कह कर चिल्लाती पछाड़ खाकर पृथ्वी पर गिर पड़ी”
अर्थात राम के वन गमन के पश्चात छठवीं रात में दशरथ महाराज की मृत्यु हो गई।
पृष्ठ संख्या 152 पर निम्न प्रकार पढ़ें।
“मंत्री लोगों ने तेलपूर्ण पात्र में महाराज के शव को रख दिया जिससे शव बिगड़े नहीं।”
उन्होंने दाह संस्कार करना स्वयं उचित नहीं समझा बल्कि उनके पुत्रों की अनुपस्थिति में भरत और शत्रुघ्न को बुलाने के लिए दूत भेजा। इस प्रकार राम वनगमन की बाद की सातवीं रात गुजर गई।
भरत और शत्रुघ्न को नाना के घर कैकेय देश से बुलाने के लिए दूत भेजा गया ।वह नाना के घर से वापस लौटे। लेकिन दूत का जाना और लौटकर भरत शत्रुघ्न के साथ आना इसमें कितना समय लगा यह बाल्मीकि रामायण में इस प्रकार लिखा गया है।
परंतु पृष्ठ संख्या 156 पर प्रकार पढ़ें।
लेकिन जिस दिन वह दूत चले उसी रात गिरिवृज नामक नगर में प्रविष्ट हो गए जो महारानी कैकेई के पिता राजा पशुपति की राजधानी थी। अतः इसको आठवीं रात माना जा सकता है।
पृष्ठ संख्या 159 पर पढ़ें।
“अतः अपने नाना अश्वपति और मामा युद्ध जीत से आज्ञा मांग शत्रुघ्न सहित रथ में सवार हो भरत ने वहां से प्रस्थान किया”।
160 पर पढ़ें।
“पराक्रमी भरत राजगृह से निकलकर पूर्व की ओर चले और घोड़े के थक जाने पर भी बहुत शीघ्र ही वे अयोध्या नगरी में पहुंच गए.”
भरत के लौटने के बाद दाह संस्कार की तैयारी वशिष्ठ मुनि जी ने करवाई।
पृष्ठ संख्या 1 72 पर पढ़ें।
“महाराज के मृत शरीर को तेल पात्र से निकलकर भूमि पर रखा गया ।तेल में पड़े रहने के कारण शरीर पीला पड़ गया था। तथापि ऐसा जान पड़ता था कि वह गाढ निद्रा में सो रहे हैं”
अंत्येष्टि करने के बाद की स्थिति क्या है?
पृष्ठ संख्या 173 पर पढ़ें।
“भरत के साथ मंत्री पुरोहित और रानियां ने सरयू नदी में स्नान किया। स्नान से निवृत हो सब लोग आंखों में आंसू बहाते हुए नगर में प्रविष्ट हुए तथा व्रतपूर्वक भूमि पर शयन करते हुए 10 दिन तक राजकीय शोक मनाया।”
अब हम देखते हैं कि राम वन- गमन के पश्चात छठवें दिन राजा दशरथ की मृत्यु होती है। उसके बाद भरत को दूत के माध्यम से बुलाने में दो दिन लगे ।तीसरे दिन राजा दशरथ की अंतिम संस्कार का कार्यक्रम होता है ।उसके बाद 10 दिन तक शोक मनाया जाता है। यह कल समय 19 दिन का होता है।
पृष्ठ संख्या 175 सर्ग 61 पर निबंध प्रकार पढ़ें।
“14वें दिन प्रातः काल सब मंत्री गण मिलकर भरत जी के पास आए और उनसे कहने लगे ,
“हे महा यशस्वी राजकुमार!
