अर्थव्यवस्था के क्षेत्र की दारुण खबरों और महामारी के खौफ के बीच दीपावली

अनिल जैन
वैसे तो पिछले लंबे समय से अर्थव्यवस्था के क्षेत्र से आ रही सभी खबरें निराश करने वाली ही हैं, लेकिन इन दिनों बेरोजगारी में इजाफे के साथ ही सबसे बड़ी और बुरी खबर यह है कि आम आदमी को महंगाई से राहत मिलने के कोई आसार नहीं दिख रहे हैं। सरकार की नीतियों से अनाज, दाल-दलहन, चीनी, फल, सब्जी, दूध इत्यादि आवश्यक वस्तुओं की कीमतें आसमान छू रही हैं और सरकार खुद भी आए दिन पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाकर और अपनी इस करनी को देश के आर्थिक विकास के लिए जरूरी बता कर आम आदमी के जले पर नमक छिड़कने का काम कर रही है।
बेरोजगारी या काम-धंधा ठप होने की वजह से लोगों के आत्महत्या करने की खबरें भी लगातार आ रही हैं। किसान अपनी खेती के लिए नए कृषि कानूनों को विनाशकारी मानते हुए पिछले एक साल से आंदोलन कर रहे हैं। देश की आर्थिक समृद्धि का सूचक समझे जाने वाले शेयर बाजार में जबरदस्त फर्जीवाड़ा हो रहा है, इसलिए उसके सूचकांक के गिरने-उठने का अब कोई मतलब नहीं रह गया है। विश्व बाजार में भारतीय रुपए की हैसियत लगातार गिरती जा रही है। अंतरराष्ट्रीय हंगर इंडेक्स, हैपीनेस इंडेक्स, पेंशन इंडेक्स आदि इंडेक्स में भी भारत शर्मनाक रूप से नीचे जा चुका है।
इन्हीं दारुण खबरों और कोरोना महामारी की तीसरी लहर के खौफ के बीच पिछले दिनों राष्ट्र के नाम संबोधन में उत्सव प्रेमी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फरमाया है कि देशवासी खूब धूमधाम से दिवाली मनाएं। बाजार की बड़ी ताक़तें, समाज का खाया-अघाया तबका, सामाजिक सरोकारों से पूरी तरह कट कर मुनाफाखोरी की लत का शिकार हो चुका मीडिया और समूचा सत्ता प्रतिष्ठान, सब मिलकर पूरी मक्कारी के साथ माहौल यही बना रहे हैं कि देश में सब कुछ सामान्य है। इसीलिए धूमधाम से दिवाली मनाने को कहा जा रहा है।
दिवाली का पर्व अमावस्या को मनाया जाता है और इस मौके पर रात में दीये जलाए जाते हैं। इससे यह प्रतीक बेहद लोकप्रिय हो गया है कि यह अंधकार पर प्रकाश की और असत्य पर सत्य की विजय का पर्व है। इस प्रतीकवाद की पुष्टि के लिए ही संस्कृत की उक्ति ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ पेश की जाती है। यह एक ऐसा प्रतीकवाद है, जो आधुनिक भारतीय चित्त को बहुत भाता है, क्योंकि इससे उसका राष्ट्रीय और सामाजिक गौरव बढ़ता है।
ज्यादा सच तो यह आख्यान प्रतीत होता है कि चौदह वर्ष का वनवास काटने और लंका पर विजय प्राप्त करने के बाद राम के अयोध्या लौटने पर अयोध्यावासियों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया था और खुशियां मनाई थीं। तभी से दिवाली मनाने की परंपरा शुरू हुई। इस लिहाज से यह सुशासन कायम होने का उत्सव है। भारत में सुशासन की कल्पना राम-राज्य से जुड़ी रही है। लेकिन हमारे देश ने इतने लंबे समय तक सुशासन ही नहीं, शासन का भी ऐसा नितांत अभाव देखा है कि राम-राज्य की कसक उसके अंतर्मन में बैठ गई है।
