सरेआम‌‌ जम्हूरियत का कत्लेआम!

हर रोज खबरें मिल रही है कि ‌ जत्थे के जत्थे विधायक, लोकसभा के सदस्य अपनी पार्टियों जिसके टिकट पर जीत कर आए थे उसको थता बताकर भाजपा में शामिल हो रहे हैं। बात साफ है कि भाजपा से डर और लालच के दबाव में अपने दल और नेता को इसके लिए जिम्मेदार ठहराते हुए दल बदल कर रहे हैं। बंगाल के चुनाव में भाजपा सरकार द्वारा हर हथकंडा अपना कर अपनी सरकार भी कायम कर ली। दो मालदार‌ घरानों,‌ अंबानी, अडानी‌ के हाथों में‌ मुल्क की‌ अब तक की पुरखो द्वारा भी जो कमाई की गई थी,‌ उसको भी उनके हाथों में सौंपा ‌ जा रहा है। अरबो की ‌ दौलत ‌ ‌ को इकट्ठा कर भाजपा के संगठन, ‌ नेताओं की जेबो को भरा जा रहा है। गांव ,कस्बों,‌ शहरों में अपनी जड़ खरीद‌ ‌ इमारतों के भाजपा दफ्तरों ‌ मैं ‌ हिंदू – मुसलमान का‌ राग अलापा जा रहा है।
सवाल है, क्या इसके लिए भाजपा ही कसूरवार है? नहीं, जब बिकाऊ माल बाजार में है तो भाजपा क्यों ना खरीदे। बिना किसी सिद्धांत, नीति, कार्यक्रम, विचार दर्शन के जब जाति, मज़हब, क्षेत्रीयता, मसल और दौलत के बल पर, मुंह पर जय जयकार करने वालों को चुनाव में टिकट देकर जितवाया जाएगा तो वक्त आने पर ऐसा तबका अपने व्यक्तिगत फायदे नुकसान का हिसाब लगाकर निर्णय करें तो आश्चर्य कैसा?
भाजपा दो तिहाई बहुमत किसी भी कीमत पर हासिल करने पर उतारू है, ताकि अपने बाकी बचे मंसूबों को पूरा कर सके। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी‌ प्रचार तंत्र के सारे माध्यमों को ‌ कब्जा कर ‌ मुहिम में लगे हुए हैं, उनकी ‌हरचंद ख्वाहिश है ‌ कि उन्हें जवाहरलाल नेहरू से बड़ा ‌ देशभक्त‌ और क़ाबिल ‌ मान लिया जाए। ऐसे माहौल में क्या मायूस होकर घर बैठ जाए। देश – दुनिया का इतिहास गवाह है कि इससे भी ज्यादा खतरनाक माहौल जिसमें तानाशाहों ने दिखावे की लोकतांत्रिक प्रणाली को नकार, लाखों लोगों का कत्ल कर अपनी बादशाही लागू की परंतु बदलते वक्त में उस ‌ जालिम, ‌ शासन का खात्मा भी हो गया। वैचारिक आस्था में यकीन रखने वाले राजनीतिक कार्यकर्ताओं को अपने-अपने स्थानीय कटघरो, हितों को छोड़कर एकजुट होकर सिविल नाफरमानी, अहिंसक सत्याग्रह ‌ की मार्फत,‌ गैर भाजपा, समयबद्ध,‌ न्यूनतम कार्यक्रम‌ की रणनीति के आधार पर आम लोगों को गोलबंद करना वक्त की पुकार है।

  • राजकुमार जैन ‌
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