जलते है केवल पुतले, रावण बढ़ते जा रहे ?

दशहरे पर रावण का दहन एक ट्रेंड बन गया है। लोग इससे सबक नहीं लेते। रावण दहन की संख्या बढ़ाने से किसी तरह का फायदा नहीं होगा। लोग इसे मनोरंजन का साधन केे तौर पर लेने लगे हैं। हमें अपने धार्मिक पुरानों से प्रेरणा लेनी चाहिए। रावण दहन के साथ दुर्गुणों को त्यागना चाहिए। रावण दहन दिखाने का अर्थ बुराइयों का अंत दिखाना है। हमें पुतलों की बजाए बुराइयों को छोड़ने का संकल्प लेना चाहिए। समाज में अपराध, बुराई के रावण लगातार बढ़ रहे हैं। इसमें रिश्तों का खून सबसे अधिक हो रहा है। मां, बाप, भाई, बहन, बच्चों तक की हत्या की जा रही है। दुष्कर्म के मामले भी लगातार बढ़ते जा रहे हैं।

प्रियंका सौरभ

हर साल विजयादशमी में रावण वध देखते है तो मन में आस होती है की समाज में बसे रावण कम होंगे।लेकिन ये तो रक्तबीज के समान है। रावणों को संख्या में बेहिसाब इजाफा हो रहा है। एक कटे सौ पैदा हो रहे है। वो तो फिर भी महान था। विद्वान था,नीति पालक था,शूरवीर था,कर्तव्यनिष्ठ था,सच्चा शासक था,अच्छा पति था,अच्छा भाई था,भगवन शिव का उपासक था।सीता का हरण किया, लेकिन बुरी नजर से नहीं देखा। विवाह का निवेदन किया लेकिन जबरन विवाह नहीं किया। एक गलती किया जिसकी उसे सजा भुगतनी पड़ी मगर आज के दौर में हज़ारों अपराध करने के बाद भी रावण सरेआम सड़कों पर घूम रहें है, कोई लाज नहीं,शर्म नहीं।

दशहरे पर रावण का दहन एक ट्रेंड बन गया है। लोग इससे सबक नहीं लेते। रावण दहन की संख्या बढ़ाने से किसी तरह का फायदा नहीं होगा। लोग इसे मनोरंजन का साधन केे तौर पर लेने लगे हैं। देश में रावण की लोकप्रियता और अपराधों का ग्राफ लगातार ऊंचा होता जा रहा है। पिछले वर्ष के मुकाबले हर बरस देश के विभिन्न हिस्से में तीन गुणा अधिक रावण के पुतले फूंके जाते है। इसके बावजूद अपराध में कोई कमी आएगी, इसके बढ़ते आंकड़े देखकर तो ऐसा नहीं लगता। हमें अपने धार्मिक पुरानों से प्रेरणा लेनी चाहिए। रावण दहन के साथ दुर्गुणों को त्यागना चाहिए। रावण दहन दिखाने का अर्थ बुराइयों का अंत दिखाना है। हमें पुतलों की बजाए बुराइयों को छोड़ने का संकल्प लेना चाहिए। समाज में अपराध, बुराई के रावण लगातार बढ़ रहे हैं। इसमें रिश्तों का खून सबसे अधिक हो रहा है। मां, बाप, भाई, बहन, बच्चों तक की हत्या की जा रही है। दुष्कर्म के मामले भी लगातार बढ़ते जा रहे हैं।

