सियासत: दलित वोट बैंक को लेकर महाभारत

 चिराग पासवान ने मंत्री पद छोड़ने तक की दी चेतावनी

दीपक कुमार तिवारी

पटना। बिहार में दलित मतों के हिस्सेदारी का खेल चल रहा है। दावे के तेवर भी गरम है। दलित आधार मतों के साथ कुछ राजनीतिक दलों ने तो 243 सीटों पर खम ठोकने की बात कर हलचल मचा दी। लोजपा (आर) के अध्यक्ष चिराग पासवान ने तो एक कदम आगे बढ़ कर यहां तक कह दिया कि अगर उचित हिस्सेदारी नहीं मिली तो वो मंत्री पद को छोड़ देंगे। बिहार की इस राजनीति में यह महज गीदड़ भभकी नहीं बल्कि यह कहीं न कहीं दलित राजनीति में वर्चस्व की भी लड़ाई का आगाज है। आगामी विधान सभा चुनाव इस खेल का सबसे बड़ा मैदान बन जाए तो कोई अतिश्योक्ति भी नहीं।
लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान ने गत सोमवार को पार्टी के अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति प्रकोष्ठ के एक समारोह में यह साफ कहा कि दलितों का अधिकार छीना गया तो वे उनके हक की खातिर मंत्री पद को ठुकराने में जरा भी देर नहीं करेंगे। साथ ही यह भी कहा कि जब तक नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं, तब तक वो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में बने रहेंगे। इसके बाद उन्होंने मंत्री पद छोड़े जाने की व्याख्या भी कर गए। चिराग पासवान ने कहा कि एक बार जब दलितों के अधिकार के साथ छेड़छाड़ हो रहा था तो उनके पिता और राजनीतिक गुरु रामविलास पासवान ने भी मंत्री पद छोड़ने में संकोच नहीं किया था। मेरे पिता तब यू पी ए सरकार में मंत्री थे। तब कुछ ऐसा हुआ जो दलितों के हितों में नहीं थे बाबा साहब आंबेडकर की तस्वीरें भी सार्वजनिक कार्यक्रमों में नहीं लगाई जाती थीं। इसलिए उनके पिता ने मंत्री पद से इस्तीफा दिया था।
हक की लड़ाई तो राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष पशुपति पारस ने भी छोड़ दी। इशारों इशारों में पशुपति पारस ने यह साफ कर दी लोकसभा वाली स्थिति नहीं है। अगर विधानसभा चुनाव में पार्टी को उचित सम्मान नहीं मिला तो राज्य की सभी 243 सीटों पर हमारी पार्टी चुनाव लड़ेगी। लोकसभा चुनाव के समय भी उचित सम्मान नहीं मिला था, धोखा हुआ था। लेकिन पार्टी सबसे पहले झारखंड में अपनी हिस्सेदारी की लड़ाई लड़ेगी। अपनी हिस्सेदारी को ले कर वे कोई कन्फ्यूजन नहीं रखना चाहते। पिछले दिनों पशुपति पारस ने प्रदेश नेतृत्व के कई शीर्ष नेतृत्व से बात की। दिल्ली जा कर भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा से भी मिले थे।
लोक जनशक्ति पार्टी (आर) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान इस बात को ले कर सचेत हैं कि आगामी विधानसभा चुनाव में दलित राजनीति के अगलधर कौन हैं, इसकी पहचान होनी है। इस कारण से चिराग पासवान बिहार विधान सभा ही नहीं झारखंड विधानसभा में हिस्सेदारी को ले कर कडा रुख अपनाया है। चिराग पासवान बिहार में ज्यादा से ज्यादा हिस्सेदारी का दबाव बनाना शुरू भी कर दिया है। उनके आधार इस बात को ले कर मजबूत है कि लोकसभा चुनाव, में 100 फीसदी स्ट्राइक रेट के साथ उनके पांच सांसद हैं। और चिराग पासवान अपने पांच सांसदों की ताकत जानते हैं। यही वजह है कि प्रारंभ से ही बिहार में 50 सीटों का डिमांड चिराग पासवान ने कर रखा है। साथ इसके झारखंड में भी पांच विधान सभा सीट पर दवा ठोक डाला है। हालांकि यह चिराग भी जानते हैं कि सीट एडजेस्टमेंट में उतनी सीट नहीं मिलेगी। लेकिन सम्मानजनक सीटों किए थोड़ा दवाब की राजनीति भी जरूरी है।
लोक सभा चुनाव में राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी का पांच से शून्य पर आना एक बड़ा सेटबैक रहा। अब पशुपति पारस के लिए करो या मरो की स्थिति है। बिहार विधान सभा में भी अगर शून्य पर आ जायेंगे तो तब पार्टी का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा। इसलिए पशुपति पारस ने 243 सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कह कर चिराग वाली चाल चल दी है। पारस इस समझ के साथ ये बाते सार्वजनिक मंच से इसलिए कह दी कि एनडीए फिर दलित मत में विभाजन के लिए तैयार रहे। जिस तरह से चिराग पासवान ने वर्ष 2020 विधान सभा चुनाव में उम्मीदवार खड़ा कर नीतीश कुमार को एक नंबर पार्टी से तीन नंबर की पार्टी पर ला खड़ा किया। वैसे विधान सभा चुनाव में मत विभाजन का जीत हार पर प्रभाव पड़ता है।
दलित मतों की आपाधापी के बीच अपने कार्यकर्ताओं को सचेत करते हुए कहते हैं कि राज्य में दलित मतों के बांटने का खेल शुरू हो गया है। अगर सतर्क नहीं रहे दलित मतों में विभाजन लोकप्रिय एनडीए सरकार के विरुद्ध भी जा सकते हैं। ऐसा कहने के पीछे चिराग पासवान को आर एलजेपी का डर सता रहा है। अगर कही आरएलजेपी 243 सीटों पर उम्मीदवार खड़ा कर देती है तो लोक जनशक्ति पार्टी (आर) को तो नुकसान पहुंचाएगा ही साथ ही एनडीए के अन्य दलों के उम्मीदवारों को भी मुश्किल में डाल देगा।

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