वर्तमान में लखनऊ विश्वविद्यालय परिसर में 39-96 प्रतिशत शुल्क वृद्धि एवं तीन छात्रों के अनुचित निष्कासन के विरुद्ध करीब दो माह से चल रहे धरने का सोशलिस्ट स्टूडेंट्स यूनियन समर्थन करती है।
सोशलिस्ट पार्टी के पहले अध्यक्ष लखनऊ वि.वि. के पूर्व कुलपति आचार्य नरेन्द्र देव रह चुके हैं, जिन्होंने अपने कार्यकाल में ऊंचे आदर्श स्थापित किए। जब छात्रों के रहने के लिए छात्रावासों में जगह कम पड़ रही थी तो कुलपति आवास छात्रों के लिए खाली कर न्यू हैदराबाद कालोनी में किराए पर रहने लगे।
काशी विद्यापीठ में पढ़ाते समय अपने पिता की मृत्यु तक कोई तनख्वाह नहीं ली। बाद में अपनी तनख्वाह से तमाम जरूरतमंद छात्रों की मदद किया करते थे। जब काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति बन कर गए तो उनसे पहले कुलपति द्वारा निष्कासित छात्रों का काशी विद्यापीठ के कुलपति को कहकर वहां दाखिला कराया ताकि छात्रों का भविष्य खराब न हो। हम विश्वविद्यालय प्रशासन से अपील करते हैं कि आचार्य नरेन्द्र देव के आदर्शों का पालन करें और सारे निर्णय छात्र हित को ही ध्यान में रख कर लें। छात्रों के बिना क्या आप विश्वविद्यालय की कल्पना कर सकते हैं? शिक्षा के तेजी से बढ़ते निजीकरण की प्रक्रिया पर रोक लगनी चाहिए। देश में प्राथमिक से लेकर स्नातकोत्तर तक शिक्षा मुफ्त होनी चाहिए व एक समान होनी चाहिए। यदि शिक्षा में भ्रष्टाचार को खत्म करना है तो ध्यान पढ़ने-पढ़ाने की प्रकिया पर देना होगा न कि परीक्षा पर। इस समय देश में परीक्ष में पर्चा समय से पूर्व उजागर करने के मामले को लेकर बड़ा आंदोलन चल रहा है। शिक्षा की प्रकिया में शिक्षक का गुणात्मक मूल्यांकन पर्याप्त होना चाहिए। शिक्षा के दो ही परिणाम हो सकते हैं – या तो छात्र ने सीखा अथवा नहीं सीखा। सीख लिया तो प्रक्रिया पूरी होने का एक प्रमाण पत्र शिक्षक से मिल जाना चाहिए। नहीं सीखा तो शिक्षक को छात्र के साथ और मेहनत करनी होगी – जब तक छात्र सीख नहीं जाता। हरेक छात्र के सीखने की गति भी अलग-अलग हो सकती है।
उच्च शिक्षा में प्रवेश के लिए भी प्रतियोगी परीक्षाओं की आवश्यता नहीं है। सरकार की जिम्मेदारी है कि छात्र जो पढ़ना चाह रहा है उसे उसका अवसर उपलब्ध कराया जाए। उदाहरण के लिए यदि अतिरिक्त चिकित्सा वि.वि. खोलने हैं तो सरकार राज्यपाल के निवास को सिविल अस्पताल के साथ जोड़कर एक वि.वि. वहां खोल सकती है। राज्यपाल कहीं दो कमरे के मकान में रह सकती हैं। इसी तरह हाल में दुबग्गा में राष्ट्र प्रेरणा स्थल बनाया गया। वहां इतनी जगह है कि एक चिकित्सा वि.वि. वहां बनाया जा सकता है। इसी तरह रेलवे, सेना के पास अतिरिक्त भूमि को लेकर, नेताओं व अधिकारियों के बड़े-बड़े घरों का अधिग्रहण कर उनमें अतिरिक्त वि.वि. खोले जा सकते हैं ताकि कोई छात्र अपनी इच्छा के अनुसार उच्च शिक्षा प्राप्त कर सके। यह निर्णय कि छात्र क्या पढ़़ेगा उसी का होना चाहिए न कि किसी प्रतियोगी परीक्षा द्वारा तय किया जाए। शिक्षा के किसी भी स्तर पर निजी संस्थानों का राष्ट्रीयकरण कर सरकार द्वारा उन्हें संचालित किया जाना चाहिए और न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल के 2015 के फैसले के मुताबिक सरकारी वेतन पाने वाले सभी के बच्चे सरकारी संस्थानों में ही पढ़ने चाहिए। जब शिक्षक का बच्चा भी उसी संस्थान में पढ़ेगा जहां शिक्षक पढ़ाता है तो शिक्षा का स्तर अपने आप ठीक हो जाएगा।

