‘ पश्चाताप’ जो पीछा नहीं छोड़ रहा!

प्रोफेसर राजकुमार जैन

1968 मे इंदौर में ‘समाजवादी युवजन सभा’ (सोशलिस्ट नौजवानों का संगठन) का राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित था, जिसमें समाजवादी चिंतक, नेता किशन पटनायक अध्यक्ष तथा भूतपूर्व केंद्रीय मंत्री श्री जनेश्वर मिश्रा महामंत्री चुने गए थे। राष्ट्रीय समिति का सदस्य बनने का गौरव मुझे भी हासिल हुआ था। उस अधिवेशन की कई बातें इतने बरस बीत जाने के बावजूद मेरे दिमाग में मौजूद है। मरहूम भूतपूर्व केंद्रीय मंत्री कल्पनाथ राय जो उस समय सोशलिस्ट पार्टी में थे, संगठन में उनको पहले संयुक्त मंत्री बनाने की सूचना दी गई परंतु न जाने क्या हुआ उनकी जगह बनारस के साथी शिवदेव नारायण को संयुक्त सचिव घोषित कर दिया गया। साथी कल्पनाथ राय बड़े कुपित हुंए। सम्मेलन खत्म होने के बाद दिल्ली आने का किराया नहीं था मैं और साथी सत्यपाल मलिक (भूतपूर्व गवर्नर) दोनों उस समय मध्य प्रदेश सरकार की संविद सरकार में मंत्री, आरिफ बेग जो की सोशलिस्ट कोटे से बने थे, इंदौर के रहने वाले थे, उनके घर गए कि उनसे किराया लिया जाए। परंतु जाने पर पता लगा कि वे तो भोपाल गए हुए हैं। सोशलिस्ट पार्टी और समाजवादी युवजन सभा के सम्मेलनों, सभाओं, शिवरो में शिरकत करते वक्त साथी लोग एक तरफ का किराया जुटा कर वहां पहुंच जाते थे। वापसी की चिंता नहीं होती थी। जुगाड़ बन ही जाता था।
1970 में पुणे में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का राष्ट्रीय अधिवेशन था। वापस लौटते समय मुंबई के रेलवे स्टेशन पर दिल्ली आने वाली ट्रेन में अलग डिब्बो में मैं और किशन जी आ रहे थे। रेलवे स्टेशन पर किशन जी ने मुझसे पूछा कि राजकुमार,क्या कुछ पैसे तुम्हारे पास हैं, मैंने मना कर दिया हालांकि मेरी मेरे पास 20 रुपए थे। दिल्ली आने पर मुझे महसूस हुआ की रेलवे स्टेशन पर किशन जी ने मुझसै पैसे क्यों मांगे? मुझे एहसास हुआ कि शायद रास्ते में खाने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे, भूखे ही उनको दिल्ली आना पड़ा, ज्योंही यह बात मेरे जहन में आई, मैं पश्चाताप से भर गया, और आज तक भी वह मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा। हालांकि मैंने उससे पीछा छुड़ाने के लिए 1974 में ज्योहि मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षक नियुक्त हुआ, उसके बाद शायद ही ऐसा कोई मौका होगा जब किशन जी दिल्ली में आए हो तो मैंने चंद पानफुल लिफाफे में रखकर अर्पित न किए हो। दिल्ली आने से पहले किशन जी एक पोस्टकार्ड लिखकर आने की सूचना दे देते थे। किशन जी जैसा खुद्दार, उसूलों पर चट्टान की तरह अडिग, किसी भी कीमत पर किसी प्रकार का समझौता न करने के जिद्दी इंसान की कई बातें मेरे मानस पर आज भी अंकित है। 1977 के लोकसभा चुनाव में किशन जी उड़ीसा के अपने पुराने निर्वाचन क्षेत्र जहां से वह संसद सदस्य रह चुके थे, संबलपुर से चुनाव लड़ना चाहते थे, परंतु वे जनता पार्टी के सदस्य के रूप में नहीं जनता पार्टी का समर्थन चाहते थे। हालांकि यह मसला कुछ अटपटा था। मैं उड़ीसा के सबसे बड़े नेता बीजू पटनायक जी से इस सिलसिले में मिला और कहा की किशन जी जैसा सोशलिस्ट कभी जनता पार्टी के खिलाफ किसी दूसरे खेमे की तरफदारी नही करेगा। बीजू पटनायक आदत के मुताबिक भड़क गए, कहा सिंबल क्यों नहीं लेंगे, यह नहीं हो सकता। किशन जी ने जनता पार्टी का सिंबल लेने से मना कर दिया। उस वक्त जनता पार्टी के टिकट पर लड़ने का मतलब था, सीधे लोकसभा का सदस्य बनना। यह केवल किशन जी ही कर सकते थे। तमाम उम्र लोहिया की डुगडुगी बजाने, सोशलिस्ट विचारों के प्रचार प्रसार नई पीढ़ी को सोशलिस्ट विचारधारा में रंगने में हर प्रकार की परेशानियां कठिनाईयो को सहकर अपनी जिंदगी गुजार दी।
परंतु मेरी आफत आज भी है, जब कभी मुंबई के रेलवे स्टेशन का ध्यान आ जाता है तो पश्चाताप मेरा पीछा करने लग जाता है।

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