शब्द-संधान— भाषा की शुद्धता की साधना

किसी राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान और राष्ट्रीय अस्मिता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए उसकी भाषिक संस्कृति का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। यदि भाषा टूटती है, तो अस्मिता भी दरकती है। दुर्भाग्यवश, स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भी हमने भाषिक परतंत्रता की मानसिकता को पूरी तरह नहीं त्यागा। आज हम जिस प्रकार हिंदी को अशुद्ध रूप में लिखते-बोलते हैं — चाहे सोशल मीडिया हो, समाचार-पत्र, लेख या भाषण — वह चिंताजनक है।

ऐसे समय में कमलेश कमल द्वारा रचित ‘शब्द-संधान’ एक दीप-शिखा की तरह है, जो न केवल हिंदी भाषा की शुद्धता की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करती है, बल्कि उसे आत्मसात करने का मार्ग भी प्रशस्त करती है। यह पुस्तक भाषा-प्रेम की एक प्रामाणिक अभिव्यक्ति है, जिसमें लेखक ने न केवल व्याकरणिक शुद्धता को महत्त्व दिया है, बल्कि शब्दों की व्युत्पत्ति, प्रयोग और अर्थ के सूक्ष्म भेदों को भी सरल व ग्राह्य भाषा में प्रस्तुत किया है।

मनुष्य मूलतः एक भाषिक प्राणी है। उसकी चेतना और भावनाएं भाषा के माध्यम से ही व्यक्त होती हैं। जब शब्दों का सही चयन और उनका उचित प्रयोग होता है, तब भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि सौंदर्य और संस्कृति की संवाहिका बन जाती है। यही साधना ‘शब्द-संधान’ में दिखाई देती है।

यह पुस्तक न केवल हिंदी प्रेमियों के लिए, बल्कि विद्यार्थियों, शोधार्थियों, शिक्षकों और भाषा के गंभीर साधकों के लिए भी एक अनमोल ग्रंथ है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि अत्यंत गूढ़ भाषाई विषयों को भी लेखक ने इतनी सरलता और सहजता से प्रस्तुत किया है कि पाठक का अध्ययन-रुचि स्वतः जाग्रत हो उठता है।

‘शब्द-संधान’ को पढ़ना भाषा को साधने की एक यात्रा है — और यह यात्रा प्रत्येक उस व्यक्ति को करनी चाहिए जो भाषा को केवल माध्यम नहीं, आत्मा मानता है।

 अभिलाषा झा

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