Shiv Sena’s Politics Crisis : महाराष्ट्र की राजनीति में त्रिशंकु की तरह लटके उद्धव ठाकरे 

Shiv Sena’s Politics Crisis : राष्ट्रपति चुनाव में द्रौपदी मुर्मू को समर्थन देने के बाद बिगड़े एनसीपी और कांग्रेस

Shiv Sena’s Politics Crisis : राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए की प्रत्याशी द्रौपदी मुर्मू को समर्थन देने के बाद शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे की स्थिति त्रिशंकू जैसी हो गई है। इधर एनसीपी और कांग्रेस फटकार लगा रही है तो उधर भाजपा से गठबंधन के कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं। यह Shiv Sena’s Politics Crisis ही है कि उद्धव ठाकरे की स्थिति यह हो गई है कि उन पर उनके सांसदों का बीजेपी से गठबंधन का दबाव बना रहा है पर बीजेपी मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की पार्टी को बढ़ावा दे रही है। ऐसे में उद्धव ठाकरे करें तो क्या करें। यदि वह एनसीपी और कांग्रेस के साथ गठबंधन बरकरार रखते हैं तो उनके सांसदों के बगावत करने  की आशंका हैं। यदि वह सांसदों की बात मानकर बीजेपी की ओर हाथ बढ़ाते हैं उन्हें अंदेशा है कि एकनाथ शिंदे के सामने अब उनको भाव नहीं मिलेंगे। वैसे भी शिवसेना लगातार टूट रही है।

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दरअसल सांसदों के दबाव में शिवसेना प्रमुख उद्धव  ठाकरे ने Presidential Election में एनडीए की प्रत्याशी द्रौपदी मुर्मू का समर्थन तो कर दिया पर इस पर एनसीपी और कांग्रेस भड़क गये हैं। दोनों ने उद्धव ठाकरे को जमकर लताड़ लगाई है। कांग्रेस नेता बाला साहेब थोराट ने शिवसेना के द्रौपदी मुर्मू को समर्थन देने पर हैरानी जताई है। बाला साहेब थोराट ने ट्वीट कर कहा है कि Presidential Election एक वैचारिक लड़ाइ है। यह लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए चल रहा एक बड़ा संघर्ष है। यह लड़ाई महिलाओं, पुरुषों या आदिवासियों, गैर आदिवासियों के बीच नहीं है। वो सभी जो संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के पक्ष में हैं, यशवंत सिन्हा का समर्थन कर रहे हैं।

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उन्होंने कहा है कि शिवसेना ने Draupadi Murmu support क्यों किया ? उन्होंने इसके कुछ कारण भी बताए। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि शिवसेना नेतृत्व की वास्तविक भूमिका के बारेे में वह क्या कह सकते हैं ? उन्होंने कहा कि शिवसेना एक अलग राजनीतिक दल है। इसलिए वो अपनी भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि इस वैचारिक लड़ाई में शिवसेना द्वरा निभाई गई भूमिका समझ से बाहर है। जब अलोकतांत्रिक रास्ता अपनाकर राज्य सरकार को उखाड़ फेंका गया और शिवसेना के अस्तित्व को चुनौती दी गई।

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उधर एनसीपी नेता जयंत पाटिल ने कहा कि महाविकास अघाड़ी से दूर जाने की कोई बात नहीं दिखती। पहले भी शिवसेना का राष्ट्रपति के चुनाव में उनका अपना निर्णय होता रहा है। ये उनकी पार्टी का निर्णय है। इसमें हमारी कोई भूमिका नहीं। शिवसेना एनडीए के राष्ट्रपति उम्मदवार को समर्थन दे रही  है। इसका मतलब यह नहीं कि वह एनडीए का समर्थन कर रही है। लेकिन उनका यह भी कहना था कि उद्धव ठाकरे ने इस तरह का फैसला लेने से पहले उनसे कोई चर्चा नहीं की थी। हालांकि अंदरखाने पता चला ेहै कि Draupadi Murmu support पर कांग्रेस और एनसीपी दोनों ने ही उद्धव ठाकरे को कड़ी फटकार लगाई है।

