11 फरवरी 1965 को पाकिस्तान के शक्तिशाली गवर्नर और राष्ट्रपति अयूब खान के करीबी सहयोगी अमीर मोहम्मद खान ने ईरान के शाह रेज़ा पहलवी के सम्मान में एक भव्य डिनर पार्टी रखी। उस पार्टी में नीलो को नृत्य प्रदर्शन करने के लिए बुलाया गया।
नीलो ने निमंत्रण पढ़ा और कुछ देर चुप रहीं। उन्हें लगा कि यह किसी कला मंच का कार्यक्रम नहीं, बल्कि शासकों की निजी महफिल है। एक कलाकार होने के नाते वे मनोरंजन कर सकती थीं, लेकिन सत्ता के सामने झुककर नाचना उन्हें अपने स्वाभिमान के खिलाफ लगा।
उन्होंने साफ शब्दों में इंकार कर दिया।
यह इंकार सत्ता को पसंद नहीं आया। गवर्नर आग-बबूला हो गया और पुलिस को आदेश दिया गया कि नीलो को जबरन पार्टी में लाया जाए। पुलिस उन्हें पकड़कर वहाँ ले आई।
इस अपमान और दबाव से टूटकर नीलो ने नींद की गोलियों की बड़ी मात्रा खा ली। जैसे ही उन्हें जबरदस्ती नाचने के लिए कहा गया, वे बेहोश होकर फर्श पर गिर पड़ीं। डॉक्टरों को कई हफ्तों तक उनकी जान बचाने की कोशिश करनी पड़ी।
लेकिन नीलो का साहस बेकार नहीं गया। फिल्म जगत उनके समर्थन में खड़ा हो गया। फिल्म निर्माताओं ने विरोध में एक दिन की हड़ताल की।
प्रसिद्ध शायर हबीब जालिब को जब यह खबर मिली, तो वे तुरंत अस्पताल उनसे मिलने पहुँचे । रास्ते में ही उन्होंने नीलो के साहस को सलाम करते हुए एक तीखी और विद्रोही कविता लिखी —
अहल-ए-सरवत की यह तजवीज़ है, सरकश लड़की,
तुझको दरबार में कोड़ों से नचाया जाए।
नाचते-नाचते हो जाए जो पायल ख़ामोश,
फिर न ताज़ीस्त तुझे होश में लाया जाए।
लोग इस मंज़र-ए-जाँकाह को जब देखेंगे,
और बढ़ जाएगा कुछ सतवत-ए-शाही का जलाल।
तेरे अंजाम से हर शख़्स को इबरत होगी,
सर उठाने का रियाया को न आएगा ख़याल।
तब-ए-शाहाना पे जो लोग गिराँ होते हैं,
हाँ, उन्हें ज़हर भरा जाम दिया जाता है।
तू कि ना-वाक़िफ़-ए-आदाब-ए-शहंशाही थी,
रक़्स ज़ंजीर पहनकर भी किया जाता है।
हिन्दी भावार्थ
(शक्तिशाली लोगों ने इस बाग़ी लड़की को दरबार में कोड़े मार-मार कर नचवाने का इरादा कर लिया है । अगर नाचते-नाचते उसकी पायल भी चुप हो जाए , तो उसे फिर से होश में लाकर नचाया जाए।
जब लोग इस दर्दनाक दृश्य को देखेंगे, तो राजा की शक्ति और भय का प्रभाव और बढ़ जाएगा। उस लड़की के बुरे हाल को देखकर बाकी लोग भी डर जाएंगे और फिर कोई भी सत्ता के सामने सिर उठाने की हिम्मत नहीं करेगा।
जो लोग राजसत्ता के सामने सर उठाते हैं , विरोध करते हैं, उन्हें अक्सर ज़हर का प्याला दे दिया जाता है ( खत्मकर दिया जाता है)।
और अंत में वह व्यंग्य करते हैं कि तुम शायद शाही दरबार के तौर-तरीकों से परिचित नहीं थीं—यहाँ तो ज़ंजीर पहनकर भी नाचना पड़ता है, यानी अत्याचार और बंधनों में भी लोगों को सत्ता के सामने झुकना पड़ता।)
कुछ साल बाद 1969 में फिल्म “ज़र्का ” बनी। इस फिल्म में नीलो ने एक फिलिस्तीनी लड़की की भूमिका निभाई। निर्देशक रियाज़ शाहिद ने हबीब जालिब की वही कविता फिल्म में शामिल की। महान गायक मेहदी हसन की आवाज़ में वह गीत गूंजा और पूरे समाज के लिए प्रतिरोध का प्रतीक बन गया।
फिल्म का एक दृश्य था—एक लड़की को जंजीरों में बाँधकर नाचने के लिए मजबूर किया जाता है। लेकिन उसका दर्द और विरोध ही गीत बन जाता है।
वह दृश्य केवल फिल्म का हिस्सा नहीं था; वह नीलो की अपनी जिंदगी की सच्चाई का प्रतीक था।
नीलो ने उस दिन सत्ता के सामने झुकने से इंकार करके यह दिखा दिया था कि
एक कलाकार का सम्मान किसी भी तानाशाह की ताकत से बड़ा होता है।
और इसी वजह से नीलो सिर्फ एक अभिनेत्री नहीं रहीं—
वे स्वाभिमान और साहस की मिसाल बन गईं।







