10 डाउनिंग स्ट्रीट से छह हज़ार मील दूर, बंगाल की खाड़ी के किसी छोटे-से गाँव श्रीरामपुर में गंगा के किनारे चारपाई पर लेटा एक दुबला-पतला बूढ़ा आदमी — यही था वह असाधारण आदमी जिसने दुनिया की सबसे ताकतवर साम्राज्य की जड़ें हिला दी थीं। यह कोई साधारण आदमी नहीं अपितु कठोर जीवनशैली वाला कोमल महात्मा था।
वे शारीरिक ताकत के प्रतीक नहीं पर आत्मा में अग्नि थी — एक ऐसी अग्नि, जो बिना हथियार के लड़ती थी। दोपहर के ठीक बारह बजे वे मिट्टी का थैला अपने पेट पर रखते, दूसरे को सिर पर — यह उनका प्राकृतिक उपचार था। पर इस मिट्टी के भीतर छिपी थी वह मौलिक क्रांति, जो हिंसा से नहीं, प्रेम से दुनिया को बदल देना चाहती थी।
गांधी का चेहरा सुंदर नहीं था — झुर्रियों से भरा, गंजा सिर, बड़े कान, झुकी देह। पर उस चेहरे से जो सादगी, ईमानदारी और प्रेम झलकता था, उसने करोड़ो हिंदुस्तानियों का दिल जीत लिया था। उनकी बाल सुलभ मुस्कान में प्रेम और करुणा का धर्म था, पर किसी मज़हबी दीवार का नहीं — मानवता का धर्म। गांधीजी के लिए भारत का अर्थ था — मिट्टी, श्रम और सादगी।
जब पूरी दुनिया बंदूकों और बमों की भाषा बोल रही थी, गांधी ने कहा “मनुष्य का असली हथियार उसका आत्मबल है और असली ताकत खून बहाने में नहीं, धैर्य रखने में है। अनंत धैर्य के प्रतीक थे गांधीजी। चंपारण,खेड़ा, नमक सत्याग्रह, भारत छोड़ो आंदोलन सबमें उनका एक ही संदेश था “हथियार से नहीं, हृदय से लड़ो।” वे पूरी तरह से मौलिक क्रांतिकारी थे । उस कोमल भारतीय महात्मा ने स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ने की एक ऐसी कठोर शैली प्रस्तुत की जिसकी काट ब्रिटिश सरकार अंततः नहीं खोज पायी तथा जिसकी शक्ति और मौलिकता की संपूर्ण विश्व में कोई मिसाल नहीं थी।
गांधी की जिंदगी हमेशा ही अधिक कठिन संघर्ष चुनने की जिंदगी रही है। जब हिंसा की प्रतिष्ठा अपने पूरे चरम पर थी गांधी ने अहिंसा का एक ऐसा हथियार सामने रखा जिसमें मानव जाति के लिए एक नई आशा का सूत्रपात हुआ। मशीनगनों और तोपों का सामना हथियारों से नहीं आत्मबल से करो, बन्दूखों से नहीं प्रार्थनाओं से लड़ो, बमबारी और चीख पुकार से नहीं आत्मबल, खामोशी व धैर्य से लड़ो। उनके इस ऊपरी तौर पर सरल दिखने वाले इस संदेश में एक असीमित शक्ति छिपी हुई थी जिसने भारत जैसे भीड़ भड़क्के वाले देश में बिजली दौड़ा दी।गांधी का संदेश इतना सरल और सहज था कि कमजोर से कमजोर आदमी भी यदि चाहे तो मानवता के शिखर को छू सकता था।
यूरोप में जब तानाशाह गला फाड़ फाड़ कर चिल्ला रहे थे और धू धू कर जलती इमारतें भयावह शोर के साथ धराशाई हो रहीं थीं तब आवादी के बोझ तले इस अजीबोगरीब देश में गांधी एक एक व्यक्ति तक अपना संदेश इतनी शांति के साथ फैला रहे थे कि उन्हें अपना स्वर ऊंचा करने तक की जरूरत तक नहीं पड़ी।
देश में अपने अनुयायियों को एकत्रित करने के लिए उन्हें कोई सब्जबाग दिखाने की जगह कड़ी चेतावनी देते थे ” जो मेरे साथ हैं उन्हें नंगे फर्श पर सोना होगा ,खादी के खुरदरे कपड़े पहनना होंगे, सादा और स्वाद हीन भोजन करना होगा और अपना पाखाना भी स्वयं साफ करना होगा।”
