नेपाल की राजनीतिक उथल-पुथल और भारत-नेपाल संबंधों का भविष्य

नेपाल में सितंबर 2025 में भ्रष्टाचार और रोजगार जैसे मुद्दों पर युवा (जेन ज़ी) प्रदर्शनकारियों ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किए, जो हिंसक हो गए। इन प्रदर्शनों के चलते प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को 9 सितंबर 2025 को इस्तीफा देना पड़ा, संसद भवन को आग लगा दी गई, और कम से कम 22 लोगों की मौत हो गई। यह घटना एक तरह का ‘तख्तापलट’ जैसी लगती है, जहां युवा शक्ति ने सरकार को उखाड़ फेंका, लेकिन यह कोई सैन्य coup नहीं था, बल्कि जन-आंदोलन था। अब सवाल है कि क्या इससे भारत-नेपाल संबंधों में पहले वाली गर्माहट लौट आएगी, और अगर काठमांडू के मेयर बालेंद्र शाह (जिन्हें बालेन शाह भी कहा जाता है) सत्ता संभालते हैं तो क्या होगा?

 

क्या संबंधों में गर्माहट लौटेगी?

 

वर्तमान संदर्भ: भारत और नेपाल के बीच संबंध हमेशा से घनिष्ठ रहे हैं—सांस्कृतिक, आर्थिक और भौगोलिक रूप से। नेपाल का 64% से ज्यादा विदेशी व्यापार भारत से होता है, और 2025 में भारत ने नेपाल को 7 अरब डॉलर से ज्यादा का निर्यात किया। लेकिन हाल के वर्षों में तनाव बढ़ा है, जैसे अगस्त 2025 में भारत ने लिपुलेख व्यापार मार्ग को चीन के साथ बिना नेपाल की सहमति के फिर से खोला, जिसकी नेपाल की संसद ने निंदा की। ओली सरकार चीन-समर्थक मानी जाती थी, लेकिन हाल में भारत ने ओली को दौरा करने का निमंत्रण दिया था, जो संबंध सुधारने की कोशिश थी।
तख्तापलट के बाद संभावनाएं: प्रदर्शन भ्रष्टाचार-विरोधी थे, न कि भारत-विरोधी। अगर नई सरकार भारत-समर्थक पार्टियों (जैसे नेपाली कांग्रेस) की बनेगी, तो संबंध मजबूत हो सकते हैं, जैसा कि 2008 के बाद राजतंत्र खत्म होने पर हुआ था। भारत स्थिति पर नजर रख रहा है और अपने नागरिकों को सतर्क रहने की सलाह दे रहा है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि अगर नेपाल में स्थिरता आएगी, तो आर्थिक सहयोग बढ़ेगा, लेकिन अगर अस्थिरता बनी रही या चीन/अमेरिका का हस्तक्षेप (जैसे बांग्लादेश जैसा) बढ़ा, तो तनाव रह सकता है। कुल मिलाकर, गर्माहट लौटने की संभावना है अगर नई सरकार भारत के साथ सहयोग बढ़ाए, लेकिन यह नेतृत्व पर निर्भर करेगा।

 

अगर बालेंद्र शाह सत्ता संभालें तो क्या होगा?

 

बालेंद्र शाह (35 वर्षीय), एक पूर्व रैपर, स्ट्रक्चरल इंजीनियर और काठमांडू के स्वतंत्र मेयर, प्रदर्शनकारियों के बीच लोकप्रिय हैं। वे भ्रष्टाचार-विरोधी छवि रखते हैं और 2022 में पार्टियों को हराकर मेयर बने। ओली के इस्तीफे के बाद उन्होंने प्रदर्शनकारियों से संयम बरतने की अपील की।

 

संभावित प्रभाव:

 

सकारात्मक पक्ष: शाह ने भारत के कर्नाटक में पढ़ाई की है, जो सांस्कृतिक जुड़ाव दिखाता है। अगर वे प्रधानमंत्री बने, तो युवा-केंद्रित सुधार (जैसे रोजगार, पर्यावरण) पर फोकस कर सकते हैं, जो भारत के साथ आर्थिक सहयोग बढ़ा सकता है। कुछ संपादकीयों में उन्हें ‘नए नेपाल’ का चेहरा माना गया है।
नकारात्मक पक्ष: शाह ने काठमांडू में भारतीय फिल्मों पर प्रतिबंध लगाया था और उनके ऑफिस में ‘ग्रेटर नेपाल’ का नक्शा लगा है, जो भारत के कुछ हिस्सों (जैसे उत्तराखंड, बिहार) पर दावा करता है। इससे भारतीय राष्ट्रवादियों में चिंता है—कुछ X पोस्ट्स में सीमा सील करने और अलगाववाद का आरोप लगाया गया है। अमेरिका के राजदूत से उनकी मुलाकात को भी संदेह की नजर से देखा जा रहा है। अगर वे सत्ता में आए, तो भारत-विरोधी राष्ट्रवाद बढ़ सकता है, व्यापार प्रभावित हो सकता है, और सीमा तनाव (जैसे लिपुलेख) गहरा सकता है। भारत ‘बेल्ट एंड रोड’ जैसी सख्त नीति अपना सकता है।

संभावित परिणाम: शाह के नेतृत्व में नेपाल आंतरिक सुधारों पर फोकस कर सकता है, लेकिन भारत के साथ संबंध ठंडे पड़ सकते हैं अगर राष्ट्रवादी एजेंडा हावी रहा। हालांकि, वे स्वतंत्र हैं, इसलिए व्यावहारिक सहयोग की गुंजाइश बनी रहेगी। अगर वे चीन या अमेरिका की तरफ झुकें, तो भारत को चुनौती मिलेगी।

कुल मिलाकर, तख्तापलट के बाद संबंधों की गर्माहट नई सरकार की नीतियों पर निर्भर करेगी। बालेंद्र शाह जैसे युवा नेता बदलाव ला सकते हैं, लेकिन उनके कुछ कदम भारत के लिए चिंताजनक हैं। स्थिति तेजी से बदल रही है, इसलिए आगे की घटनाओं पर नजर रखनी होगी।5 𝕏 posts28 web pages3.5sHow can Grok help?

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