समय से पहले कुछ नहीं मगर चलिए समय की रेत पर….

हम समय से मुंह नहीं मोड़ सकते कि समय हमारा मित्र नहीं है। समय को मित्र बनाना पड़ता है, समय कभी हमारी प्रतीक्षा में पलक पांवड़े बिछाकर नहीं बैठता। हमें ही उसके साथ कदम मिलाकर चलना होता है। समय अपनी गति से दिन-रात बिना विश्राम के चलता है। यह हमारी समझदारी है कि हम उसके सहारे ही जीवन में वह सब कुछ प्राप्त कर सके जिसकी हम कामना करते हैं। यदि मनुष्य समय का मूल्य पहचान ले तो सफलता की सीढ़ियों पर चढने से कोई नहीं रोक सकता। जीवन में हर कदम पर असफ़लता का डर होता है लेकिन हम अपनी सामर्थ्य और शक्ति से समय की रेत पर अपने निशान छोड़ इस दुनिया से विदा ले सकते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मिसाल बन सकते हैं।

प्रियंका सौरभ

समय से पहले और भाग्य से ज्यादा न कभी किसी को मिला है और ना ही मिलेगा। परंतु हम सिर्फ भाग्य के भरोसे नहीं रह सकते, व्यक्ति को अपने जीवन में पुरुषार्थ करना ही पड़ता है। बिना पुरुषार्थ के व्यक्ति यदि यह चाहे की सब कुछ मिल जाए जो मेरे भाग्य में है, वह कदापि संभव नहीं होता है। क्योंकि गतिमान जीवन यात्रा में इंसान की इच्छाएं अनंत होती है। बिना पुरुषार्थ के भोजन भी नहीं मिल सकता है और बिना पुरुषार्थ के किसान खेती भी नहीं कर सकता है। हां जी। मै तो यही मानती हू। मेहनत करो जितनी तुमसे हो सके और उसके बाद भी मंजिल ना मिले तो क्या कहेंगे इसे आप? भाग्य में लिखा होगा तो दौड़कर भी तुम्हारे पास तुम्हारी मंजिल आएगी और अगर भाग्य में नही है तो तुम कितने ही प्रयास कर लो तुम्हें तुम्हारी मंजिल मिलेगी ही नहीं। पर इसका मतलब ये नहीं है कि तुम हाथ पर हाथ रख कर बैठ जाओ कि भाग्य में होगा तो मिल ही जाएगा अपने आप तो ऐसा नहीं है। कहते है भगवान और भाग्य भी उन्हीं का साथ देता है जो पूरी श्रद्धा और लगन से मेहनत में जुट जाते है

क्यों माना जाता है कि समय से पहले और भाग्य से ज़्यादा कभी किसी को कुछ हासिल नहीं हो पाता है? यह मानव जीवन विविधताओं से भरा हुआ है जहाँ व्यक्ति अपनी इच्छानुसार लक्ष्य का चुनाव करता है।उस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु अपने कर्तव्यों का निर्वहन करता है,संघर्ष करता है। चूँकि समाज व्यक्ति का आकलन उसकी सफलता से करता है, कभी-कभी लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होने पर व्यक्ति का निराश होना स्वाभाविक है। ऐसी स्थितियों में सकारात्मक वाक्य प्रेरक का कार्य करते है। जैसे-‘समय से पहले और भाग्य से ज्यादा नहीं मिलता’। यह वाक्य बड़ा ढाढ़स देता है। विचलित होने से रोकता है,आशा का संचार करता है। अपने बहुत लोगों को देखा होगा कि कठिन परिश्रम के बाद भी वो सफल नही हो पाते और एक टाइम आता है जब वो निराश हो जाते हैं, उस वक़्त उन्हें हिम्मत ना हारकर ये सोचना चाहिए कि वक़्त से पहले कुछ नही मिलेगा,अभी तो बारी है सिर्फ धीरज से अपना काम करने की क्योंकि कही ऐसा ना हो कि आपका अच्छा समय भी आये,किस्मत भी अच्छी हो पर तब तक अपने मेहनत करना ही छोड़ दिया हो, उम्मीद ही छोड़ दी हो ।

