अपने-अपने भारत रत्न

 भारत रत्न पुरस्कार की चयन पद्धति क्या हो, निर्णय की प्रणाली क्या हो, इसमें कौन-कौन से लोग शामिल होने चाहिए? अभी इस पर बात नहीं हो रही है। अब तक जिन हस्तियों को भारत रत्न मिल चुका है। हम उनकी प्रतिष्ठा पर सवाल नहीं उठाते। लेकिन एक प्रश्न जरूर है कि माँ भारती के वो लाडले आखिर हर बार क्यों छूट जाते है जिनको देश की जनता दिल से भारत रत्न मानती है। हमारे देश में कलंकितों और घोटालेबाजों को भी खैरात की तरह सम्मान बांटे जाने का इतिहास है। ऐसे में सवाल लाजिम है कि क्या इसमें भी प्रलोभन चलते हैं और लाबिंग होती है? अपना सर्वस्व न्यौछावर करके देश की आजादी के लिए के लिए हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ जाने वाले अमर शहीद भगतसिंह, राजगुरु व सुखदेव को ‘भारत रत्न’ क्यों नहीं दिया जाना चाहिए? क्या भारत रत्न जैसे सम्मान भी अब सरकारी हो गए हैं? जब सत्ता में एक पार्टी रहती है, तो वो अपने लोगों को सम्मानित करती है और जब दूसरी आती है, तो वो अपनों को इस सम्मान के लिए चुनती है। जिसकी भी सरकार होती है वो अपने लाभ-हानि के हिसाब से अपने-अपने भारत रत्न प्रदान करती है। इस पुरस्कार को लेकर संसद में एक कानून बनाकर एक दिशा-निर्देश तय किए जाने की आवश्यकता है जिसमें सिर्फ सरकारी कर्मचारियों के निर्णय के अलावा विपक्षी पार्टियों और गैर सरकारी संस्थानों के अधिकारियों को शामिल किया जाना चाहिए। तभी इस सर्वोच्च सम्मान की प्रतिष्ठा शिखर पर रहेगी।

डॉ. सत्यवान सौरभ

भारत की जिन विभूतियों ने अपनी ज़िन्दगी में ‘भारत रत्न’ के पैदा होने से पहले ऐसा रुतबा हासिल कर लिया हो तो क्या उन नामों को इस सम्मान से परे रखा जाना चाहिए? आप पूछेंगे कि यह सवाल क्यों किया जा रहा है? यह सवाल इसलिए पूछे जा रहे हैं क्योंकि भारत रत्न के मामले में कुछ ऐसी गलतियां हुई हैं जिसके बाद यह सवाल ‘भारत रत्न’ की हर घोषणा के साथ ज़िन्दा हो जाता है। देश के लिए अपनी जान तक न्योछावर करने वालों को शहीद का दर्जा देने में मुश्किलों का पहाड़ खड़ा करें और जब अपनी ही सरकार में सरकार के शीर्ष नेता को भारत रत्न मिले तो हज़ारों प्रश्न स्वयं पैदा हो जाते है। 21वीं सदी का भारत जागृत भारत है, यहां का प्रत्येक नागरिक अब चाहने लगा है कि समाज के नायकों को राष्ट्रीय फलक पर प्राथमिकता दी जाय, लेकिन जब कभी उन्हें लगने लगता है कि उन्हें हाशिए पर डाला जा रहा है या पक्षपात हो रहा है, तब ऐसे मुद्दे उठ खड़े होते हैं और विवाद की परिधि में आ जाते हैं। देश में सबसे बड़ा सम्मान भारत रत्न को माना जाता है।

अपने क्षेत्र में देश के लिए कुछ करने जिसकी वजह से परिवर्तन आया हो। उसे देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया जाता है। ये सम्मान उसे दिया जाता है जिसने अपने क्षेत्र में असाधारण या सर्वोच्च सेवा दी हो। ये सम्मान राजनीति, कला, साहित्य, विज्ञान के क्षेत्र में किसी वैचारिक, वैज्ञानिक, उद्योगपति, लेखक और सामाज सेवी को दिया जाता है। ऐसे में खुदी राम बोस से लेकर बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद जैसे 20वीं सदी के नेताओं में किन्हीं के नाम को छोड़ने का औचित्य नहीं बनता। इसी तरह से 19वीं सदी में भी रानी लक्ष्मी बाई, राजा राम मोहन राय जैसे नामों को कैसे छोड़ा जा सकता है? फिर यह सिलसिला रुकेगा भी नहीं। अतीत में जाने का कोई अंत नहीं रह जाएगा। फिर, यह सवाल ख़त्म कैसे होंगे? भारत रत्न देने की प्रथा सीधी रही है; प्रधान मंत्री भारत के राष्ट्रपति को नामों की सिफारिश करते हैं, जो फिर ऐसे नामांकन स्वीकार करते हैं। लेकिन 2 जनवरी, 1954 के भारत के आधिकारिक गजट नोटिफिकेशन में इस प्रक्रिया का कोई उल्लेख नहीं है, जिसने भारत रत्न की स्थापना की।