वैसे, दिवाली खास तौर पर लक्ष्मी की पूजा-आराधना का पर्व ही माना जाता है। लक्ष्मी यानी धन-धान्य और ऐश्वर्य की देवी। इस आधार पर हमारा देश जितना आध्यात्मिक है उतना ही भौतिकवादी भी। हम ज्ञान के साथ-साथ ही समृद्धि की भी उपासना करते आए हैं, क्योंकि हमें अपने परलोक को ही नहीं, इहलोक को भी सुंदर और सफल बनाना है।
लक्ष्मी भगवान विष्णु की पत्नी हैं। हमारे धर्म-शास्त्रों में विष्णु को इस सृष्टि का सूत्रधार माना गया है। वे ही सृष्टि का संचालन और पालन-पोषण करते हैं। जाहिर है कि इस दायित्व का निर्वाह वह अकेले नहीं कर सकते। इसमें उन्हें अपनी पत्नी लक्ष्मी का सहयोग चाहिए। इन पौराणिक प्रतीकों के माध्यम से हमारे शास्त्र-रचयिता ऋषियों-मनीषियों ने संभवत: यह संदेश देना चाहा हो कि हमें धन की उपासना तो अवश्य करनी चाहिए लेकिन वह उपासना इस तरह हो, जैसे पूजा की जा रही हो। अर्थात भौतिकता के साथ पवित्रता का भाव भी जुड़ा हुआ हो।
अनैतिक साधनों से अर्जित किया गया धन जीवन में अभिशाप ही पैदा करता है। इसकी पुष्टि हमारे देश के मौजूदा हालात को देखकर भी होती है। देश ने विदेशी दासता से आजाद होते ही धन की उपासना शुरू कर दी थी। देसी शासकों ने देशवासियों को सुखी और समृद्ध बनाने के लिए तरह-तरह के यत्नशुरू किए। पंचवर्षीय योजनाएं बनाई जाने लगीं। बड़े-बड़े कल-कारखाने लगाए गए। जीवनदायिनी नदियों का प्रवाह रोक कर या मोड़ कर बड़े-बड़े बांध बनाए गए।
हरित क्रांति के जरिए देश खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बना। आर्थिक असमानता दूर करने के लिए जहां जमींदारी प्रथा खत्म की गई तो वहीं सामाजिक गैरबराबरी खत्म करने के लिए दलितों, आदिवासियों और अन्य पिछड़े वर्गों को विशेष अवसर दिए गए। स्पष्ट तौर पर यह उपासना समाजवादी संपन्नता की थी। लेकिन चूंकि इस संपन्नता के लिए अपनाए गए तौर-तरीके कतई समाजवादी नहीं थे, इसलिए गरीबी के विशाल हिन्द महासागर में समृद्धि के कुछ टापू ही उभर पाए।
देश में पिछले तीन दशक से यानी जब से नव उदारीकृत आर्थिक नीतियां लागू हुई हैं, तब से सरकारों की ओर से आए दिन आंकड़ों की हेराफ़ेरी के सहारे देश की अर्थव्यवस्था की गुलाबी तसवीर पेश की जा रही है। आर्थिक विकास के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं। देश की आबादी के एक बड़े हिस्से को भरपेट भोजन तक मयस्सर नहीं है। हमारे लगभग आधे बच्चे कुपोषित हैं। वैश्विक भूख सूचकांक में भारत का स्थान 116 देशों में 101 वां है। लेकिन इसके बावजूद ढींगे हांकी जा रही हैं कि भारत तेजी से दुनिया की आर्थिक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है।
