एक सहारा लाखों बेसहारा

अरुण श्रीवास्तव 

‘एक सहारा, सबका सहारा, सामूहिक उन्नति का नारा। निष्ठा और लग्न की एक, पह़चान बनकर आये हैं…।। है तो यह पंक्ति सहारा गान की जिसे कथित कर्तव्ययोगियों से ‘ज़बरन’ गवाया जाता था। अब ज़बरन तो बहुत चीजें होती थीं। बानगी के तौर पर साप्ताहिक यूनिफार्म ‘सहारा प्रणाम, गुड सहारा, काली पैंट-सफ़ेद शर्ट (मय सहारा लोगो वाली टाई) काला जूता-मोजा। यह सबके लिए अनिवार्य होता था न पहनने पर सैलरी का काट लिया जाता था। इसे धारण करवाने की व्यवस्था भी ‘मारू’ होती थी। इस नियम का लोग पालन कर रहे हैं या नहीं इसकी जांच संस्था के ऑफिसियल दामाद एचआरआर के कर्तव्ययोगियों के हवाले थी। इसके अलावा हर शनिवार को असेंबली हुआ करती थी जिसे सहारा के परम आदरणीय जो कि अपने संबोधन में कहना अनिवार्य था ही कहते थे। पीएम मोदी के मन की बात की तरह इसका भी विषय पहले से तय नहीं होता था, जिस तरह महीने के अंत में मन की बात होती है वैसे ही सप्ताह के अंत में सुब्रत राय (अंत में सहारा जुड़ गया था और मक्खनबाजी में लोग उन्हें सहारा श्री सुब्रतो राय सहारा परम आदरणीय तो रहता ही था) कहते थे। असेंबली व अन्य बैठकों का समय सहारा इंडिया भवन के कर्मचारियों के सुविधानुसार ही होती थी कभी भी अखबारवालों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए नहीं हुई। वैसे भी अखबार वाले उनकी नजर में दोयम दर्जे के थे।

