मुस्लिम लीग से मुजरा तक मोदी!

मुद्दों से भटका चुनाव

 

अरुण श्रीवास्तव 

कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे… आज अंतिम चरण का मतदान खत्म हो गया गर कुछ खत्म नहीं हुआ है तो वह है चुनाव के बाद वोटरों के मन में पड़ने वाला असर। शायद इसीलिए पूर्व पीएम ने संसद भवन या चुनावी सभा में दिये गए भाषण में कहा था कि सरकारें आएंगी जाएंगी पर देश रहेगा। अब कहने को तो यह भी कहा था कि, राजा को अपने धर्म (राजधर्म) का पालन करना चाहिए पर राजा ने ऐसा नहीं किया हालांकि कि मौजूद राजा ने इसका खंडन किया था। इत्तेफाक है कि अब वह खुद राजा है दूसरों को नसीहत देने के बजाए खुद ही वही वही कर रहा है। अब इसे भ्रम कहें या कुछ और ‘महान व्यक्तियों के पैरों के निशान पद चिन्ह हो जाते हैं। कुछ इसी तरह के भ्रम की बात किसी शायर ने यूं कहीं, तुझसे पहले जो सत्तानशीं उसको भी सत्ता में रहने का उतना ही यकीं था। अगर यकीं न होता तो शायद ही यह कहा जाता कि वे सत्ता में आए तो आपका मंगलसूत्र आपसे छीन कौन उन्हें दे देंगे जो ज्यादा बच्चे पैदा करते हैं, ये सत्ता में आए तो, आपके घर का एक्स रे करवाएंगे। ये आपके बाथरूम की टोंटी तक खोल ले जाएंगे। आरोप है कि जब अखिलेश यादव सीएम पद से हटे थे तो सीएम आवास की टोंटी तक खोल ले गए थे। हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है सो इसकी भी लोग मीम बनाने लगे कि रेलवे शौचालयों की तरह अपने अपने ‘हग्गे’ के मग्गे को जंजीर से बांधने को लेकर चुटकुले बाजी का दौर चला। एक हवाई यात्रा के दौरान तेजस्वी यादव के मछली खाने की फोटो वायरल हुई या करायी गई उसका भी जिक्र पीएम मोदी ने किया, कहा कि ये लोग सावन माह में भी मीट मछली खाते हैं। बंगाली परिवारों में मछली को शुभ प्रतीक मानते हैं पूजा और व्रत में भी खाते हैं इसको शुभ मानते हैं। कहीं कहीं नवविवाहिता से पहली बार मछली बनवाते हैं तो कहीं गर्भवती महिलाओं की गोद में मछली रख दिया जाता है। सो तीर भी निशाने पर नहीं लगा। फिर भी सिलसिला नहीं थमा, अब फैलाने वाले तो थामेंगे नहीं जिनको जिम्मेदारी सौंपी गई वो धृतराष्ट्र बन गए नतीजा सवाल जवाब आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया। विपक्ष का आरोप कि पीएम मंगलसूत्र जो धर्म विशेष की महिलाओं के सुहाग की निशानी है उसे छीनने की बात कर रहे हैं, भैंस खोल ले जाने की बात कर रहे हैं। मंगलसूत्र पर मीम बनने लगे, आलोचनाएं होने लगती तो वे मंदिर रूपी रक्षा कवच ओढ़ लेते कि अगर कांग्रेस सत्ता में आयी तो राम मंदिर में बाबरी ताला लगा देगी।
इसके पहले के चुनावों में नेता एक-दूसरे पर ही आरोप लगाते थे। भाजपाई सोनिया को कांग्रेस की विधवा कहते, राहुल को हाई ब्रीड बछड़ा तो कांग्रेस मोदी को मौत का सौदागर बताती तो राहुल मोदी को चौकीदार नहीं ‘चौकीदार ही चोर’ है प्रचारित करते। चुनावी सभाओं में अमित शाह राहुल को राहुल बाबा तो मोदी जी शहंशाह कहते। पर इस चुनाव में वे महिलाएं भी घसीट ली गईं जिनका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं था और न ही जाति/समुदाय विशेष की थी। पटना में एक चुनावी सभा में विपक्षी दलों को मुजरा करने वाला कहा। मुगलकाल में मुस्लिम समाज की महिलाएं ही इस पेशे से जुड़ी थीं अब मुंबई के बार में हर जाति धर्म की महिलाएं मिल जाएंगी। महिलाओं के प्रति भाजपा और मोदी के रवैए को उजागर कर दिया।
यही नहीं सत्ताधारी दल से जुड़े जन संगठन भी खांचे में बंटे दिखे। मणिपुर व भारत का नाम विश्व में रोशन करने वाली महिला खिलाड़ियों के प्रति बरती गई दरिंदगी पर खामोशी का चादर ओढ़ने वाली भाजपा महिला मोर्चा ने केजरीवाल डूब मरो के नारे के साथ सड़कों पर मोर्चा खोल दिया। मुद्दा बनाया आप नेता स्वाति को।
गौरतलब है कि, उन्नाव, हाथरस और कठुआ की महिला उत्पीड़न की घटनाओं पर सत्तारूढ़ पार्टी के महिला संगठन को ‘सांप सूंघ’ गया था। ध्यान देने वाली बात यह भी है कि इसके राजनीतिक हमले दोतरफा होते थे इस चुनाव में यह चीज देखने को नहीं। कांग्रेस के स्टार प्रचारकों यथा राहुल प्रियंका ने भी किसी भी विरोधी पर एक भी व्यक्तिगत हमला नहीं किया। अमेठी से चुनाव लड़ रहे कांग्रेस के किशोरी लाल वाजपेई ने भी स्मृति ईरानी पर निजी हमले नहीं किए। हां कन्हैया कुमार ने जय शाह के बहाने अमित शाह को जरूर घेरा।
जानकारों का मानना है कि इस तरह के निजी हमलों की शुरुआत पीएम मोदी ने की। पहला हमला उन्होंने कांग्रेस का घोषणापत्र जारी होने के तुरंत बाद किया। एक सभा में कहा कि ये मुस्लिम लीग का घोषणापत्र लग रहा है। अब इसे इत्तेफाक ही कहेंगे कि उनके हर हमले में ‘म’ शब्द जरूर आया है। मंदिर-मस्जिद, मुगल-मुसलमान, मीट-मछली तो आम है मंगलसूत्र और मुजरे ने आग में घी का काम कर दिया तो मेडिटेशन ने भी जगहंसाई ही करायी। ग्लोबलाइजेशन और सेटेलाइट की सुविधा के नाते अब कुछ भी छिपा पाना संभव नहीं।
चुनाव गुज़र गया… उसका गुबार (गर्द) देखते रहे…कब से देख रहे हैं और कब तक देखेंगे पता नहीं।

 

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