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बीवी के नहाने से इनकार करने पर मालगुजार ने खुदवा दिया था तालाब, अब है जल संरक्षण की मिसाल

द न्यूज 15 

रायपुर। प्यार को लेकर तरह-तरह की कहानियां प्रचलित हैं। मुमताज के लिए शाहजहां ने ताजमहल तो बनाया ही था देश में ऐसे कितने उदाहरण हैं कि पत्नी की जिद के सामने कितने पतियों को नतमस्तक होना पड़ा। छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में एक कहानी प्रचलित है कि एक महिला ने प्रतिज्ञा ले ली कि जब तक उसके लिए तालाब नहीं खुदेगा वह नाहेगी नहीं। पति ने किसी तरह से तालाब खुदवाया तब जाकर वह नहायी।

दरअसल छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में एक ऐसा तालाब है जिसे लोग प्यार की निशानी मानते हैं। इस तालाब के बारे में ऐसी धारणा है कि यह तालाब कभी सूखता नहीं है। गांव के लोगों की नजरों में यह तालाब साक्षात जल देवता है। साथ ही जल संरक्षण की मिसाल भी है। लगभग 3 सौ साल पुराने 49 एकड़ में फैले इस तालाब का पानी जितना साफ है, उतनी ही दिलचस्प इसकी कहानी भी है। बताया जाता है कि एक मालगुजार की खूबसूरत पत्नी ने जिद कर दी कि जब तक खुद का तालाब नहीं खुदेगा तब तक वह नाहेगी नहीं। पत्नी की जिद मालगुजार को माननी पड़ी और उसने यह तालाब खुदवाया।दुर्ग जिले के कुम्हारी के पास  ग्राम पंचायत कंडरका है। यह गांव दो हजार की आबादी वाला है। बताया जाता है कि दो सौ साल पहले अंग्रेज जमाने में यहां गुरमीन पाल गडरिया की मालगुजारी थी। धन संपदा भरपूर होने के कारण गुरमीन को गौटिया भी कहा जाता था। गुरमीन अंग्रेजों के लिए लगान वसूलता था। गुरमीत का बनाये गए तालाब से निस्तारी के अलावा लगभग 200 हेक्टेयर खेतों की सिंचाई भी होती थी। इस तालाब की वजह से आसपास के गांवों का वाटर लेबल भी डाउन नहीं होता है। इसके बारे में ऐसी कहानी प्रचलित है कि पानी की पतली धार से तालाब बनाने का रास्ता मिला और मालगुजार ने ग्रामीणों और राजस्थान के गडरियों से तालाब खुदवा दिया। दो महीने की मेहनत से तालाब तैयार हुआ, जिसमें नहाकर मालगुजार की पत्नी ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी की थी।
बताया जाता है कि गुरमीन की पत्नी बहुत खूबसूरत थी। वो नहाने के लिए रोज पास के चेटुवा गांव के तालाब जाया करती थी। एक दिन वह बाल में मिट्टी लगाकर नहाने गई। एक पत्थर पर बैठकर वह नहा रही थी। तभी चेटुवा गांव की महिलाओं ने उसे ताना मार दिया कि इतने बड़े मालगुजार की बीवी के पास नहाने के लिए खुद का तालाब नहीं है। मालगुजार की बीवी नाराज हो गई, उसने प्रतिज्ञा ली कि जब तक खुद का तालाब नहीं खुदेगा, वह बाल नहीं धोएगी। बीवी की प्रतिज्ञा से परेशान गुरमीन ने तालाब के लिए जगह खोजना शुरू किया।
बताया जाता है कि उस समय छत्तीसगढ़ में तब पानी मिलना रेत के ढेर में सुई खोजने के बराबर था। भीषण गर्मी का दिन, गुरमीन समेत गांव के कुछ लोग तालाब के लिए जगह तलाश रहे थे, तभी खबर आई कि गांव का एक भैंस दो दिन से गायब हैं। तालाब के लिए जगह के साथ भैंस की तलाश शुरू हुई। भैस गांव के पूरब दिशा में मिली। कीचड़ से लिपटी हुई। गांव के बाहर एक डीह था, जहां चितावर (लंबी घास) भी था। गांव के लोग समझ गए कि पानी यही है। उस जगह पर कुदाल पड़ते ही पानी की महीन धार फूट पड़ी। ग्रामीण उसे पाताल से निकली धार कहते हैं। इसी धार की वजह से यह तालाब कभी सूखता नहीं है।
बताया जाता है कि जब तालाब खोदने का काम शुरू किया गया। उस वक्त राजस्थान से भेड़ चराने वाले गडरिया बड़ी संख्या में छत्तीसगढ़ आए थे। गौटिया ने सबको काम पर लगा दिया। दो महीने में 49 एकड़ में बड़ा तालाब खुद गया। तब गुरमीन की बीवी ने बाल धोए। गौटिया ने सबको भरपूर पैसे दिए। उसने तालाब के चारों तरफ आम के पेड़ लगवा दिए। तब से यह तालाब जल देवता बन गया। तालाब आज तक नहीं सूखा। पहले लोग इसी का पानी पीते थे। 3 सौ साल पुराना तालाब अब निस्तारी व खेतों की सिंचाई के काम आता है। इसका पानी आज भी बेहद साफ रहता है। इस तालाब के लिए गुरमीन को लोग शिद्दत से याद करते हैं। यह तालाब भीषण अकाल के समय भी नहीं सूखता।

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