हिन्दी की आत्महीनता के लिए राजनीति जिम्मेदार

समता ट्रस्ट ने हिन्दी दिवस पर आयोजित की परिचर्चा

विद्वान वक्ताओं ने कहा – मिलकर तलाशना होगा संकट का समाधान

भोपाल । हिन्दी – दिवस के अवसर पर समता ट्रस्ट भोपाल द्वारा ‘ हिन्दी का भविष्य ‘ विषय पर केन्द्रित आभासीय परिचर्चा में विद्वान वक्ताओं में इस बात पर सहमति रही कि हिन्दी की आत्महीनता के लिए राजनीति जिम्मेदार है।
अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए प्रसिद्ध समाजवादी चिंतक  रघु ठाकुर ने कहा कि महात्मा गांधी ने तो देश के आजाद होते ही एक पत्रकार को साक्षात्कार देते हुए कह दिया था कि दुनिया से कह दो गांधी को अंग्रेजी नहीं आती। डॉ राम मनोहर लोहिया ने भी हिन्दी सहित भारतीय भाषाओं के पक्ष में आंदोलन चलाते हुए सरकारी और समान शिक्षा लागू करने की जरूरत बताई थी। लेकिन पिछले कुछ दशकों में देश में ऐसे स्कूल विकसित हुए हैं जिनमें हिन्दी बोलना अपराध हो गया है।
श्री रघु ठाकुर ने बोलिओं के प्रति बढ़ते आग्रह को हिन्दी के मार्ग में बाधा बताते हुए कहा कि बोलियों को संरक्षण जरूर मिलना चाहिए लेकिन वे हिन्दी के क्षेत्र में अतिक्रमण करेंगी तो देश को जोड़ने वाली भाषा कैसे मजबूत होगी। जिन प्रांतों में हिन्दी बोली जाती है उसे ‘ काऊ – बेल्ट ‘ या गोबर पट्टी कह कर भी अंग्रेजी अखबारों ने हिन्दी के सम्मान को क्षति पहुंचाई है।
रघु जी ने कहा कि हर भारतवासी यदि अपनी मातृभाषा के साथ कोई न कोई दो भारतीय भाषा  सीखे तो हिंदी व क्षेत्रीय भाषाओं में परस्पर प्रेम बढ़ेगा, उपनिवेशवादी मानसिकता से मुक्ति मिलेगी और देश की एकता मजबूत होगी। इसी भावना के तहत गांधीजी ने राष्ट्रभाषा प्रचार समिति का पहला केन्द्र तमिलनाडु में स्थापित किया था और डॉ लोहिया ने रामास्वामी नायकर ‘ पेरियार ‘ की इस धारणा को बदलने का प्रयास किया था कि हिन्दी साम्राज्यवाद और हिन्दुओं की भाषा है।
हिन्दी को अपनी नमनीयता और पाचन शक्ति बढ़ाने पर जोर देते हुए रघु जी ने कहा कि देश के हर प्रशासक जब संबंधित प्रांत की भाषा सीखेंगे तो हिन्दी व प्रांतीय भाषाओं का द्वंद्व कम होगा।
सुप्रसिद्ध पत्रकार श्री राहुल देव ने हिन्दी भाषा के निरंतर सिमटते जाने पर चिंता जताते हुए कहा कि देश के एकीकरण की अपनी ही भाषा का इस तरह सिमटना समूची भारतीय सभ्यता का संकट सिद्ध होगा। ज्ञान – निर्माण की भाषा के रूप में हिन्दी का विकास बाधित हुआ है। भाषाओं की जीवंतता व संकटग्रस्तता के संबंध में जो वैश्विक रपट आई है उसका अध्ययन किसी को भी चिंता में डाल सकती है। हिन्दी व भारतीय भाषाओं के प्रति जो आग्रह व जुड़ाव उस पीढ़ी में बहुत कम हो रहा है जो अगले कुछ दशक में देश का भविष्य बनने जा रहे हैं। आज अधिकांश संभ्रांत परिवारों के बच्चे अंग्रेजी माध्यम शिक्षा केन्द्रों में पढ़ रहे हैं। नीपा के अध्ययन बताते हैं कि देश के पचास प्रतिशत बच्चे अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों में पढ़ रहे हैं। हिन्दी साहित्यकारों के बच्चे तक उनके पाठक नहीं बन पा रहे इससे हिन्दी की ग़रीबी का पता चलता है।इस संकट के लिए सरकारी व सांस्थानिक नीति जिम्मेदार है।इस समस्या के समाधान सबको मिलकर खोजने होंगे। द्रविड़ प्रदेशों के शेष भारत से अनबन की शुरुआत सन् १८८० से बताते हुए कहा कि सुमति रामास्वामी की पुस्तक ‘ पैशन आफ़ टंग्स ‘ में आर्य- द्रविड़ व ब्राह्मण- श्रमण संघर्ष की सूक्ष्म पड़ताल की गई है। इसी भावना का परिणाम था कि अन्नादुरई ने
‘ द्रविड़नाडु ‘ की मांग उठाई थी। तमिल भाषा को तो दक्षिण में देवी की तरह पूजा जाता है।
जाने- माने साहित्यकार व ‘ वनमाली कथा ‘ पत्रिका के प्रधान सम्पादक श्री मुकेश वर्मा ने कहा कि हर साल १४ सितम्बर को हिन्दी का मर्सिया या शोकगीत पढ़ा जाता है । हिंदी बाजार की भाषा बनेगी तो अपने आप बढ़ेगी। तकनीक ने इस दिशा में हिन्दी की मदद ही की है। यह बात सही है कि हिन्दी भावों की भाषा है, गरीबों की भाषा है और अंग्रेजी अभिजात वर्ग की भाषा है, परंतु शुद्धता का आग्रह त्याग कर यदि अन्य भाषाओं के शब्दों को भी आत्मसात करेंगे तो इससे हिन्दी मजबूत ही होगी। भाषा वही चलती है जिसमें शासक वर्ग संवाद करता है। भारत का प्रभुवर्ग हिन्दी व भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देगा तो उप- राष्ट्रीयताओं पर भी विराम लगेगा।
इस आभासीय परिचर्चा में अतिथियों व सुधी श्रोताओं का धन्यवाद ज्ञापन समता ट्रस्ट की ओर से श्री मदन जैन ने किया।
समन्वय व प्रस्तावना का दायित्व जयंत सिंह तोमर ने निभाया। श्री जयंत तोमर ने अपनी प्रस्तावना में कहा कि खड़ी बोली या हिन्दी का प्रस्थान बिन्दु भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने यह कहकर तय किया था कि – हिन्दी नई चाल में ढली। बीते लगभग डेढ़ सौ वर्ष में जो भाषा तेजी से विकसित हुई, जिसे बालकृष्ण भट्ट, प्रताप नारायण मिश्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी से लेकर राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन सहित अनगिनत लोगों ने परिश्रम से संवारा उसके प्रति जो उदासीनता अब दिखाई देती है वह आश्चर्यजनक भी है और चिंताजनक भी। लम्बे समय तक यह माना ही नहीं गया कि हिन्दी में ब्रजभाषा की तरह कविता की रचना सम्भव है, परंतु मैथिलीशरण गुप्त से लेकर जयशंकर प्रसाद, निराला, पंत महादेवी वर्मा सहित अनेक कवियों ने सिद्ध किया कि हिन्दी में कविता रचने की सामर्थ्य है।  परिचर्चा में तकनीकी सहयोग पर्यावरण विशेषज्ञ हरे कृष्ण ने किया।

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