अररिया बिहार के जन्मे सुब्रत रॉय उर्फ चंदन ने वर्ष 1978 में 2000 की पूंजी की लागत से चिटफंड के कारोबार को शुरुआत कर देश विदेशों तक अपनी पहुंच और धाक जमाई, शुरुआत से ही बेचने के माहिर सुब्रत रॉय ने अपनी काबिलियत पर नमकीन से शुरुआत कर हसीन सपने तक बेच डाले, सुब्रत रॉय के अथक परिश्रम से सहारा ने चिटफंड के कारोबार के साथ साथ प्रॉपर्टी, हवाई जहाज,मीडिया,होटल,फ़िल्म निर्माण, जूट प्रोजेक्ट, खनन ,शेयर बाजार, घरेलू उत्पाद,गोल्ड,क्रिप्टो,हॉस्पिटल, हॉस्पिटैलिटी से लेकर क्रिकेट टीम तक के क्षेत्रों में मजबूती के साथ प्रवेश किये मगर गलत संगठनात्मक संरचनाओं की वजह से अधिक समय तक किसी भी क्षेत्र में टिक नहीं पाये, ऐसा महसूस हुआ सभी का निर्माण रेत वाली जगह पर हुआ था जो भरभराकर ध्वस्त हो गया। इसका सबसे प्रमुख कारण ये था कि सभी की जमीन तैयार सिर्फ चिटफंड के कारोबार से ही हुआ था और सभी प्रोजेक्ट्स में चिटफंड के कार्य मे शामिल लोगों से ही क्रियान्वयन किया जाता था,अमूनन देखा जाता है कि चिटफंड के कारोबार को संचालित करने वालों में चोरी और बेईमानी की प्रवृत्ति अपने आप विकसित हो जाती है और यही हुआ सुब्रत रॉय की कंपनी सहारा में भी,जो जहाँ जगह देखा और जिसको जहाँ जगह दिखा वहीं से चोरी और बेईमानी करने की योजना बनाने लगा।ऐसा नहीं कि सुब्रत रॉय इन बातों से अनजान थे ,सुब्रत रॉय को बखूबी पता था कि अगर अपने आप को सर्वश्रेष्ठ रखना है तो सबको अपने हिसाब से कार्य करने की छूट देनी ही होगी मगर निगरानी के साथ,चिटफंड और राजनीतिक मामलों में दिखावा ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है तभी कहा जाता है कि जो जितना दिखेगा वो उतना बिकेगा दूसरी भाषा में इसको कहा जाता है कि प्रतिभा को प्रसार की जरूरत है सहारा में संचालित प्रतिभा के प्रसार के चलते सहारा की कार्यप्रणाली अपने हिसाब से लगातार चलती रही और दोनों प्रतिदिन प्रसार की रूपरेखा बदलती रही जिसको सभी ने सहारा ग्रुप में नियमित देखा है,मगर इस बीच उस बात को लोग भूल गए कि चिटफंड में चोरी और बेईमानी की प्रतिभा का भी विकास होता गया और लोग तरह तरह के योजनाओं को क्रियान्वित कर अपने प्रतिभा से घोटाले करने की रूपरेखा तैयार करते रहे।जिसमें विदेशों(लंदन और दुबई) में हवाला के जरिये गरीब निवेशकों के पैसों को हस्तांतरण से लेकर देश के कुछ टॉप कारोबारियों के खातों में हस्तांतरण होने लगा।







