लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़े 131वें संविधान संशोधन बिल पर वोटिंग हुई। सरकार (NDA) को दो-तिहाई बहुमत नहीं मिला — 298 वोट समर्थन में और 230 वोट विरोध में पड़े। बिल गिर गया। यह मोदी सरकार के 12 साल में पहली बड़ी विधायी हार है।
क्या था मुद्दा?
बिल महिला आरक्षण (लोकसभा और विधानसभाओं में 33% सीटें) को लागू करने के लिए था।
लेकिन इसमें परिसीमन (delimitation) से जुड़े प्रावधान भी थे, जिससे लोकसभा सीटें बढ़ाने (लगभग 50% तक) और दक्षिणी राज्यों (खासकर तमिलनाडु, केरल, आंध्र, तेलंगाना) के प्रतिनिधित्व पर असर पड़ने की आशंका जताई गई।
विपक्ष (INDIA ब्लॉक) ने इसे दक्षिण vs उत्तर का मुद्दा बनाया, कहा कि यह दक्षिण की राजनीतिक आवाज़ को कमजोर करने और BJP के फायदे की चाल है।
‘अंतरात्मा की आवाज’ वाली अपील
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वोटिंग से पहले सांसदों से अपील की कि वे अंतरात्मा की आवाज सुनें और महिलाओं के हक के लिए बिल पास करें। अमित शाह ने भी दो दिन बहस की। लेकिन विपक्ष एकजुट रहा और बिल खारिज हो गया।
स्टालिन का बयान
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन (DMK) ने कहा:
“तमिलनाडु ने दिल्ली का अहंकार हराया है। 23 अप्रैल को हम दिल्ली के अहंकार और उसके गुलामों को भी हराएंगे।”
उन्होंने इसे तमिलनाडु और दक्षिण भारत की जीत बताया, जो परिसीमन के खिलाफ पहले से आंदोलन कर रहे थे (काले झंडे, बिल जलाना आदि)।
अन्य प्रतिक्रियाएँ
ममता बनर्जी: परिसीमन से देश बंट जाएगा, महिला आरक्षण का समर्थन है लेकिन साजिश नहीं।
अरविंद केजरीवाल: मोदी के अहंकार की हार।
कांग्रेस/विपक्ष: इसे परिसीमन की चाल बताया, जाति जनगणना में देरी का आरोप लगाया।
BJP: विपक्ष को महिला-विरोधी बताया, कहा कि महिलाओं का मौका गंवाया।
सरकार ने संकेत दिया है कि परिसीमन से जुड़े अन्य बिल भी फिलहाल आगे नहीं बढ़ाए जाएंगे।
संक्षेप में: विपक्ष की एकजुटता ने केंद्र की योजना को रोका। दक्षिणी राज्यों (खासकर तमिलनाडु) में यह मुद्दा राजनीतिक रूप से बहुत संवेदनशील है, क्योंकि परिसीमन से उनकी लोकसभा सीटों का अनुपात घटने का डर है। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव (23 अप्रैल 2026?) के ठीक पहले यह घटना और भी महत्वपूर्ण हो गई है।

