घर-आँगन की छाँव में, पलते प्रेम-विचार।
लोभ लगा जब मन कहीं, टूटे सब परिवार॥
माटी केवल खेत की, नहीं हृदय का मान।
रिश्तों से बढ़कर नहीं, धन-दौलत की शान॥
लालच की इक आग ने, छीना सबका प्यार—
लोभ लगा जब मन कहीं, टूटे सब परिवार॥
भाई-भाई एक थे, संग जिए हर साँस।
दीवारों ने बाँट दी, जीवन की मिठास॥
आँगन तक सीमित नहीं, बँट गए संस्कार—
लोभ लगा जब मन कहीं, टूटे सब परिवार॥
माँ के आँचल की महक, पिता जुड़ा विश्वास।
हिस्सों में जब बँट गया, बिखर गया उल्लास॥
अपनों से ही हारकर, जीता क्या संसार—
लोभ लगा जब मन कहीं, टूटे सब परिवार॥
बाबुल की हर सीख में, जीवन का विस्तार।
जीते-जी ही न्याय हो, मिट जाए तकरार॥
बेटी-बेटा एक हैं, दोनों घर का प्यार—
लोभ लगा जब मन कहीं, टूटे सब परिवार॥
क्रोध अगर अंगार है, क्षमा शीतल नीर।
प्रेम जहाँ जीवित रहे, मिट जाए हर पीर॥
रिश्तों से बढ़कर नहीं, कोई भी उपहार—
लोभ लगा जब मन कहीं, टूटे सब परिवार॥
धरती ये रह जाएगी, खाली होंगे हाथ।
रिश्ते ही पहचान हैं, रखिए इनके साथ॥
‘सौरभ’ प्रेम बचाइए, यह सच्चा संस्कार—
लोभ लगा जब मन कहीं, टूटे सब परिवार॥
डॉ. सत्यवान सौरभ