गांधी का संदेश बच्चे, बड़े , बूढ़े और महिलाओं तक सहज रूप में पहुँच जाता था। गांधी अपने पत्र खुद व लांग हेंड में लिखते । कांग्रेस पार्टी का अधिवेशन हो, प्रार्थना सभा हो या सार्वजनिक अवसर हो जो भी बोलते वह देश की आवाज बन जाता था ,आग की तरह फैल जाता। जहां भी पहुंचते लोगों का हुजूम ऐसा जुड़ता मानो भारत की राजधानी उनके साथ चलती थी।
गांधीजी बंगाल के दूरदराज गांवों तक नंगे पांव चलते रहे। जहाँ भय था, वहाँ उन्होंने शांति फैलाई। जहाँ हिंसा थी, वहाँ उन्होंने प्रेम का मरहम लगाया। नोआखाली उनका दूसरा चंपारण था। नोआखाली में जब दंगे भड़क रहे थे, तब गांधी 77 वर्ष के थे। कमजोर शरीर, पर अडिग आत्मा। रास्ते में बांस के पुल काटे गए, दीवारों पर धमकियां लिखी गईं — “आगे बढ़े तो मरोगे।” पर गांधी नहीं रुके। जहाँ रास्ते पर गंदगी फैलाई गई, वहां उन्होंने स्वयं झुककर नारियल के पत्ते से वह विष्ठा साफ की ताकि अहिंसा का रास्ता साफ हो सके। यह केवल सफाई नहीं थी, यह एक आध्यात्मिक प्रायश्चित था उनकी आत्मा का एक संवाद, जो कहता था कि “मनुष्य की गंदगी भी प्रेम से साफ की जा सकती है।”
दुनिया के लिए शक्ति का अर्थ था सेना, हिंसा, शासन। पर गांधी ने उसे उलट दिया ।उनके लिए शक्ति का अर्थ था संयम,करुणा और आत्मबल। उन्होंने उपवास को हथियार बनाया, और उस भूख से ब्रिटिश सिंहासन डोल गया जिसने सदियों से भारत को भूखा रखा था। गांधी का हर कदम एक संदेश था “कष्ट सहो, पर घृणा मत करो।” और इस सहनशीलता ने ब्रिटिश साम्राज्य की दीवारों को भीतर से चटका दिया। उनके जीवन का यह स्नेह और त्याग का आयाम बताता है कि महात्मा केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि मानवता के शिक्षक थे। गरीब भूखे अधनंगे करोड़ों जन उनकी सत्याग्रही सेना थी।
उन्होंने अंग्रेजी साम्राज्य को झकझोर कर रख दिया। गांधी ने भूख का एक हथियार के रूप में उपयोग किया। उस भूख को जिसने आम भारतीय आदमी की पेट और पीठ एक कर दी थी ,आम आदमी की हड्डियां बाहर निकाल दी थीं।वे जहां भी गए जनता उनके पीछे पीछे गयी।जब वे भोजन त्याग देते थे और उपवास पर बैठते तो इंग्लैंड का सिंहासन डोल उठता।
अगस्त 1947 में जब आजादी के केवल 36 घंटे शेष थे, गांधी ने सोदपुर की शांति छोड़कर कलकत्ता की झोंपड़पट्टियों का रुख किया । वह शहर जो हिंसा में डूबा था। वे वहाँ शांति का चमत्कार रचने निकले थे।उनका उद्देश्य अब अंग्रेजों से नहीं, हमारे अपने दिलों से लड़ना था। उन्होंने कहा “हिंदू-मुसलमान की नफरत खत्म करना, भारत की असली आजादी है।”
और सचमुच, जब उनके नंगे पांवों की आहट कलकत्ता की गलियों में गूंजी, तो बंदूकों की आवाज़ थम गई, लोगों के हाथ जुड़े, आँखें नम हो गईं। भारत को गांधी की आवश्यकता उतनी ही थी जितनी आत्मा को शांति की।
गांधीजी का हमेशा यही सपना रहा कि वे एक ऐसे आधुनिक भारत का निर्माण करेंगे जो दुनिया के सामने उनके सामाजिक आदर्शों की जीती जागती मिशाल हो। वे भारत को एक ऐसा देश बनाना चाहते थे जिसके सभी देशों से मित्रवत सम्बन्ध रहें। मानवता को डूबने से बचाने के लिए यह एक समझदार, दूरदर्शी व परिपक्व विचारों वाले व्यक्ति का कल्याणकारी पथ था।







