केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने हाल ही में एक बड़े अंतरराष्ट्रीय साइबर धोखाधड़ी नेटवर्क का पर्दाफाश किया है, जिसमें 1,000 करोड़ रुपये से अधिक की ठगी शामिल है। यह घोटाला 2020 में कोविड-19 महामारी के दौरान शुरू हुआ और इसमें फर्जी लोन ऐप्स, नकली निवेश योजनाओं, पोंजी स्कीम, मल्टी-लेवल मार्केटिंग (एमएलएम) मॉडल, धोखाधड़ी वाले पार्ट-टाइम जॉब ऑफर्स और ऑनलाइन गेमिंग घोटालों का इस्तेमाल किया गया। सीबीआई ने इस मामले में 17 लोगों (जिनमें 4 चीनी नागरिक शामिल हैं) और 58 कंपनियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की है। यह नेटवर्क भारत के हजारों नागरिकों को निशाना बनाकर काम करता था, और इसका मुख्य नियंत्रण विदेश से हो रहा था। आइए, इसकी पूरी कहानी समझते हैं।
घोटाले का modus operandi: कैसे ठगते थे लोग?
फर्जी लोन ऐप्स और निवेश योजनाएं: आरोपी गूगल ऐड्स, एसएमएस, सिम-बॉक्स मैसेजिंग और क्लाउड सिस्टम का इस्तेमाल करके लोगों को आकर्षित करते थे। वे फर्जी ऐप्स के जरिए तुरंत लोन का लालच देते, लेकिन ऊंची ब्याज दरों और छिपे शुल्कों से लोगों को फंसाते। इसी तरह, क्रिप्टो या स्टॉक निवेश के नाम पर पोंजी और एमएलएम स्कीम चलाई जातीं, जहां शुरुआती मुनाफा दिखाकर बाद में सब कुछ गायब कर दिया जाता।
फेक जॉब और गेमिंग स्कैम: पार्ट-टाइम जॉब के नाम पर “होम-बेस्ड वर्क” के बहाने पैसे मंगवाए जाते, जैसे “टास्क पूरा करो और कमाओ”। ऑनलाइन गेमिंग ऐप्स में जुआ या रेफरल बोनस के चक्कर में लोग फंसते। एक बार पैसे ट्रांसफर होने पर, आरोपी संपर्क तोड़ देते या और पैसे मांगते।
मनी लॉन्ड्रिंग का जाल: ठगी की रकम को 111 शेल (मुखौटा) कंपनियों के जरिए घुमाया जाता। ये कंपनियां फर्जी निदेशकों, जाली दस्तावेजों, गुमराह करने वाले पतों और झूठे बिजनेस विवरणों से बनाई गईं। इनका इस्तेमाल बैंक खाते, मर्चेंट अकाउंट (UPI, PhonePe आदि) और पेमेंट गेटवे खोलने के लिए होता। “म्यूल” (मध्यस्थ) खातों के जरिए पैसे ट्रांसफर किए जाते, जिससे स्रोत छिप जाता। एक उदाहरण: एक खाते में कुछ ही महीनों में 152 करोड़ रुपये जमा हो गए। कुल ट्रांजेक्शन 1,000 करोड़ से ऊपर पहुंचे।
यह सब एक समन्वित सिंडिकेट का काम था, जहां विदेशी हैंडलर भारतीय सहयोगियों को निर्देश देते। जांच में पता चला कि दो भारतीय आरोपियों की UPI ID अगस्त 2025 तक विदेशी IP से सक्रिय थीं, जो नेटवर्क के निरंतर विदेशी नियंत्रण को साबित करता है।
मुख्य आरोपी: चीनी मास्टरमाइंड और भारतीय सहयोगी
4 चीनी नागरिक: जोउ यी (Zou Yi), हुआन लिउ (Huan Liu), वेइजियान लिउ (Weijian Liu) और गुआनहुआ वांग (Guanhua Wang)। ये मुख्य हैंडलर थे, जो दुबई, म्यांमार और अन्य जगहों से ऑपरेशन चला रहे थे। उन्होंने भारतीयों को दस्तावेज इकट्ठा करने और कंपनियां रजिस्टर करने के लिए हायर किया।
13 अन्य भारतीय: इनमें मनी लॉन्ड्रर, शेल कंपनी ऑपरेटर और फील्ड एजेंट शामिल हैं। नामों में विवरण उपलब्ध नहीं, लेकिन ये दस्तावेज फोर्ज करने और म्यूल खाते चलाने में सक्रिय थे।
58 कंपनियां: ये शेल इकाइयां मुख्य आरोपी थीं, जिनके नाम चार्जशीट में शामिल हैं। कुल 111 शेल कंपनियों में से 58 पर सीधा आरोप।
जांच की प्रक्रिया: कैसे खुला राज?
शुरुआत: 2020 से गृह मंत्रालय के भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) को लोन ऐप, जॉब फ्रॉड और निवेश ठगी की सैकड़ों शिकायतें मिलीं। शुरुआत में ये अलग-अलग मामले लगे, लेकिन फंड फ्लो (पैसे के प्रवाह) और डिजिटल फुटप्रिंट एनालिसिस से एक बड़ा नेटवर्क उजागर हुआ।
कार्रवाई: अक्टूबर 2025 में सीबीआई ने कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, झारखंड और हरियाणा में 27 जगहों पर छापे मारे। 3 लोगों को तुरंत गिरफ्तार किया गया। तलाशी में मोबाइल फोन, बैंक दस्तावेज, KYC फाइल्स, लेन-देन रिकॉर्ड और
डिजिटल डेटा जब्त हुआ।
फोरेंसिक जांच: ऐप्स, पेमेंट गेटवे और IP ट्रैकिंग से चीनी कनेक्शन साबित हुआ। चार्जशीट दिल्ली की विशेष अदालत में दाखिल की गई, जिसमें पीड़ितों की पहचान छिपाने और कानून से बचने की साजिश का जिक्र है।
प्रभाव: यह घोटाला मुख्य रूप से मध्यम वर्ग को निशाना बनाता था, खासकर कोविड के समय आर्थिक तंगी में। सीबीआई का कहना है कि नेटवर्क अभी भी सक्रिय हो सकता है, इसलिए सतर्क रहें।