अब तुम हमारे राजा बनो ।आप अपना राज्याभिषेक कर हम सब का पालन करो।”
लेकिन भरत अपने भाई राम को वापस लेने के लिए अपनी यात्रा की तैयारी की घोषणा मंत्री सुमंत्र से कराते हैं।
यहां चौदहवें दिन का तात्पर्य है महाराज दशरथ की मृत्यु के उपरांत का है और उससे 6 दिन पहले राम वन चले गए थे अर्थात यह बात 20वें दिन की होती हैं।
पृष्ठ संख्या 178 निम्न प्रकार पढ़ें।
“रथ, घोड़े, हाथी और अन्य सवारियों के द्वारा बहुत दूर चलने के पश्चात ये लोग श्रंगवेरपुरम के पास गंगा के तट पर पहुंचे जहां पर अपने बंधु बंधावों से युक्त राम का परम मित्र वीर निषादराज सावधानी के साथ उस देश का पालन करता हुआ निवास करता था”
संख्या 179 पर ऐसे लिखा है
“आज यहीं विश्राम कर कल हम इस नदी को पार करेंगे”
इस प्रकार राम को वन गए यहां तक 21 दिन हो चुके थे।
पृष्ठ संख्या 181, तथा 64 वां सर्ग।
,”नाविकों ने उस पुण्य ध्वजा पताका वाली विशाल वाहिनी को गंगा के उस पार उतार दिया सूर्योदय के तीसरे प्रहर मैत्र नामक मुहूर्त में उस सेना ने प्रयाग वन की ओर प्रस्थान किया।”
पृष्ठ संख्या 183 पर पढ़ें।
“राजकुमार भरत ने ऋषि की आज्ञा मान रात भर ऋषि के आश्रम में रहना स्वीकार कर लिया”
अर्थात उस रात को भरत अपनी सुना सहित भरद्वाज ऋषि के आश्रम प्रयाग में गंगा जमुना के संगम तट पर रुके।
तथा अगले दिन भारद्वाज ऋषि से आज्ञा मांगकर चित्रकूट के लिए प्रस्थान किया।
हम केवल काल गणना के दृष्टिकोण से संदर्भ प्रस्तुत कर रहे हैं पूरा प्रकरण आप स्वयं रामायण से पढ़ सकते हैं।
चित्रकूट पहुंचने पर राम ने अपने भाई को हृदय से लगाया। यह राम का वन में 22 वां दिन था। जब भारत उनके पास पहुंचे।
पृष्ठ संख्या 200 पर 74 वां सर्ग।
शुभचिंतक बंधु बांधवों और मित्र मंडल से घिरे नरशार्दूल उन राजकुमारों की वह सारी रात सोच ही सोच में दुख पूर्वक व्यतीत हो गई। प्रातः काल होने पर बंधु बंधावों सहित भरत आदि सभी भाइयों ने मंदाकिनी नदी पर जा स्नान ,संध्या और यज्ञ आदि नित्य कर्म किए तथा वे सब राम के समीप लौट आए।
पृष्ठ संख्या 203
“यद्यपि भरतजी दुखी होकर गिड़गिड़ा कर श्री राम के चरणों में अपना सिर रखकर बार-बार उन्हें मना रहे थे। तथापि राम पिताजी की आज्ञा पालन में ऐसे कटिबद्ध थे कि वे तनिक भी विचलित नहीं हुए अर्थात उन्होंने अयोध्या लौटना स्वीकार नहीं किया।_”
अंत में भरत ने रामचंद्र जी से कहा।
पृष्ठ संख्या 212 एवं 213
“हे वीर रघुनंदन!
मैं भी 14 वर्ष तक जटा चीर धारण कर और कंदमूल फल खाकर अपना जीवन निर्वाह करूंगा। आपके आगमन की प्रतीक्षा करता हुआ मैं नगर से बाहर बसूंगा। परंतु आपकी चरण पादुकाओं को राज सिंहासन पर रखकर रखकर मैं राज्य शासन का प्रबंध करूंगा।
जिस बात के लिए इतना प्रकरण मैंने लिखा वह अभी तक भूमिका थी। अब मैं उस महत्वपूर्ण तथ्य को आपके समक्ष प्रस्तुत करना चाहता हूं।
भरत अपने बड़े भाई राम से क्या कहते हैं ।
“है रघुकुल श्रेष्ठ !
