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कांशीराम पर अब दलित वोटबैंक की राजनीति, सभी दल लगाने भुनाने में!

बसपा के संस्थापक कांशीराम की जयंती के आसपास विपक्षी दल (मुख्य रूप से सपा, कांग्रेस और कुछ हद तक भाजपा से जुड़े प्रयास) कांशीराम की विरासत और दलित वोट बैंक को साधने की कोशिश में जुटे हैं। विपक्ष कांशीराम को याद करके “बहुजन” और दलित समुदाय में अपनी पैठ बढ़ाने की रणनीति अपना रहा है, जिसे खबर में “चक्रव्यूह” कहा गया है। इससे मायावती की बसपा के लिए दलित वोटों का एक बड़ा हिस्सा छिटकने का खतरा मंडरा रहा है।

विपक्ष की रणनीति: राहुल गांधी ने कहा कि नेहरू जी होते तो कांशीराम यूपी के मुख्यमंत्री बनते। कांग्रेस ने कांशीराम के लिए भारत रत्न की मांग की। सपा PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के जरिए दलितों को आकर्षित करने की कोशिश कर रही है। यह सब कांशीराम की “बहुजन” विचारधारा को अपने पक्ष में मोड़ने जैसा है।
मायावती की प्रतिक्रिया: उन्होंने इसे “अवसरवादी फैशन” बताया। विपक्ष पर तीखा हमला बोला कि वे कांशीराम का नाम सिर्फ वोट के लिए लेते हैं, लेकिन बहुजन हित में काम नहीं करते। कांग्रेस को “दलित विरोधी” कहा (बाबासाहेब अम्बेडकर के साथ व्यवहार का हवाला देकर)। सपा के PDA को “छलावा” बताया। उन्होंने बसपा कार्यकर्ताओं से सतर्क रहने की अपील की और कांशीराम के लिए भारत रत्न की मांग दोहराई। मायावती का सियासी फ्यूचर क्यों उलझा हुआ है?

बसपा 2022 में सिर्फ 1 सीट पर सिमट गई थी (206 से गिरावट)। दलित वोट बैंक में सेंध लग रही है।
2027 UP चुनाव में अकेले लड़ने का ऐलान किया है मायावती ने, कोई गठबंधन नहीं।
विपक्ष का यह “कांशीराम कार्ड” बसपा के कोर वोटर (दलित, खासकर जाटव) को प्रभावित कर सकता है।
मायावती की उम्र और पार्टी में संगठनात्मक कमजोरी भी चुनौती बनी हुई है।

संक्षेप में, विपक्ष कांशीराम की विरासत पर दावा ठोककर मायावती को घेरने की कोशिश कर रहा है, जिससे उनका राजनीतिक भविष्य (खासकर बसपा का UP में अस्तित्व) संकट में दिख रहा है। मायावती इसे “चक्रव्यूह” से पार पाने के लिए बहुजन एकता और सतर्कता पर जोर दे रही हैं।

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