प्रेमानंद जी महाराज के हालिया बयान में लिव-इन रिलेशनशिप पर टिप्पणी ने फिर से विवाद खड़ा कर दिया है। उन्होंने कहा, “एक बार चरित्र गया तो वापस नहीं आता,” जिसका तात्पर्य यह था कि जो महिलाएं बार-बार अपनी संगति बदलती हैं और अलग-अलग पुरुषों के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहती हैं, वे स्थायी सुख और शांति प्राप्त नहीं कर सकतीं। उनका यह बयान भारतीय संस्कृति के खिलाफ लिव-इन रिलेशनशिप को मानते हुए आया, जिसमें उन्होंने स्थिर और समर्पित संबंधों को ही असली शांति का स्रोत बताया। इस बयान ने सोशल मीडिया से लेकर आम लोगों तक बहस छेड़ दी है।
कुछ लोगों, खासकर युवाओं और कॉलेज छात्राओं ने इस बयान को एकतरफा और रूढ़िवादी माना। एक छात्रा ने कहा, “लिव-इन रिलेशनशिप रिश्तों को परखने का मौका देता है, यह चरित्र पर सवाल नहीं उठाता।” दूसरी ओर, प्रेमानंद जी के समर्थकों और परंपरावादियों ने उनके बयान को सत्य और भारतीय संस्कृति की रक्षा से जोड़ा। एक समर्थक ने कहा, “आज विरोध करने वाले बाद में उनकी बात की सच्चाई समझेंगे।”
यह विवाद समाज में स्वतंत्रता और परंपरा के बीच द्वंद्व को दर्शाता है। प्रेमानंद जी के बयान ने लिव-इन रिलेशनशिप को “गंदगी का खजाना” और केवल “2-4% लड़कियों को पवित्र” बताने जैसे कथनों के साथ और तूल पकड़ा।
हालांकि, कानूनी तौर पर भारत में लिव-इन रिलेशनशिप को सुप्रीम कोर्ट ने वैध माना है, बशर्ते दोनों पक्ष वयस्क और सहमति से साथ रहें। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी हाल ही में ऐसे जोड़ों को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत “राइट टू लाइफ” के अंतर्गत सुरक्षा का अधिकार दिया।
इस मुद्दे पर समाज दो धड़ों में बंटा दिखता है—एक ओर वे जो इसे व्यक्तिगत आजादी और आधुनिकता से जोड़ते हैं, दूसरी ओर वे जो इसे सांस्कृतिक मूल्यों के खिलाफ मानते हैं। प्रेमानंद जी के बयान ने इस बहस को और हवा दी है, जिससे संवाद की जरूरत और बढ़ गई है।1
कुछ लोगों, खासकर युवाओं और कॉलेज छात्राओं ने इस बयान को एकतरफा और रूढ़िवादी माना। एक छात्रा ने कहा, “लिव-इन रिलेशनशिप रिश्तों को परखने का मौका देता है, यह चरित्र पर सवाल नहीं उठाता।” दूसरी ओर, प्रेमानंद जी के समर्थकों और परंपरावादियों ने उनके बयान को सत्य और भारतीय संस्कृति की रक्षा से जोड़ा। एक समर्थक ने कहा, “आज विरोध करने वाले बाद में उनकी बात की सच्चाई समझेंगे।”
यह विवाद समाज में स्वतंत्रता और परंपरा के बीच द्वंद्व को दर्शाता है। प्रेमानंद जी के बयान ने लिव-इन रिलेशनशिप को “गंदगी का खजाना” और केवल “2-4% लड़कियों को पवित्र” बताने जैसे कथनों के साथ और तूल पकड़ा।
हालांकि, कानूनी तौर पर भारत में लिव-इन रिलेशनशिप को सुप्रीम कोर्ट ने वैध माना है, बशर्ते दोनों पक्ष वयस्क और सहमति से साथ रहें। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी हाल ही में ऐसे जोड़ों को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत “राइट टू लाइफ” के अंतर्गत सुरक्षा का अधिकार दिया।
इस मुद्दे पर समाज दो धड़ों में बंटा दिखता है—एक ओर वे जो इसे व्यक्तिगत आजादी और आधुनिकता से जोड़ते हैं, दूसरी ओर वे जो इसे सांस्कृतिक मूल्यों के खिलाफ मानते हैं। प्रेमानंद जी के बयान ने इस बहस को और हवा दी है, जिससे संवाद की जरूरत और बढ़ गई है।1