सहारा इंडिया के कर्तव्ययोगियों की तुलना में उनका वेतन ढांचा और सुविधाएं बहुत ही कम हुआ करती थीं। मसलन एलटीसी किस चिड़िया को कहते हैं ये शायद ही राष्ट्रीय सहारा के किसी कर्मचारी को पता हो जबकि हर विभाग के और संपादकीय के मक्ख़नबाज़ ही इस सुविधा का उपभोग कर पाए। खुद लेखक अपनी नौकरी का एक बड़ा हिस्सा लखनऊ और देहरादून में बिताया लेकिन चंद सालों पहले दैनिक जागरण के अनूप गैरोला ही एलटीसी से लाभान्वित हुए। इसी तरह अखबारवालों को आर.एच. (प्रतिबंधित अवकाश) भी बाद में मिला और सैलरी/फेस्टिवल एडवांस भी।
अब पता नहीं क्यों अखबारी दुनिया में चर्चा का विषय बना कि, जागरण का काम, हिंदुस्तान का नाम और सहारा (तब अमर उजाला लखनऊ से छपता नहीं था) का दाम लेकिन यह लंबा नहीं चला। अपने प्रकाशन के समय दैनिक हिन्दुस्तान दुगनी-तिगुनी सैलरी पर इन्हीं अखबार के लोगों को ले गया। बहरहाल यह बात आज़ किसी से छिपी नहीं कि, इन अखबारों और सहारा के तथाकथित कर्तव्ययोगियों की माली हालत क्या है? सहारा की माली हालत क्या है? अपनी साप्ताहिक बैठक (असेंबली) में तब के परम आदरणीय सहारा श्री सुब्रतों राय सहारा बड़ी ठसक के साथ कहते थे कि, हम विश्व के सबसे बड़े परिवार (सहारा इंडिया परिवार) हैं, यहां कोई मालिक नहीं है सब कर्तव्ययोगी हैं। खुद को भी मैनेजिंग वर्कर कहते थे। हालांकि सहारा इंडिया की 2014 की डायरी में उनके पदनाम के साथ चेयरमैन लगा हुआ है। इसी डायरी में सहारा की बैलेंसीट में नेटवोंड फंड ₹22,926 बतायी गई है। अन्य विवरण में लैंड बैंक 33,631 Acres और work force (कार्यशक्ति) 11 लाख वेतनभोगी और फील्ड वर्कर तथा कुल 4799 स्टैब्लिशमेंट बताया गया है। हालांकि सुब्रत राय की जेल जाने के बाद इसमें से अधिकांश भ्रामक साबित हुए।
हां एक बात और जिस तरह से इस समूह ने अपने इंवेस्टरों को अंधेरे में रखा उसी तरह हम अखबारकर्मी भी अंधेरे में रहे। सतही तौर पर वेतन और सुविधाएं समकक्ष समाचार पत्रों के कर्मचारियों से बहुत अच्छी नहीं तो बहुत खराब भी नहीं थी। सुविधाएं काफ़ी थीं और सलाना बढ़ोतरी भी। कभी कभार बीच में भी टुकड़े फेंक दिये जाते थे जैसे सहारा इंडिया के 25 वर्ष पूरे होने पर एकतरफ से सबका वेतन 25 फीसद बढ़ा। बाकी अन्य संस्थाओं की तरह चमचों व बड़े अधिकारियों के रिश्तेदारों की वेतन-वृद्धि और पदोन्नति अधिकारियों के कद के अनुसार होती। इसका दूसरा पहलू यह था कि, जब उस अधिकारी का शाख पेड़ से अलग कर दी जाती तो उसके रिश्तेदारों की स्थिति शाख पर लटके पत्ते जैसी हो जाती। भर्ती का आलम यह था कि जिस व्यक्ति ने सुब्रत राय को हिंदी सिखायी, उनकी पत्नी को म्यूजिक सिखाया, उनके दोनों बेटों को अय्याशी करायी वो कहीं न कहीं अधिकारी हैं। यही नहीं सुब्रत राय की कथित एक मित्र आज भी बड़े ओहदे पर हैं तो एक अन्य महिला मित्र सहारा रूपी जहाज के निकट भविष्य में डूब जाने के भय से विदा ले ली। बात यहीं तक होती तो भी समझ में आती किसी समय (कक्षा आठ) सुब्रत के सहपाठी रहे वाराणसी क्षेत्र के जोनल हेड थे। चुगलखोरी, कानाफूसी और राजनीतिक दबाव में सहारा में प्रवेश आम बात थी। अकेले अखबार में ही बाराबंकी से एक विधायक की सिफारिश पर दर्जनों भर्तियां हुईं। हर अधिकारी ने अपने चहेतों को न केवल सहारा में रखवाया उसको पाला पोसा भी। अखबार के पहले मुखिया ने अपने स्वजातियों की थोक में भर्ती की। मसलन लखनऊ संस्करण के संपादक के कार्यकाल में ब्राह्मणों का बोलबाला था तो एक रिपोर्टर से समूह संपादक बने के कार्यकाल में ठाकुरों का बोलबाला था। पूरे सहारा के नंबर दो रहे के समय पूर्वांचलियों और कायस्थों की बल्ले-बल्ले थी।
सुब्रत राय के जेल जाते ही सहारा इंडिया और उसके कथित कर्तव्ययोगियों ख़ासकर छोटे-छोटों पर मानों दुखों का ‘पहाड़’ टूट पड़ा हो। समय से वेतन आना बंद, सैलरी/फेस्टिवल एडवांस बंद, हाउसिंग/वाहन लोन की सुविधा बंद, सब्सिडाइज्ड कैंटीन की सेवाएं बंद, अधिकारियों (कहने को सबके सब कर्तव्ययोगी हैं कोई अधिकारी नहीं) को अधिनस्थों को चाय-नाश्ता वाली पीली पर्ची बंद, अखबार में काम करने वाले को फ्री अखबार बंद, बोनस बंद, सालाना इंक्रीमेंट बंद, प्रमोशन बंद, प्रमुख शहरों में किराए वाले टेस्ट हाउस की सुविधा बंद, अधिकारियों की हवाई यात्राएं बंद, रिटायरमेंट के बाद कर्मचारियों को मिलने वाला बकाया बंद, भविष्य निधि काटने के बाद भी अंशदान बंद और तो और लंबे समय तक वेतन का महत्वपूर्ण हिस्सा डीए को भी बंद कर रखा था। इसी कड़ी में सहारा की अंग्रेजी पत्रिका बंद की गई, सहारा समय साप्ताहिक बंद किया गया, एयर लाइंस बंद की गई, धीरे धीरे करके चैनल बंद किए गए और क्यू शॉप भी जैसे उदय हुआ वैसे ही अस्त भी हुआ। वैसे बंद करने का सहारा का इतिहास काफी पुराना है। सहारा सिलाई मशीन, सहारा पंखा, कंबल, हिंदी साप्ताहिक शान-ए-सहारा भी जब जोर पकड़ने लगा तो बंद कर दिया गया। बंद होने की फ़ेहरिस्त में राष्ट्रीय सहारा की साप्ताहिक पत्रिका हस्तक्षेप भी शामिल है।
ध्यान देने वाली बात यह भी है कि, कभी सहारा का अधिकारी वर्ग ठसक के साथ कहता था कि, सहारा में किसी तरह की कोई यूनियन नहीं है। यानी जब मालिक-श्रमिक के मध्य कोई ही नहीं है तो कर्मचारी यूनियन क्यों बनायें। सरसरी निगाह से सही भी है। पर सहारा मीडिया में व्याप्त असंतोष तो कुछ और ही इशारा कर रहा है। कथित कर्तव्ययोगियों ने एक बार नहीं कई बार कार्य बाधित किया, कई बार हड़ताल हुई कई दिनों तक अखबार नहीं छपा और यह सब सुब्रत राय के जीते जी हुआ। वैसे यूनियन भी बनती, किसी राष्ट्रीय यूनियन (सीटू) से संबद्ध भी होती। देश में जयचंदों की कमी नहीं हालांकि बहुत से खुद उत्पीड़न के शिकार हुए। इन्हीं जयचंदों के कारण सहारा के आंदोलनकारी भी इससे अछूते नहीं रहे। जो लोग अनियमित वेतन के लिए आज़ आंदोलन कर रहे हैं तब आंदोलन में शामिल होते, भीतरघात न करते तो यह नौबत ही न आती। इस समाचार को लिखने वाला 24 साल की नियमित सेवा के बाद 2016 में निकाल दिया गया था। आज़ भी दो-दो मुकदमे (निलंबन और टर्मिनेशन) लेबर कोर्ट में विचाराधीन हैं।

 

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