माता-पिता, गांव, आम के पेड़ और खेतों से रिश्ता

दीपक कुमार तिवारी

वक्त बदलता गया, रास्ते बदलते गए, लेकिन दिल के किसी कोने में आज भी वो गांव वैसा ही बसा है—जहां बचपन ने पहली बार खुलकर सांस ली थी। जहां मिट्टी की खुशबू, खेतों की हरियाली और आम के पेड़ों की ठंडी छांव ने जीवन को जड़ से सींचा था। और सबसे ऊपर, जहां माता-पिता की ममता ने जीवन को दिशा दी थी।

 

गांव और बचपन—एक अनकहा रिश्ता:

 

आज जब शहर की ऊंची इमारतों के बीच से देखता हूं, तो वो कच्ची पगडंडियां, वो पोखर के किनारे खेलना, वो बैलगाड़ी की सवारी, और वो बिना किसी चिंता के बीते पल—कितने मासूम और सच्चे थे। गांव की वो गलियां, जहां हर मोड़ पर कोई अपना मिल जाता था; वो बगीचा, जहां दादा जी के साथ आम तोड़ने की होड़ लगी रहती थी—सबकुछ अब स्मृति बन चुका है, लेकिन दिल के बहुत करीब।

 

माता-पिता—छांव देते आम के पेड़ की तरह:

 

माता-पिता भी तो ऐसे ही होते हैं। जैसे वो पुराना आम का पेड़—जो हर साल चुपचाप फल देता है, हर बार छांव देता है, हर बार अपनेपन से भर देता है। वो डांट, वो ममता, वो इंतजार—सब उसी पेड़ की तरह है, जिसकी जड़ें भले जमीन में हों, लेकिन जीवन भर हमारी परछाईं बनी रहती हैं।

 

खेतों की हरियाली और जीवन की ठंडक:

 

खेतों में हरी-हरी फसल लहराना सिर्फ अन्न उपजाने का काम नहीं था, वो आत्मा की ठंडक थी। वहां की मिट्टी में पैर डुबोकर चलना, जैसे जीवन से जुड़ जाना। शहर की भागदौड़ में जहां हम सांस लेना तक भूल जाते हैं, वहां खेत की एक सांस ताजगी भर देती है।

 

क्या हम सचमुच बदल गए हैं?

 

शायद हां। वक्त ने हमें तेज बना दिया, लेकिन संवेदनाएं कहीं पीछे छूट गईं। मां-बाबा अब भी उसी चौखट पर आंखें लगाए बैठते होंगे, जहां से कभी हम नंगे पांव भागते हुए निकलते थे। वो पेड़ अब भी छांव दे रहा होगा, लेकिन हम लौटने की फुर्सत कहां रखते हैं?

 

एक बार लौटिए…

 

कभी यूं ही बिना किसी बहाने, बिना किसी योजना के लौट आइए… गांव की उस मिट्टी में, मां की गोद में, खेत की महक में और आम के पेड़ की ठंडी छांव में। क्योंकि वहां समय नहीं रुका है—वो अब भी हमारे इंतज़ार में है।
माता-पिता, गांव, आम के पेड़ और खेत—ये सिर्फ रिश्ते नहीं, ये हमारी जड़ें हैं। और जब भी जीवन थकने लगे, इन्हीं जड़ों से फिर जीवन मिलता है।

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