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दरअसल महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव का रिजल्ट 24 अक्टूबर 2019 को आया था। इसके बाद हर दिन राज्य में सियासी गणित बदलता रहा। एक साथ चुनाव लड़ने वाली शिवसेना और बीजेपी एक दूसरे से दूर होती चली गई । यह  Maharashtra politics रही है कि विधानसभा चुनाव का रिजल्ट आने के एक दिन बाद शिवसेना ने बीजेपी को ढाई-ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री पद का प्रस्ताव दिया गया था। शिवसेना के इस प्रस्ताव के बाद बीजेपी ने साफ कर दिया कि सीएम पद 5 साल तक उनके पास ही रहेगा। इस पर कोई समझौता नहीं होगा। 28 अक्टूबर को दोनों दल राज्यपाल से अलग-अलग मिले। शिवसेना नेता दिवाकर राउत और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी से अलग-अलग मुलाकात की। 29 अक्टूबर को  शिवसेना को मनाने के लिए बीजेपी ने डिप्टी सीएम यानी उप मुख्मयंत्री पद का आफर दिया गया। हालांकि शिवसेना ने इस ऑपर को मानने से साफ इनकार कर दिया।

2 नवम्बर को भाजपा से  जारी अनबन के बीच शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने एनसीपी प्रमुख शरद पवार से फोन पर बात की। Maharashtra politics के तहत शरद पवार ने कहा कि जिनके पास संख्या बल है वो सरकार बनाएं। हम विपक्ष में बैठेंगे। 9 नवम्बर को महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने महाराष्ट्र में सबसे बड़े दल के रूप में भाजपा को सरकार बनाने का न्यौता दिया। इसके बाद महाराष्ट्र भाजपा अध्यक्ष चंद्रकांत पाटिल ने कहा कि भाजपा सरकार बनाने का दावा पेश नहीं करेगी। 11 नवम्बर को राज्यपाल ने शिवसेना को सरकार बनाने का न्यौता भेजा।

शिवसेना ने भी दावा पेश नहीं किया। इसके बाद राज्यपाल ने एनसीपी को सरकार के गठन का न्योता भेजा। 12 नवंबर को किसी भीी दल द्वारा सरकार बनाने का दावा पेश नहीं किये जाने पर राज्यपाल ने राज्य में President’s Rule लगाने की सिफारिश की। इसे राष्ट्रपति ने मंजूर कर लिया।  14 नवम्बर को शिवसेना ने बीजेपी पर आरोप लगाया कि उसने पहले ही महाराष्ट्र में President’s Rule लगाने की तैयारी कर ली थी। 15 नवम्बर को शिवसेना की एनसीपी-कांग्रेस की बैठक हुई। शिवसेना ने विरोधी दल एनसीपी और कांग्रेस से गठबंधन सरकार बनाने का प्रस्ताव रखा। इसके लिए तय किया गया कि सीएम पद पांच साल तक शिवसेना के पास ही रहेगा। 23 नवम्बर को फडणवीस ने सीएम और एनसीपी विधायक दल के नेता अजित पवार ने उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। यह पता चलते ही शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस में हड़कंप मच गया।

23 नवम्बर को एनसीपी प्रमुख शरद पवार Maharashtra politics में एक्टिव हुए और कहा कि यह फैसला अजित पवार ने निजी तौर पर लिया है। शाम को जब शरद पवार के नेतृत्व में एनसीपी की  बैठक हुई तो उसमें 50 विधायक मौजूद रहे सिर्फ अजित पवार और 4 दूसरे विधायक गैर हाजिर थे। इससे साफ हो गया कि  पार्टी के विधायक अजित पवार के साथ नहीं थे। इसके बाद एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने अजित पवार को मनाने के लिए कई दांव-पेंच लगाए।

उन्होंने अजित पवार पर दबाव बनाते हुए कहा कि वह महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम पद से इस्तीफा देकर पार्टी में लौटे। 25 नवम्बर को शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले ने भी अजित पवार के भाई श्रीनिवास पवार से बात की और इस तरह से अजित पवार को वापस एनसीपी में लाया गया। 28 नवम्बर को उद्धव ठाकरे ने आखिरकार मुंबई के शिवाजी पार्क में राज्य के 19वें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली। उनके साथ एनसीपी के जयंत पाटिल और झगन भुजबल ने भी शपथ ली। Shiv Sena’s Politics Crisis की कहानी निर्णायक मोड़ पर है। 

 चरण सिंह राजपूत   

 

 

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