पंजाब की राजनीति और सिख पंथ के गलियारों में इन दिनों श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी रोकथाम कानून को लेकर हलचल तेज है। इस संवेदनशील कानून को और सख्त बनाने तथा इसके क्रियान्वयन में आ रही अड़चनों को दूर करने के लिए सिख विधायकों और मंत्रियों की श्री अकाल तख्त साहिब (सिखों की सर्वोच्च धार्मिक और संप्रभु पीठ) के सानमे पेशी की चर्चाएं गर्म हैं। यह वर्तमान घटनाक्रम सिख इतिहास की उस दो सौ साल पुरानी ऐतिहासिक परंपरा को जीवंत करता है, जहां राजसत्ता कभी भी धार्मिक मर्यादा से ऊपर नहीं मानी गई।
प्रख्यात इतिहासकार जे. एस. ग्रेवाल (J.S. Grewal) और खुशवंत सिंह के शोध ग्रंथों सहित विभिन्न ऐतिहासिक विवरणों और प्रचलित सिख परंपराओं में इसका सबसे बड़ा उदाहरण उन्नीसवीं सदी के शुरुआती वर्षों (लगभग 1802-1803 ईस्वी) में मिलता है, जब स्वयं ‘शेर-ए-पंजाब’ महाराजा रणजीत सिंह को एक भूल के कारण अकाल तख्त के सामने आत्मसमर्पण करना पड़ा था।
वो ऐतिहासिक भूल और अकाल तख्त से जारी हुआ समन
महाराजा रणजीत सिंह के दरबारी इतिहासकार सोहन लाल सूरी द्वारा लिखित आधिकारिक समकालीन इतिहास ‘उम्दत-उत-तवारीख’ (Umdat-ut-Tawarikh) और सिख पंथ की मान्यताओं के अनुसार, महाराजा ने अपने शासनकाल के प्रारंभिक वर्षों में तत्कालीन सामाजिक और धार्मिक मर्यादाओं के विपरीत जाकर अमृतसर की एक प्रसिद्ध गैर-सिख नर्तकी ‘मौरान’ से विवाह कर लिया था।
इस फैसले को सिख आचार-संहिता के उल्लंघन के रूप में देखा गया. जब यह मामला सिखों के सर्वोच्च धार्मिक केंद्र श्री अकाल तख्त साहिब तक पहुंचा, तो उस समय के जत्थेदार अकाली बाबा फूला सिंह जी ने इसे बेहद गंभीरता से लिया।
इतिहासकार हरि राम गुप्ता के विवरणों के अनुसार, बाबा फूला सिंह जी उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में सिख सेना ‘निहंग मिसल’ के एक महान योद्धा, निडर सेनापति और अकाल तख्त के मुख्य सेवादार थे, जो अपनी निष्पक्षता के लिए जाने जाते थे. उन्होंने बिना किसी राजनीतिक दबाव के, साम्राज्य के सबसे शक्तिशाली शासक महाराजा रणजीत सिंह को अकाल तख्त पर हाजिर होने का हुक्मनामा जारी कर दिया।
इमली का वो पेड़ और कोड़े मारने का ऐतिहासिक आदेश
जत्थेदार अकाली बाबा फूला सिंह जी और सिंह साहिबान ने मर्यादा के उल्लंघन का दोषी पाते हुए महाराजा को ‘तनखाह’ (तनखैया) लगाने का फैसला सुनाया। सिख शब्दावली में ‘तनखाह’ का अर्थ कोई आर्थिक वेतन नहीं, बल्कि आचार-संहिता तोड़ने पर दिया जाने वाला धार्मिक दंड या पश्चाताप है। ऐतिहासिक मौखिक परंपराओं के अनुसार, तब यह कड़ा फैसला हुआ कि महाराजा रणजीत सिंह को अकाल तख्त परिसर में स्थित इमली के पेड़ से बांधकर कोड़े मारे जाएं।
कोड़े खाने के लिए जब आगे की महाराजा ने अपनी पीठ
महाराजा की इस गहरी ‘निमरता’ (विनम्रता) और अपनी गलती के प्रति सच्चे पश्चाताप को देखते हुए जत्थेदार अकाली बाबा फूला सिंह जी ने कोड़े मारने की शारीरिक सजा को मौके पर ही माफ कर दिया। इसके स्थान पर उन्हें धार्मिक मर्यादा के अनुरूप संगत के जूते (जोड़े) साफ करने और लंगर सेवा जैसी अन्य सेवा रूपी ‘तनखाह’ दी गई, जिसे महाराजा ने श्रद्धापूर्वक पूरा किया।
वर्तमान बेअदबी कानून का विवाद और अकाल तख्त की भूमिका
सिख धर्मशास्त्र में गुरु ग्रंथ साहिब जी को केवल एक पवित्र पुस्तक नहीं, बल्कि ग्यारहवें ‘जीवित गुरु’ का दर्जा प्राप्त है। वर्तमान में कानूनन धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने की सजाओं को अपर्याप्त मानते हुए सिख समाज लंबे समय से उम्रकैद जैसे सख्त कानून की मांग कर रहा है।
इसी पृष्ठभूमि में, बेअदबी रोकथाम कानून को पूर्ण रूप से लागू कराने और राजनीतिक जवाबदेही तय करने के लिए मौजूदा सिख राजनेताओं की अकाल तख्त साहिब के समक्ष पेशी की स्थिति बनी है। यह वर्तमान घटनाक्रम उसी ‘मीरी-पीरी’ के सिद्धांत को दोहराता है, जो यह सिखाता है कि कोई भी जनप्रतिनिधि या शासक गुरु की गरिमा और धार्मिक मर्यादा से बड़ा नहीं हो सकता।
आधुनिक लोकतंत्र और राजनीति के लिए सबसे बड़ा सबक
लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता के वोट से सरकारों को कानून बनाने और शासन करने की शक्ति तो मिल जाती है, लेकिन यह प्रसंग याद दिलाता है कि आत्मिक और धार्मिक मर्यादाओं के सामने हर राजनीतिक रूतबा और वीआईपी कल्चर हमेशा गौण रहता है।
यही वजह है कि आज भी जब कोई राजनीतिक नेता अकाल तख्त साहिब की प्राचीर की ओर बढ़ता है, तो दुनिया भर के लोगों को इतिहास का वो संदेश याद आ जाता है कि न्याय और मर्यादा की कसौटी पर हर कोई समान है।








