जवान बच्चों की शादी में अभिभावकों की सहमति : परंपरा, अधिकार और सामाजिक संतुलन

दादा गौतम उर्फ़ हरियाणा के विधायक रामकुमार गौतम द्वारा विधानसभा में उठाया गया मुद्दा केवल विवाह की सहमति भर का नहीं, बल्कि समाज की दिशा और संस्कृति के संरक्षण का संकेत है। अभिभावकों की सहमति से विवाह संस्था मजबूत रहती है, जबकि युवाओं की स्वतंत्रता से समाज प्रगतिशील बनता है। चुनौती यह है कि दोनों के बीच संतुलन कायम किया जाए। कानून से अधिक आवश्यक है संवाद और परामर्श की संस्कृति। परिवार और बच्चों का पारस्परिक सम्मान ही वह आधार है, जो विवाह संस्था की गरिमा और समाज की नैतिकता को बनाए रख सकता है।

डॉ. प्रियंका सौरभ

 

भारत जैसे सांस्कृतिक और पारिवारिक मूल्यों वाले देश में विवाह केवल दो व्यक्तियों का निजी निर्णय नहीं होता, बल्कि यह परिवार, रिश्तेदार और व्यापक समाज की भागीदारी से जुड़ी एक सामाजिक संस्था है। ऐसे में जब हरियाणा विधानसभा में दादा गौतम ने यह मुद्दा उठाया कि जवान बच्चों की शादी में माँ-बाप की सहमति अनिवार्य होनी चाहिए, तो इस पर स्वाभाविक रूप से बहस छिड़ गई। यह बहस केवल एक कानूनी प्रावधान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके केंद्र में हैं—नैतिकता, परंपरा, संस्कृति, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक प्रतिष्ठा।

भारतीय संस्कृति में विवाह केवल एक सामाजिक अनुबंध या कानूनी व्यवस्था नहीं, बल्कि संस्कार है। विवाह को परिवारों का मिलन माना जाता है, न कि केवल दो व्यक्तियों का। यही कारण है कि भारत में अधिकांश विवाह आज भी परिवार और समाज की सहमति से ही तय होते हैं। माता-पिता अपने बच्चों के विवाह में केवल निर्णयकर्ता नहीं, बल्कि मार्गदर्शक होते हैं। उनका अनुभव, सामाजिक पहचान और रिश्तों की समझ विवाह संस्था को स्थिर बनाए रखने में सहायक होती है। परंपरा का यह स्वरूप परिवार की इज़्ज़त-आबरू, सामाजिक प्रतिष्ठा और रिश्तों की निरंतरता से गहराई से जुड़ा हुआ है।

विधानसभा में उठाया गया यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आधुनिक समय में तेजी से बदलती जीवनशैली और युवाओं की बढ़ती स्वतंत्रता ने विवाह संस्था की परिभाषा को बदलना शुरू कर दिया है। कई युवा प्रेम विवाह को प्राथमिकता दे रहे हैं। परिवार की सहमति के बिना विवाह करने के मामलों में वृद्धि हो रही है। कई बार ये विवाह सामाजिक असमानता, जातिगत भेदभाव और पारिवारिक दबाव के खिलाफ प्रतिरोध के रूप में सामने आते हैं। लेकिन इन सबके बीच सवाल यह भी उठता है कि यदि हर विवाह केवल व्यक्तिगत निर्णय बन जाए और अभिभावकों की सहमति को दरकिनार कर दिया जाए, तो समाज में नैतिकता, संस्कृति और रिश्तों की गरिमा पर गहरा संकट खड़ा हो सकता है।

अभिभावकों की सहमति के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यह है कि यह परिवार की इज़्ज़त और सामाजिक आबरू को बनाए रखती है। माता-पिता का अनुभव बच्चों के लिए मार्गदर्शक होता है। जीवन की कठिनाइयों, रिश्तों की बारीकियों और सामाजिक जिम्मेदारियों की समझ उनसे बेहतर किसी को नहीं हो सकती। विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि परिवारों और संस्कृतियों का मिलन होता है, इसलिए अभिभावकों की सहमति से विवाह में स्थिरता और दीर्घकालिक सफलता की संभावना अधिक होती है। जब परिवार पीछे खड़ा होता है तो विवाह का भावनात्मक संतुलन भी मजबूत रहता है।