सम्मान को मरणोपरांत प्रदान करने की अनुमति देने के लिए 15 जनवरी, 1955 को जारी एक अतिरिक्त अधिसूचना में भी इसके प्रक्रियात्मक पहलू का उल्लेख नहीं किया गया था। इसलिए, वह प्रक्रिया जिसके तहत प्रधान मंत्री या कैबिनेट भारत रत्न प्रदान करने के लिए राष्ट्रपति के पास नाम नामांकित करते हैं, एक परंपरा है न कि देश का कानून। इस मुद्दे पर आलोचना के साथ-साथ चुप्पी भी कई स्तरों पर देखने को मिलती है लेकिन चयन पद्धति क्या हो, निर्णय की प्रणाली क्या हो? इसमें कौन-कौन से लोग शामिल होने चाहिए? अभी इस पर बात नहीं हो रही है। वर्तमान सरकार कई पुरानी प्रणालियों को ध्वस्त करती दिखी है तो उसे इसके लिए भी एक प्रणाली विकसित करनी ही चाहिए कि ज्यादा से ज्यादा लोगों द्वारा इसे मान्यता मिले और यह शिखर सम्मान आलोचना से वंचित रहे। अब तक जिन हस्तियों को भारत रत्न मिल चुका है। हम उनकी प्रतिष्ठा पर सवाल नहीं उठाते। लेकिन एक प्रश्न जरूर है कि माँ भारती के वो लाडले आखिर हर बार क्यों छूट जाते है जिनको देश की जनता दिल से भारत रत्न मानती है?

हमारे देश में कलंकितों और घोटालेबाजों को भी खैरात की तरह सम्मान बांटे जाने का इतिहास है। ऐसे में सवाल लाजिम है कि क्या इसमें भी प्रलोभन चलते हैं और लाबिंग होती है? अपना सर्वस्व न्यौछावर करके देश की आजादी के लिए के लिए हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ जाने वाले अमर शहीद भगतसिंह, राजगुरु व सुखदेव को ‘भारत रत्न’ क्यों नहीं दिया जाना चाहिए? क्या भारत रत्न जैसे सम्मान भी अब सरकारी हो गए हैं? जब सत्ता में एक पार्टी रहती है, तो वो अपने लोगों को सम्मानित करती है और जब दूसरी आती है, तो वो अपनों को इस सम्मान के लिए चुनती है। भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान दशकों से विवादों में रहा है, क्या टाइमिंग के हिसाब से, पक्षपात या कई बार उसे राजनीतिक पार्टियां अपने वोट बैंक के हिसाब से इस अवार्ड को भुनाने की कोशिश करती हैं, तब जब यह सम्मान राष्ट्रीय सेवा के लिए दिया जाता है। इन सेवाओं में कला, साहित्य, विज्ञान, सार्वजनिक सेवा और खेल शामिल है।खेल को सबसे पहले ‘किसी’ खिलाडी के लिए ही नियम में बदलाव कर इसे भारत रत्न खेल श्रेणी को जोड़ा गया और दिया गया। और यहीं से एक नए विवाद और विरोध की भी शुरुआत हुई।

क्या इससे पहले खेलों में कोई प्रेरक व्यक्तित्व या खिलाडी नहीं था? जिस खिलाडी को ये भारत रत्न मिला उनकी काबिलियत पर कोई शक नहीं लेकिन उनके मुकाबले खेलों के जिस जादूगर की अनदेखी की गई वो बेहद दुखद रही। आखिर क्यों नेता जी सुभाष चन्द्र बोस, शहीद-ए-आजम भगत सिंह, डॉ. राम मनोहर लोहिया, हॉकी के जादूगर ध्यानचंद को आज तक भारत रत्न नहीं। अवसरवादी राजनीति ने यह स्थिति पैदा की है। इस अवसरवाद ने ‘भारत रत्न’ की नींव ही हिला दी। अगर भारत रत्न की प्रतिष्ठा को आगे बढ़ाना है तो हमें इस दिशा में सोचना ही होगा। अन्यथा ये सवाल उठते रहेंगे कि भगत सिंह, खुदीराम बोस, सुभाष चंद्र बोस, महात्मा गांधी जैसे सपूत क्यों ‘भारत रत्न’ से दूर रहे? हमें ये साफ कर देना चाहिए कि इन सपूतों ने अपने जीवन में जो हासिल कर लिया, उसके सामने कोई भी सम्मान बड़ा नहीं है। ये सपूत पहले महान् बने, ‘भारत रत्न’ बाद में पैदा हुआ। दरअसल भारत रत्न इस तरह के सेवा कार्यों के लिए ही दी जानी चाहिए जिससे कि किसी भी स्तर पर लाखों लोग लाभान्वित हों और प्रेरणा पा सकें।

देश का यह सर्वोच्च नागरिक सम्मान आखिर किसे दिया जाए इसके लिए कोई वैधानिक प्रक्रिया तो होनी चाहिए जिससे कि इस सम्मान का एक आदरणीय स्थान बना रहे। क्योंकि इससे देश के सभी वर्गों की आकांक्षाएं जुड़ी हैं लेकिन ऐसा हो नहीं पाता। जिसकी भी सरकार होती है वो अपने लाभ-हानि के हिसाब से अपने-अपने भारत रत्न प्रदान करती है। इस पुरस्कार को लेकर संसद में एक कानून बनाकर एक दिशा-निर्देश तय किए जाने की आवश्यकता है जिसमें सिर्फ सरकारी कर्मचारियों के निर्णय के अलावा विपक्षी पार्टियों और गैर सरकारी संस्थानों के अधिकारियों को शामिल किया जाना चाहिए। तभी इस सर्वोच्च सम्मान की प्रतिष्ठा शिखर पर रहेगी।

 

(लेखक कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट हैं)

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