सत्ता का प्रवक्ता बनकर रह गया है देश का मीडिया
मीडिया की सबसे बड़ी जिम्मेदारी और जवाबदेही जनता के प्रति
मेन स्ट्रीम मीडिया के सत्ता का प्रवक्ता बन जाने का बहुत बड़ा खामियाजा देश और समाज को भुगतना पड़ रहा है। देश के अधिकतर मीडिया हॉउस पीएम मोदी की महिमामंडित करते रहे। मोदी को दुनिया में भारत का डंका बजाने वाले प्रधानमंत्री बताते रहे। सरकार की खामियों को छिपाकर सरकार के पक्ष में ख़बरें चलाते रहे। सरकार के खिलाफ आवाज उठाने वाले लोगों का साथ देने के बजाय उस आवाज को दबाने का काम करते रहे। मीडिया के इस रुख का असर यह हुआ कि मोदी सरकार काम क़म और हवाबाजी ज्यादा करती रही।
दरअसल यह पूरी तरह से स्पष्ट हो चुका है कि मोदी सरकार राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दोनों स्तर पर फेल साबित हो रही है। विश्व गुरु बनने का दावा करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व्यक्तिगत संबंधों को ज्यादा तवज्जो देने के चक्कर में चीन और अमेरिका के बीच में फंसकर रह गए हैं। विभिन्न मुद्दों को लेकर अमेरिका जहां लगातार मोदी को अपमानित कर रहे है वही टैरिफ भी बढ़ा रहा है। पाक और भारत के बीच सीजफायर कराने का दावा कर भारत को नीचा दिखाने का काम कर रहा है। उधर चीन जहां अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा ठोक रहा है वहीं पाक अधिकृत कश्मीर की शिखगाम घाटी में कॉरिडोर बना रहा है। वह बात दूसरी है कि इन सबके बावजूद हमारे विश्वगुरु चीन की सत्तारूढ़ पार्टी सीपीसी के प्रतिनिधिमंडल को भारत बुला रहे हैं। यह प्रतिनिधिमंडल न केवल बीजेपी के मुख्य कार्यालय में जा रहा है वहीं आरएसएस मुख्यालय में भी आरएसएस के नेताओं से मिल रहा है। यह भी जगजाहिर है कि भारत और पाक युद्ध में चीन खुलकर पाकिस्तान के साथ था।
उधर बांग्लादेश में मारे जा रहे हिन्दुओं को हिन्दू भले ही देश में बवाल मचा रहे हैं पर हिन्दुओं के बल पर राज भोग रही बीजेपी बांग्लादेश को न केवल अडानी से बिजली दिलवा रही है बल्कि सस्ता डीजल भी दे रही है। वह भी भारत में बेचे जा रहे डीजल से भी बहुत कम दाम पर। 50 रुपए प्रति डीजल के हिसाब से। इतना ही नहीं दुनिया के प्रभावशाली देश तो छोड़ ही दीजिये हमारी करेंसी रुपया एशिया के देशों से भी नीचे पहुंच गया है। यह भी जमीनी हकीकत है कि ताकतवर देशों में भी हम कहीं नहीं हैं। भले ही जीडीपी को 8 प्रतिशत बताया जा रहा हो पर यह जीडीपी दुनिया को कहीं भी प्रभावित नहीं कर रही है। इसका प्रमाण यह है कि दूसरे देश के उद्योपति भारत में निवेश करने से बच रहे हैं। इन सबके बावजूद आज भी कई मीडिया मोदी सरकार का डंका पीटने से बाज नहीं आ रहे हैं। टीवी चैनलों पर वे ही डिबेट चलाई जा रही हैं जो सरकार चलवा रही है। वैसे तो मीडिया जगत में एक से बढ़कर एक सरकार के चाटुकार पत्रकार हैं पर रजत शर्मा और सुधीर चौधरी तो इतना स्तर गिराकर काम कर रहे हैं कि इन लोगों को पत्रकार कहते हुए भी शर्म आती है। हां हाल में अर्णव गोस्वामी, स्वेता सिंह, अंजना ओम कश्पय के कुछ कार्यक्रम सरकार को घेरते हुए दिखे हैं। काश देश के सभी पत्रकार अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेशी समझें। सरकार की चाटुकारिता करने में प्रिंट मीडिया भी टीवी चैनलों से कहीं पीछे नहीं रह गए हैं। चाहे अरावली पहाड़ियों का मामला हो, उन्नाव रेप कांड के दोषी कुलदीप सेंगर का मामला हो या फिर उत्तराखंड में अंकिता भंडारी काण्ड सभी मामलों में बीजेपी एक्सपोज हुई है पर सत्तारूढ़ पार्टी पर इसका कोई असर नहीं। देश में जाति और धर्म के नाम पर जो नफरत पैदा की जा रही है इसका समाज पर कितना दुष्प्रभाव पड़ रहा है ? इसकी गंभीरता को कोई समझने को तैयार नहीं। शिक्षण संस्थानों के साथ ही चिकित्सा संस्थानों में व्यभिचार के जो मामले देखने को मिल रहे हैं। इससे किसी कोई मतलब नहीं। जरा जरा सी बात पर सड़कों पर पीट पीटकर लोगों की जो हत्याएं की जा रही हैं। इस माहौल पर कोई चर्चा करने को तैयार नहीं। ऐसा भी नहीं है कि अब मारने पीटने की घटनाएं हिन्दू मुस्लिम में हो रही हैं। देश में ऐसा माहौल बना दिया गया है कहीं पर भी किसी को पीट दिया जा रहा है। मार दिया जा रहा है। रोज तमाम वीडियो वायरल हो रही हैं।
कहना गलत न होगा कि बाढ़ ही फसल को खा रही है। देश और समाज को चलाने का ठेका लिए घूम रही राजनीतिक दलों को भी सत्ता और अपने वोटबैंक की चिंता है। बीजेपी यदि हिन्दू मुस्लिम की राजनीति कर रही है तो विपक्ष में बैठी पार्टियां जातिगत राजनीति से ऊपर उठने को तैयार नहीं। यह सियासतदारों द्वारा बनाए गए माहौल का ही असर है कि जनता भी जाति और धर्म की राजनीति में फंसकर रह गई है। वोट भी जाति और पार्टी को देखकर दिया जा रहा है। जनप्रतिधि भले ही कोई गुंडा, बलात्कारी या लुटेरा बन जाए। कौन है इस माहौल के लिए जिम्मेदार ? यदि मीडिया अपनी जिम्मेदारी निभाता तो ये पार्टियां निरंकुश न होती और अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही को समझते हुए काम करती। कहना गलत न होगा कि इस दूषित माहौल के लिए सबसे बड़ा जिम्मेदार वह मीडिया ही है जिसकी जिम्मेदारी और जवाबदेशी जनता के प्रति है न कि सत्ता की डुगडुगी बजाने की। अब देखने यह है कि क्या स्ट्रीम मीडिया अपनी जिम्मेदारी निभा पाएगा या फिर सत्ता की ऐसी ही चाटुकारिता करता रहेगा ?







