नेहरू का बोस को पत्र: मुस्लिमों को ‘उत्तेजित’ करने की आशंका
मोदी ने इसे ‘तुष्टिकरण की राजनीति’ का प्रतीक बताया, जो मुस्लिम लीग के दबाव में लिया गया। उन्होंने कहा कि नेहरू ने जिन्ना के विरोध को नजरअंदाज करने के बजाय गीत की ‘जांच’ शुरू कर दी, जो विभाजन की दिशा में पहला कदम था।
टैगोर का नेहरू को पत्र: केवल दो छंदों का सुझाव
एक महत्वपूर्ण परत के रूप में मोदी ने रवींद्रनाथ टैगोर के 26 अक्टूबर 1937 के पत्र का जिक्र किया, जिसमें टैगोर ने नेहरू को सलाह दी कि वंदे मातरम के केवल पहले दो छंद ही अपनाए जाएं। टैगोर ने लिखा: “इसके पहले भाग में मातृभूमि के सुंदर और कल्याणकारी पहलुओं पर जो कोमलता और भक्ति का भाव है, वह मुझे विशेष रूप से आकर्षित करता है। मैं इसे बाकी कविता और पुस्तक के उन भागों से अलग कर सकता हूं, जिनके भावों से मेरी सहमति नहीं है।”
टैगोर का तर्क था कि ये दो छंद किसी संप्रदाय या समुदाय को आहत नहीं करते। मोदी ने इसे कांग्रेस की कमजोरी से जोड़ा, हालांकि विपक्ष ने इसे टैगोर की स्वतंत्र राय बताया। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि यह पत्र CWC के संकल्प को प्रभावित करने वाला था।
1937 का CWC फैसला: छंदों को ‘काटने’ की घटना
पीएम ने 1937 के फैजपुर कांग्रेस अधिवेशन में CWC (कांग्रेस वर्किंग कमिटी) के फैसले को उजागर किया, जहां नेहरू की अध्यक्षता में गीत के चार छंद (जिनमें देवी दुर्गा का उल्लेख था) हटा दिए गए। इसमें महात्मा गांधी, सरदार पटेल, राजेंद्र प्रसाद और मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे सदस्य शामिल थे।
मोदी ने कहा कि यह फैसला मुस्लिम लीग के विरोध (मुहम्मद अली जिन्ना द्वारा नारेबाजी) के पांच दिन बाद लिया गया, जो ‘राष्ट्रीय गीत को तोड़ने’ का ऐतिहासिक पाप था। उन्होंने गांधी के 1905 के शब्दों का हवाला दिया, जहां गांधी ने इसे ‘राष्ट्रीय गान’ जैसा बताया था।
मुस्लिम लीग का विरोध और विभाजन से जुड़ाव
मोदी ने जिन्ना के 1937 के विरोध को रेखांकित किया, जहां लीग ने गीत को ‘मूर्तिपूजा’ से जोड़कर अस्वीकार किया। नेहरू के बजाय निंदा करने के, कांग्रेस ने गीत को ‘सेंसर’ किया, जो ‘विभाजनकारी मानसिकता’ का प्रतीक था।
उन्होंने इसे आज की चुनौतियों से जोड़ा: 50वें वर्ष (1925) में औपनिवेशिक दासता, 100वें वर्ष (1975) में इमरजेंसी, और अब 150वें वर्ष में ‘एकता की परीक्षा’।
गांधी और बोस की भूमिका
बोस पूरे गीत के पक्षधर थे, लेकिन नेहरू के पत्र से प्रभावित CWC ने इसे नजरअंदाज किया। गांधी ने शुरू में गीत को सराहा, लेकिन 1937 के फैसले में शामिल रहे।
मोदी ने कहा कि यह ‘भूली हुई परतें’ युवा पीढ़ी को जागरूक करने के लिए खोली गईं, ताकि वंदे मातरम की पूरी गरिमा बहाल हो। यह बहस राजनीतिक रूप से गरमाई रही, जहां कांग्रेस ने इसे ‘ऐतिहासिक तथ्यों का विकृतिकरण’ बताया और मोदी से टैगोर के लिए माफी मांगी। कुल मिलाकर, पीएम ने 1937 की घटनाओं को विभाजन से जोड़कर एक नया ऐतिहासिक नजरिया पेश किया, जो तुष्टिकरण और एकता की बहस को ताजा कर रहा है।