रावण सर्व ज्ञानी था उसे हर एक चीज का अहसास होता था क्योंकि वह तंत्र विद्या का ज्ञाता था। रावण ने सिर्फ अपनी शक्ती एवम स्वय को सर्वश्रेष्ट साबित करने में सीता का अपहरण अपनी मर्यादा में रह कर किया। अपनी छाया तक उस पर नही पड़ने दी। आज का रावन धूर्त है,जाहिल है, व्यभिचारी है, दहेज़ के लिए पत्नी को जलाता है, शादी की नियत से महिलाओ का अपहरण करता है। इस कुकृत्य में असफल हुआ तो बलात्कार भी। धर्म के नाम पर कत्लेआम करता है,लड़ने की शक्ति उसमे है नहीं,सो दुसरे के कंधे पर बन्दुक रख के चलाता है। नीतियों से उसका कोई वास्ता नहीं है,पराई नारी के प्रति उसके मन में कोई श्रद्धा नहीं। राजा अपने फायदे देख के जनता की सेवा करता है। आज का रावण उस रावण से क्रूर है, खतरनाक है, सर्वव्यापी है। वह महलों में रहता है। गली कुचो में रहता है। गाँव में भी है। शहर में भी है। वह गवार भी है ।पढ़ा लिखा भी है। लेकिन राम नहीं है की उसकी गर्दन मरोड़ी जा सके। बस एक आस ही तो है की समाज से रावणपन चला जाएगा खुद ब खुद एक दिन। रावण के दुख, अपमान और मृत्यु का कारण कोई नहीं था।

रावण की मृत्यु का मुख्य कारण वासना थी, जो उसके अंतिम विनाश का कारण था। इतिहास इस बात का गवाह है कि कामुक पुरुष (और महिलाएं भी) कभी सुखी नहीं रहे। विपरीत लिंग के प्रति उनके जुनून के कारण कई शक्तिशाली राजाओं ने अपना राज्य खो दिया। रावण ने सीता की शारीरिक सुंदरता के बारे में सुना, फिर उस पर विचार करना शुरू कर दिया और अंततः उस गलत इच्छा पर कार्य करना शुरू कर दिया। और अंत में वासना ही रावण की मृत्यु का मुख्य कारण बनी। लंकापति रावण महाज्ञानी था लेकिन अहंकार हो जाने के कारण उसका सर्वनाश हो गया। रावण परम शिव भक्त भी था। तपस्या के बल पर उसने कई शक्तियां अर्जित की थीं। रावण की तरह उसके अन्य भाई और पुत्र भी बलशाली थे। लेकिन आचरण अच्छे न होने के कारण उनके अत्याचार लगातार बढ़ते जा रहे थे जिसके बाद भगवान ने राम के रूप में अवतार लिया और रावण का वध किया। वाल्मीकि रामायण में रावण को अधर्मी बताया गया है। क्योंकि रावण ज्ञानी होने के बाद भी किसी भी धर्म का पालन नहीं करता था। यही उसका सबसे बड़ा अवगुण था। जब रावण की युद्ध में मृत्यु हो जाती है तो मंदोदरी विलाप करते हुए कहती हैं, अनेक यज्ञों का विलोप करने वाले, धर्म व्यवस्थाओं को तोड़ने वाले, देव-असुर और मनुष्यों की कन्याओं का जहां तहां से हरण करने वाले, आज तू अपने इन पाप कर्मों के कारण ही वध को प्राप्त हुआ है।

रावण के जीवन से हमें जो सीख लेनी चाहिए वह यह है कि हमें कभी भी अपने हृदय में वासना को पनपने नहीं देना चाहिए। किसी भी प्रकार की वासना के लिए हमें लगातार अपने हृदय की जांच करनी चाहिए। अगर है तो उसे कली में डुबा दें। क्योंकि अगर अनियंत्रित छोड़ दिया गया तो यह हमें पूरी तरह से नष्ट कर देगा। सब कुछ चिंतन से शुरू होता है। आज के लोग इतने शिक्षित और समझदार हो गये है की सबको पता है बुराई और अच्छाई क्या होता है। लेकिन फिर भी दुनिया में बुराइयाँ बढती ही जा रही है।जो सन्देश देने के लिए रावण दहन की प्रथा शुरू किया गया था, वो संदेश तो आज कोई लेना ही नही चाहता।तो फिर हर साल रावण दहन करने से क्या फायदा है। बहुत से लोग इस दुनिया में इतने बुरे है की रावण भी उसके सामने देवता लगने लगे। ऐसे बुरे लोग बुराई के नाम पे रावण दहन करे तो ये तो रावण का अपमान ही है। साथ ही अच्छाई का भी।

(लेखिका रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,
कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार हैं)

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