इसीलिए कहा भी है कर्म करते रहो फल की चिंता मत करो। और कभी भी निराश नही होना चाहिये क्योंकि खराब घडी भी दिन में २ बार सही समय दिखाती है। हर कार्य अपने समय पर ही होता है। हम कितना जोर लगा लें कितनी हिम्मत कर ले इस सर्वभौमिक सत्य को कदापि नहीं बदल सकते हैं। यह संपूर्ण सृष्टि भी एक दिन में नहीं बन गई थी। उसका भी विकास क्रमश हुआ था। हम अपने इस भौतिक जीवन में देखते हैं हैं कि किसान जमीन खोदकर तैयार करता है और उसमें बीज डालता है। समय के अनुरूप बीज अंकुर होता है और तब तक वह एक नन्ही पौधे का रूप ले लेता है समय के साथ पौधा एक विशाल वृक्ष बन जाता है। बीज से बना है विशाल वृक्ष किसी किसान की दिन की रात की अथक परिश्रम और खाद -पानी देने का ही परिणाम होता है। मगर वृक्ष अपने समय पर ही फल देते हैं। वृक्ष का कितना भी सिंचन करें, मेड बनाएं या कितने भी प्रयास करें वृक्ष समय आने पर ही फल देता है। बच्चा पैदा होता युवा नहीं होता। वर्षों माता-पिता उसकी देखते करते हैं। उसे पढ़ा-लिखा कर योग्य बनते समय लगता है इस प्रकृति से गुजरता हुआ एक बच्चा 20-25 साल का युवा बनता है।

सर्वप्रथम बच्चा नर्सरी कक्षा में स्कूल में प्रवेश करता है वो एक ही वर्ष में 12वीं कक्षा पास नहीं करता। बालक 14 साल तक परिश्रम करने के बाद स्कूल पास करता है और फिर कॉलेज में प्रवेश करता है कि जो रात भर में नहीं होता इसी प्रकार उचित समय पर कार्य संपन्न किया जाए तो फलदायक हो सकता है कहा गया है कि समय पर अपने नीतियों को लागू किया जाए तो यह फलदाई होती है जो मनुष्य समय का महत्व समझते हुए उसके अनुसार अपनी योजना बनाते हैं। जीवन में सदा सफलता का मुख देखता है। समय जीवन में बड़ी तबदीली करता है राजा को रंक बनाता है और रंक को राजा बनाता है। दूसरे शब्दों में समय शक्तिशाली को निर्बल और निर्बल को पलक झपकते ही शक्तिशाली बना देता है। समय ने कितनी सभ्यताओं को नष्ट होते हुए इसे देखा है, मनुष्य क्या चीज है इसके सामने?

हम समय से मुंह नहीं मोड़ सकते कि समय हमारा मित्र नहीं है। समय को मित्र बनाना पड़ता है, समय कभी हमारी प्रतीक्षा में पलक पांवड़े बिछाकर नहीं बैठता। हमें ही उसके साथ कदम मिलाकर चलना होता है। समय अपनी गति से दिन-रात बिना विश्राम के चलता है। यह हमारी समझदारी है कि हम उसके सहारे ही जीवन में वह सब कुछ प्राप्त कर सके जिसकी हम कामना करते हैं। यदि मनुष्य समय का मूल्य पहचान ले तो सफलता की सीढ़ियों पर चढने से कोई नहीं रोक सकता। जीवन में हर कदम पर असफ़लता का डर होता है लेकिन हम अपनी सामर्थ्य और शक्ति से समय की रेत पर अपने निशान छोड़ इस दुनिया से विदा ले सकते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मिसाल बन सकते हैं।

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