यदि 14वां वर्ष पूर्ण हो जाने पर पहले दिन ही मैंने अयोध्या में आपके दर्शन नहीं किए तो मैं अग्नि में कूद कर भस्म हो जाऊंगा।”
इस अयोध्या कांड के प्रसंगों को पढ़ने के उपरांत मैं सीधे आपको युद्ध कांड के आवश्यक प्रसंग की तरफ ले चलना चाहूंगा।
रावण से युद्ध करते हुए राम की सेना ने बहुत कुछ तहस-नहस जब कर दिया तो एक दिन चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी आई और उस दिन रावण ने स्वयं अगले दिन अमावस्या को युद्ध करने का प्रण लिया। रावण कहता है अपनी सेना के लिए,
“आज कृष्णपक्ष (चैत्र कृष्ण पक्ष) की चतुर्दशी है आज आप युद्ध की पूर्ण तैयारी कीजिए और कल अमावस्या को सेना को साथ ले विजय के लिए दुर्ग से बाहर निकलिए”
राम- रावण युद्ध 10 दिन चला था और चतुर्दशी को 9 दिन हो चुके थे । दसवां दिन अमावस्या का अगला आने वाला दिन था। जिस दिन रावण का वध होगा।
पृष्ठ संख्या 551 युद्ध कांड स्वर्ग 59 पर निम्न प्रकार उल्लेख आता है।
“श्री राम ने अत्यंत क्रुद्ध हो धनुष को कान तक खींचा और समस्त मर्म स्थलों को विदीर्ण करने वाले उस बाण को बड़े वेग के साथ रावण के ऊपर छोड़ा, शरीर का नाश करने वाले महावेग से छूटे हुए उस बाण ने दुरात्मा रावण का हृदय विदीर्ण कर डाला। ब्रह्मास्त्र के आघात से रावण के प्राण पखेरु के उड़ते ही बाण सहित धनुष उसके हाथ से छूटकर नीचे गिर पड़ा। प्राणों के निकलते ही महावेगवान और महाप्रतापी राक्षस राज रावण रथ से भूमि पर ऐसे लुढ़क पड़ा जैसे इंद्र द्वारा वज्र से मर गया वृत्र लुढ़क पड़ा था। रावण का भूमि पर पड़ा देख युद्धमें मरने से बच्चे राक्षस रक्षक के मारे जाने से भयभीत हो इधर-उधर भाग गए उधर विजई वानरों ने अत्यंत हर्षित हो हर्षनाद किया और राम की जय और रावण के वध के नारे लगाए।”
युद्ध कांड सर्ग 62 पेज 555 पर इस प्रकार का वर्णन आता है।
“श्री राम के इन उदार वचनों को सुन विभीषण शीघ्रता पूर्वक अपने भाई की मद मर्यादा के अनुरूप उनके अंतिम संस्कार की तैयारी में लग गए”
“चंदन पद्यक्ष आदि सुगंधित लड़कियों की चिता बनाई गई और रावण के मृतक शरीर को उसे पर रख वैदिक विधि से उसकी अंत्येष्टि संस्कार किया गया”।
इसके पश्चात विभीषण का राज्यारोहण हुआ।
पृष्ठ संख्या 556 पर पढ़ें।
“श्री राम के आदेश अनुसार धर्मात्मा लक्ष्मण ने लंका में वहां के राक्षसों की उपस्थिति में सुहृदों से घिरे हुए शुद्धात्मा विभीषण का वैदिक मित्रों से राजतिलक किया।”
राम ने हनुमान जी को सीता जी के पास भेजा जिन्होंने रावण के मारे जाने और लंका के विजई होने का तथा विभीषण को राजतिलक करने का समाचार सीता जी को बताया।
इस प्रकार हम देखते हैं कि रावण का वध अमावस्या के दिन चैत्र के माह में हुआ और अगले दिन प्रथमा को रावण का दाह संस्कार हुआ। रावण वध, विभीषण राज्याभिषेक और सीता की अग्नि परीक्षा के पश्चात जब वह रात्रि व्यतीत हुई और प्रातः काल हुआ जब शत्रु नाशक श्री राम सुख पूर्वक उठे उस समय विभीषण हाथ जोड़ तथा आपकी जय हो! ऐसा कहकर बोले। आपके स्नान के लिए उत्तम अंगराग (उबटन) विविध प्रकार के वस्त्र, आभूषण तथा विविध प्रकार के दिव्य चंदन एवं भांति भांति की पुष्प मालाए आई हैं ।आप इन वस्तुओं का ग्रहण कर मेरे ऊपर कृपा करें। परंतु राम ने कहा कि हे मित्र !सुख पाने योग्य धर्मात्मा, सुकुमार, महाबाहु, सत्य वक्ता राजकुमार भरत मेरे कारण अयोध्या में कष्ट पा रहा है। उस धर्मात्मा कैकेईनंदन भरत को देखे बिना स्नान करना, वस्त्र और अलंकार धारण करना मुझे अच्छा नहीं लगता।”ऐसा पृष्ठ संख्या 566 पर लिखा है।
