एक सहारा सबका सहारा सामूहिक उन्नति का नारा। निष्ठा और लगन की एक पहचान बनकर आए हैं…”। ये सहारा गान कभी न कभी सहारा के कर्तव्ययोगी गाएं होंगे और कुछ को कंठस्थ भी होगा। ये गाना नौकरी के दौरान लिखने वाले इस नाचीज़ ने भी लखनऊ और नोएडा में गाए थे। पर क्या मालूम कि,कभी जिस स्थान पर “फैले सागर ऊंचे पर्वत अपने देश की धरती जन्नत गाना गाने वाले उस स्थान की इस कदर नीलामी होने की सरकारी सूचना पढ़ने को मिलेगी।
बताते चलें कि जब इन पंक्तियों को लिखने वाले ने राष्ट्रीय सहारा में नौकरी शुरू की थी तो इस कंपनी की सालाना ‘टर्नओवर दो हज़ार करोड़ सुनने को मिली थी,जो बढ़ते-बढ़ते एक लाख 77 हजार 993 करोड़ (सुप्रीम कोर्ट में दिए गए पुराने गांव के अनुसार) हो गई थी। अब सोचिए जिस कंपनी की घोषित पूंजी दो हजार करोड़ से 78 हजार करोड़ हो गई हो वो वह रातों-रात भरभरा कर ढह जाएगी। वो भी एक पीढ़ी में। कंपनी को इसके मुखिया सुब्रत राय ने 1978 में शुरू किया वो भी दो हजार रुपए से शुरू कर 78 हजार करोड़ तक पहुंचाया हो वो उनकी गिरफ्तारी के बाद नीलाम हो जाएगी।
कम से कम संलग्न सरकारी नोटिस को पढ़कर तो ऐसा ही लगता है।
और अंत में, घमंड तो सोने की लंका के स्वामी, प्रकांड पंडित व शिव के अनन्य भक्त रावण का चकनाचूर हो गया तो सुब्रत राय क्या हैं?

अरुण श्रीवास्तव