दूसरी ओर विपक्ष में यह तर्क भी उतना ही प्रबल है कि भारतीय संविधान हर वयस्क नागरिक को यह अधिकार देता है कि वह अपनी पसंद का जीवनसाथी चुन सके। किसी भी प्रकार से अभिभावक की सहमति को बाध्यकारी बनाना व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अधिकारों का उल्लंघन होगा। कई बार अभिभावक जाति, धर्म, वर्ग या आर्थिक स्थिति को प्राथमिकता देकर बच्चों की पसंद को नकार देते हैं। ऐसे में यदि उनकी सहमति अनिवार्य कर दी जाए तो यह समानता और स्वतंत्रता के सिद्धांतों के खिलाफ होगा। अनचाहे विवाह का खतरा भी इसी से पैदा होता है, जहाँ बच्चों पर दबाव डालकर उनकी पसंद के विरुद्ध विवाह कराए जाते हैं। इससे न केवल विवाह असफल होते हैं बल्कि समाज में असंतोष और तनाव भी बढ़ता है।

युवाओं की स्वतंत्रता और समाज की प्रगति के लिए यह आवश्यक है कि उन्हें अपनी पसंद के निर्णय लेने का अवसर मिले। समाज तभी प्रगतिशील बन सकता है जब जातिगत और परंपरागत बंधनों को तोड़कर समानता और आधुनिकता को अपनाया जाए। यह भी सच है कि हर अभिभावक आवश्यक नहीं कि समझदार और प्रगतिशील हो। कई बार उनकी सोच परंपराओं और रूढ़ियों से बंधी होती है, जो बच्चों की स्वतंत्रता और खुशी के आड़े आ सकती है।

यह स्पष्ट है कि दोनों पक्षों में ठोस तर्क हैं। अभिभावकों की सहमति पूरी तरह नज़रअंदाज़ नहीं की जा सकती, क्योंकि यह परिवार और समाज के लिए आवश्यक है। वहीं युवाओं की स्वतंत्रता भी कमतर नहीं आँकी जा सकती, क्योंकि यह उनका संवैधानिक अधिकार है। अतः समाधान इस टकराव में नहीं, बल्कि संतुलन और संवाद में है। अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों की भावनाओं, पसंद और स्वतंत्रता को समझें। युवाओं को चाहिए कि वे अपने निर्णय में परिवार की प्रतिष्ठा और अनुभव को महत्व दें। सरकार और समाज की भूमिका यह होनी चाहिए कि वे संवाद और परामर्श को बढ़ावा दें, न कि केवल कानून बनाकर किसी एक पक्ष को बाध्य करें।

यदि सरकार इस विषय पर कदम उठाना चाहती है, तो सीधे कानून बनाने की बजाय कुछ सुधारात्मक कदम उठाए जा सकते हैं। विवाह के विवादित मामलों में परिवार और युवाओं के बीच संवाद स्थापित करने के लिए परामर्श केंद्र बनाए जा सकते हैं। जल्दबाजी और भावनात्मक निर्णयों को संतुलित करने के लिए मनोवैज्ञानिक और सामाजिक काउंसलिंग की व्यवस्था हो सकती है। अभिभावकों को समझाने के लिए संवेदनशीलता अभियान चलाए जा सकते हैं कि बच्चों की पसंद को नकारना समाधान नहीं है। वहीं युवाओं के लिए जागरूकता कार्यक्रम जरूरी हैं ताकि वे विवाह को केवल भावनात्मक निर्णय नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में समझें।

दादा गौतम द्वारा उठाई गई चिंता समाज के लिए एक आवश्यक चेतावनी है। अगर विवाह संस्था से परिवार और अभिभावकों की भूमिका पूरी तरह हटा दी गई, तो समाज में नैतिकता और संस्कार कमजोर होंगे। वहीं अगर अभिभावकों की सहमति को कानूनी रूप से बाध्यकारी बना दिया गया, तो युवाओं की स्वतंत्रता पर चोट पहुँचेगी। इसलिए समाधान केवल यही है कि विवाह संस्था को संवाद, सहमति और समझदारी पर आधारित बनाया जाए। अभिभावकों और बच्चों के बीच पारस्परिक सम्मान ही वह पुल है, जो परंपरा और आधुनिकता, अधिकार और जिम्मेदारी, स्वतंत्रता और संस्कार के बीच संतुलन स्थापित कर सकता है। यदि हम इस संतुलन को साध सके, तभी विवाह संस्था अपनी वास्तविक गरिमा और पवित्रता बनाए रख सकेगी और आने वाली पीढ़ियाँ एक सशक्त, संस्कारित और स्वतंत्र समाज का निर्माण कर सकेंगी।

✍️ डॉ. प्रियंका ‘सौरभ’

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