हे विभीषण !अब तो आप सोच विचार कर कोई ऐसा उपाय बताओ जिससे मैं तुरंत अयोध्यापुरी में पहुंच जाऊं। क्योंकि जिस मार्ग से हम लोग अयोध्या से यहां तक आए हैं वह मार्ग तो बड़ा दुर्गम है ।
श्री राम के ऐसा कहने पर विभीषण ने कहा हे राजकुमार! मैं आपको एक ही दिन में अयोध्या पहुंचा दूंगा। आपका कल्याण हो, सूर्य के समान दैदिप्यमान पुष्पक विमान , जिसे मेरा भाई रावण कुबेर को युद्ध में जीत कर बलात छीन लाया था जो यथेष्ट चलने वाला दिव्य और उत्तम है,।
अतुल पराक्रमी वही विमान आपकी सेवा के लिए उपस्थित है। देखिए मेघ के समान आकाश में उड़ने वाला यह विमान यहां उपस्थित है। इस विमान में बैठकर आप बिना किसी कष्ट के अयोध्या पहुंच जाओगे।”
विभीषण ने राम से कुछ समय निवास करने के लिए कहा। परंतु राम ने विनम्रता पूर्वक अस्वीकार करते हुए कहा कि
“हे रक्षासेश्वर अब तुम विमान को शीघ्र यहां मंगवा दो, क्योंकि जब यहां का सारा कार्य पूर्ण हो चुका और मेरे वनवास की अवधि भी समाप्त हो चुकी तब मेरा यहां रहना क्यों कर संभव हो”।
उक्त विवरण पृष्ठ संख्या 567 पर आया है।
“उन सबके सवार हो जाने पर कुबेर का वह उत्तम वाहन श्री राम की आज्ञा पर आकाश में उड़ चला।”
अब पृष्ठ संख्या 573 पर निम्न प्रकार देखें सर्ग 70
“वनवास के 14 वर्ष पूरे हो जाने पर चैत्र शुक्ल पंचमी के दिन श्री राम भरद्वाज (प्रयागराज में गंगा जमुना के संगम तट पर महर्षि भारद्वाज के आश्रम)के आश्रम में पहुंचे और उन्हें यथाविधि प्रणाम किया।”
इससे यह बात स्पष्ट हो गई की चैत्र मास के अमावस्या के 5 दिन बाद पंचमी के दिन भरद्वाज ऋषि के आश्रम में प्रयागराज में रामचंद्र जी पहुंचते हैं। तथा उसी दिन हनुमान को भारत को अपने आने की सूचना देने के लिए अयोध्या भेजा गया। भाई के आने का समाचार जब भरत को हनुमान ने सुनाया तो वह प्रसन्नता पूर्वक परमानंद को प्राप्त हुआ। भरत ने आदेश दिया कि पुरियों में उत्तम अयोध्यापुरी की सब सड़कों पर झंडिया लगा दी जाए और सूर्योदय से पूर्व ही नगरी के समस्त भवनों को समलंकृत कर दिया जाए।
अगला दिन चैत्र अमावस्या की पक्ष की षष्ठी का दिन था। जब राम अयोध्या पहुंचे थे।
“विमान के नीचे उतरने पर श्री राम ने भरत को उस विमान में बैठा लिया। राम को प्राप्त कर भरत जी अत्यंत प्रसन्न हुए, नम्रता पूर्वक उन्होंने श्री राम को प्रणाम किया। चिरकाल के पश्चात भरत को देखकर राम अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने भरत जी को अपनी गोद में बैठा कर उनका आलिंगन किया”
उक्त उल्लेख पृष्ठ संख्या 578 पर आया है।
इस प्रकार श्री राम जी अयोध्या में चैत्र मास की अमावस्या की षष्ठी को पहुंचे थे।
इसलिए दशहरा के दिन रावण का वध और दीपावली के दिन राम का अयोध्या में पहुंचना सर्वथा गलत सिद्ध हो जाता है।






