मेरी बड़ी बहन …

रात के 11:00 बजे है
तू आ गया भाई, ‌ हां जीजी,‌ दाल सब्जी पहले से ही बना रखी है चून उसन रखा है,‌ दो गरम रोटी सेंक दू,‌ ना जीजी मैं तो खा कर आया हूं,‌ झूठ मत बोले, कद‌ का तेरा इंतजार कर रही थी। मैं मना ही करता रहा, ‌ पर वह कहां सुनने वाली थी ‌ थोड़ी देर में ही बड़ी थाली में तीन-चार कटोरियों में दाल साग सब्जी रायता और देसी घी से चुपड़ी हुई रोटी चावल ‌ मेज पर रखकर ‌ कहने लगी अरे पापड़ अचार तो में भूल ही गई लेकर आ रही हूं। भाई तुझे पेठे की मिठाई पसंद है शाम को ही मंगवा ली थी। ना चाहते हुए भी जबरदस्ती कुछ ना कुछ खाना पड़ता था।
मेरी बड़ी बहन जो अब नहीं रही ‌ करनाल में रहती थी, ‌ मैं ‌ अधिकतर‌ रक्षाबंधन से पहली रात्रि को ही वहां पर पहुंचता था। हालांकि रोजमर्रा वह जल्दी ही सो जाती थी‌ परंतु उस दिन‌ मेरी इंतजार में टकटकी लगाएं‌ दरवाजे की ओर देखती हुई जागती ही रहती थी देर रात तक। भाई तू ठीक तो है,,‌ बहुत कमजोर दिख रहा, ‌ तेरी चिंता लगी रहती है।
बहन को कभी इससे कोई सरोकार नहीं रहता था कि मैं किस पद पर हूं, ‌ आर्थिक ‌ स्थिति कैसी है, ‌ केवल और केवल मेरी सेहतमंदी,‌ और बुढ़ापे में तेरी देखभाल कौन करेगा ‌ सवाल ‌ उसके दिमाग में खदबदाते रहते थे। जितनी देर उसके घर पर रहता तो ऐसे लगता की न जाने में कब से भूखा हूं, ‌ तरह-तरह के खाने,‌ फल, ड्राई फ्रूट्स ‌ सामने रखकर खिलाने का प्रयास करती थी। ‌ वापस चलते वक्त जब मैं कुछ रुपए उसको देता तो मना करते हुए कहती भाई तू आ गया इससे बड़े और‌ कौन से रुपए‌ मुझे चाहिए। रूपयों के प्रति‌ उसकी गजब ‌ वितर्शणा थी,‌ कहती थी मेरा तो अब ऊपर जाने का समय आ गया,,‌ यह रुपए मेरे किस काम के। एक दिन मुझे अपने बेटे के साथ ले जाकर ‌ किसी जैन साधु द्वारा करनाल में जीव रक्षा परिसर जहां पर परिंदों के सुरक्षित रहने खाने पीने के टावर आधुनिक तरीके से बनाए गए थे, ‌ लेकर गई, ‌ खुशी होकर दिखाए बेचारे पक्षियों को इसमें ही दाना पानी मिल जाएगा। मेरे भांजे ने इशारा करके एक पत्थर दिखाया ‌ जिस पर दानदाताओं के नाम लिखे हुए थे मेरी बहन ने उसमें₹500000 की राशि दान दी थी जिस पर मेरे जीजा जी का नाम लिखा हुआ था। ‌ एक दिन बहन का टेलीफोन आया कि तुझे जरूर आना है,‌ तेरा भांजा एक गरीब लड़की‌ का कन्यादान करेगा। करनाल में एक सामाजिक संस्था गरीब लड़के लड़कियों की शादी करवाने का आयोजन करती है,‌ जिसमें कोई एक परिवार एक लड़की को अपनी बेटी मानकर उसकी शादी का सारा खर्च दहेज कन्यादान करवाता है। बहन ने कहा भाई इसमें जो करना चाह कर दे।
जैन धर्म ‌ के कठोर नियमों का पालन जिसमें दिन छिपने‌ से पहले‌ तथा अगले दिन सूर्य उदय होने‌, पूजा पाठ करने के बाद ही‌ ‌ पानी, अन्न ग्रहण किया जाता है। रात्रि को इमरजेंसी होने के बावजूद भी पानी तक ग्रहण नहीं किया जाता ‌ मेरी मां और बहन पूर्ण रूप से इसका पालन करती थी। आज उसकी याद आ रही है।

  • राजकुमार जैन
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