नीरज कुमार
भारतीय राजनीति के वर्तमान दौर में एक महत्वपूर्ण बदलाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है—सवालों का केंद्र सरकार से हटकर विपक्ष की ओर खिसकता जा रहा है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सामान्यतः सत्ता पक्ष से जवाबदेही की अपेक्षा की जाती है, क्योंकि नीतियाँ बनाने, संसाधनों का उपयोग करने और प्रशासनिक निर्णय लेने की वास्तविक शक्ति उसी के पास होती है। किंतु हाल के वर्षों में यह प्रवृत्ति उभरी है कि सरकार से कठिन प्रश्न पूछने के बजाय विपक्ष से ही यह पूछा जा रहा है कि वह क्या कर रहा है, उसकी भूमिका क्या है, और वह सरकार का विकल्प क्यों नहीं बन पा रहा है।
यह बदलाव आकस्मिक नहीं है, बल्कि सत्ता पक्ष की एक सुविचारित राजनीतिक रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है। नैरेटिव (वृत्तांत) को नियंत्रित करना आज की राजनीति का सबसे बड़ा औज़ार बन चुका है। जिस पक्ष के पास संवाद के माध्यम—मीडिया, सोशल मीडिया, प्रचार तंत्र—अधिक प्रभावी रूप से उपलब्ध हैं, वह विमर्श की दिशा तय करने में सक्षम होता है। ऐसे में यदि जनता का ध्यान सरकार की नीतिगत कमियों, बेरोज़गारी, महँगाई, कृषि संकट या संस्थागत स्वायत्तता जैसे मुद्दों से हटाकर विपक्ष की कथित विफलताओं पर केंद्रित कर दिया जाए, तो स्वाभाविक रूप से सत्ता पक्ष पर पड़ने वाला दबाव कम हो जाता है।
इस रणनीति का दूसरा आयाम मनोवैज्ञानिक है। जब विपक्ष को लगातार रक्षात्मक मुद्रा में रखा जाता है—उसकी एकजुटता, नेतृत्व, विचारधारा या कार्यक्रम पर प्रश्न उठाए जाते हैं—तो वह अपनी ऊर्जा का बड़ा हिस्सा स्पष्टीकरण देने में खर्च करता है। परिणामस्वरूप वह आक्रामक राजनीतिक एजेंडा स्थापित करने की स्थिति में नहीं रह पाता। लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका केवल आलोचना तक सीमित नहीं होती; वह वैकल्पिक नीतियाँ प्रस्तुत करने और जनता की असंतुष्टि को संगठित रूप देने का माध्यम भी होता है। किंतु यदि सार्वजनिक विमर्श ही इस प्रकार गढ़ा जाए कि विपक्ष लगातार ‘क्यों नहीं कर पा रहा’ के प्रश्नों में उलझा रहे, तो उसकी प्रभावशीलता स्वतः सीमित हो जाती है।
यह प्रवृत्ति लोकतांत्रिक विमर्श के लिए एक चुनौती भी है। लोकतंत्र का मूल तत्व जवाबदेही है—और जवाबदेही का पहला दायित्व सत्ताधारी दल पर होता है। यदि सवाल पूछने की संस्कृति कमजोर होती है, या सवालों का फोकस बदल दिया जाता है, तो शासन की पारदर्शिता प्रभावित हो सकती है। एक स्वस्थ लोकतंत्र में सरकार से कठोर प्रश्न पूछना और विपक्ष से रचनात्मक विकल्प प्रस्तुत करने की अपेक्षा रखना—दोनों साथ-साथ चलते हैं। परंतु यदि संतुलन बिगड़ जाए और समूचा विमर्श विपक्ष की कथित अक्षमताओं तक सिमट जाए, तो लोकतांत्रिक संतुलन डगमगाने लगता है।
इसके साथ ही यह भी समझना आवश्यक है कि जनता का एक वर्ग इस बदलाव को इसलिए स्वीकार करता है क्योंकि उसे मजबूत नेतृत्व और निर्णायक शासन की छवि आकर्षित करती है। सत्ता पक्ष इस भावनात्मक आग्रह को समझते हुए अपने पक्ष में वातावरण तैयार करता है—जहाँ आलोचना को नकारात्मकता और प्रश्नों को विकास विरोधी बताया जाता है। इससे राजनीतिक संवाद का स्तर बदल जाता है और विमर्श नीतियों से अधिक छवियों के इर्द-गिर्द घूमने लगता है।
अंततः प्रश्न यह नहीं है कि विपक्ष से सवाल क्यों पूछे जा रहे हैं; प्रश्न यह है कि क्या सरकार से सवाल पूछने की परंपरा समान रूप से जीवित है। लोकतंत्र की सेहत इसी संतुलन पर निर्भर करती है। यदि जनता, मीडिया और नागरिक समाज सत्ता और विपक्ष—दोनों से उनकी-उनकी भूमिका के अनुरूप जवाबदेही सुनिश्चित करें, तभी लोकतांत्रिक व्यवस्था मजबूत रह सकती है। अन्यथा राजनीतिक नैरेटिव का यह एकतरफा मोड़ भविष्य में संस्थागत और वैचारिक संतुलन के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।








