नालंदाः आजादी के 78 साल बाद अब भी पुल के लिए तरस रहा गांव

 तसले में जान जोखिम में डालकर नदी पार करते हैं ग्रामीण

 
पटना/नालंदा। बिहार के नालंदा ज़िले के तोड़लबिगहा गांव में आज़ादी के 78 साल बाद भी पुल नहीं बना है। यहां के लोग बरसात में नदी पार करने के लिए तसले से बने नाव का इस्तेमाल करते हैं। इस जुगाड़ से बच्चों का स्कूल जाना, बीमारों का इलाज कराना और लोगों का रोज़गार सब बंद हो जाता है। गांव वाले बताते हैं कि चुनाव के वक्त नेता आश्वासन देकर चले जाते हैं, लेकिन जीतने के बाद कोई इस गांव को देखने नहीं आता।
नालंदा ज़िले के बेन प्रखंड के तोड़लबिगहा गांव की तस्वीर आज भी बदहाल है। चार सौ की आबादी वाले इस गांव में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। यहाँ तक कि स्वास्थ्य केंद्र जैसी महत्वपूर्ण सुविधा भी उपलब्ध नहीं है। गाँव के पास से गुज़रने वाली नदी पर पुल न होने के कारण बरसात में लोगों का जीना मुश्किल हो जाता है।
गांव वाले नदी पार करने के लिए तसले से बना नाव इस्तेमाल करते हैं, जिसमे एक बार में सिर्फ़ दो लोग ही सवार हो सकते हैं। थोड़ी सी भी लापरवाही जानलेवा साबित हो सकती है। इस वजह से बरसात के दिनों में बच्चे स्कूल नहीं जा पाते और बीमार व्यक्ति इलाज के लिए अस्पताल नहीं पहुंच पाते।
ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव के समय नेता आते हैं और विकास का वादा कर चले जाते हैं, लेकिन जीतने के बाद कोई भी इस गांव की सुध लेने नहीं आता। गाँव की इस समस्या से अधिकारी भी अनजान नहीं हैं। अकौना पंचायत के मुखिया अभय सिंह कहते हैं कि उनके पास पुल बनाने के लिए पर्याप्त धन नहीं है।
एक अस्थायी पुल बनाने में भी तीस से चालीस हज़ार रुपये का खर्च आता है, जबकि सरकार की तरफ़ से सिर्फ़ सात हज़ार रुपये ही मिलते हैं। बीडीओ हर्ष कुमार का कहना है कि एक महीने पहले ही उन्होंने ज़िला मुख्यालय को पत्र लिखकर पुल निर्माण की मांग की है। उन्होंने ग्रामीणों को भी जल्द से जल्द पुल बनाने का आश्वासन दिया है, लेकिन अभी तक मुख्यालय से कोई अनुमति नहीं मिली है।

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