संयुक्त राष्ट्र के ‘वैश्विक प्रसन्नता सूचकांक-2021’ में भारत का 139वां स्थान है। 149 देशों में भारत का स्थान इतना नीचे है, जितना कि अफ्रीका के कुछ बेहद पिछड़े देशों का है। हैरान करने वाली बात यह है कि इस सूचकांक में चीन जैसा सबसे बड़ी आबादी वाला देश ही नहीं बल्कि पाकिस्तान, चीन, भूटान, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका और म्यांमार जैसे छोटे-छोटे पड़ोसी देश भी खुशहाली के मामले में भारत से ऊपर हैं। यह रिपोर्ट इस हकीकत को भी साफ तौर पर रेखांकित करती है कि केवल आर्थिक समृद्धि ही किसी समाज में खुशहाली नहीं ला सकती।
भारतीय आर्थिक दर्शन और जीवन पद्धति के सर्वथा प्रतिकूल ‘पूंजी ही जीवन का अभीष्ट है’ के अमूर्त दर्शन पर आधारित नव उदारीकरण की अर्थव्यवस्था को लागू हुए ढाई दशक से भी ज्यादा समय बीत चुका है और तब से लेकर आज तक हम एकाग्रभाव से बाजारवाद की ही पूजा-अर्चना कर रहे हैं। लक्ष्मी अब लोक की देवी नहीं, बल्कि ग्लोबल प्रतिमा बन गई हैं। उसकी पूजा में अब लोक-जीवन को संपन्न बनाने की इच्छा कम और खुद को समृद्ध बनाने की लालसा ज्यादा व्यक्त की जाती है।
डिजायनों और ब्रांडों के बोलबाले ने मिट्टी की लक्ष्मी प्रतिमाओं और कुम्हार के कलाकार हाथों से ढले दीयों को भी डिजायनर बना दिया है। डिजायनर दीयों के साथ ही ब्रांडेड मोमबत्तियां और मोम के दीयों का भी चलन बढ़ गया है। पारंपरिक मिठाइयों की जगह अब ब्रांडेड मिठाइयों और मुनाफाखोर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के चॉकलेटों ने ले ली है।
दिवाली पर उपहारों और मिठाइयों के आदान-प्रदान का चलन पुराना है लेकिन पहले उनमें गहरी आत्मीयता होती थी। अब जिन महंगे उपहारों और मिठाइयों का लेन-देन होता है उनमें से आत्मीयता और मिठास का पूरी तरह लोप हो गया है और उनकी जगह ले ली है दिखावे और स्वार्थ ने। यानी अब राजनीति के साथ-साथ हमारी संस्कृति और सामाजिकता भी बाजार के रंग में रंग गई है। दीपावली, दुर्गापूजा, गणेश चतुर्थी, कृष्ण जन्माष्टमी समेत हमारी लोक-संस्कृति से जुड़े तमाम त्योहारों, पर्वो और यहां तक कि महिलाओं द्बारा किए जाने वाले करवा चौथ और हरतालिका तीज जैसे व्रतों को भुनाने में भी बाजार अब पीछे नहीं रहता।
निस्संदेह बाजारवाद से देश में समृद्धि का एक नया वातावरण निर्मित हुआ है। महानगरों में एक बड़े वर्ग के बीच हमेशा उत्सव का माहौल रहता है। लेकिन उनके इस उत्सव में न तो बहुत ज्यादा सामाजिकता और परस्पर आत्मीयता होती है और न ही इसके पीछे किसी प्रकार की कलात्मकता। उसमें जो कुछ होता है, उसे भोग-विलास या आमोद-प्रमोद का फूहड़ और बेकाबू वातावरण ही कह सकते हैं। यह सब कुछ अगर एक छोटे से तबके तक ही सीमित रहता तो, कोई खास हर्ज नहीं था।
लेकिन मुश्किल तो यह है कि ‘यथा राजा-तथा प्रजा’ की तर्ज पर ये ही मूल्य हमारे राष्ट्रीय जीवन पर हावी हो रहे हैं। जो लोग आर्थिक रूप से कमजोर हैं या जिनकी आमदनी सीमित है, उनके लिए बैंकों ने ‘ऋणं कृत्वा, घृतम्‌पीवेत’ की तर्ज पर क्रेडिट कार्डों और कर्ज के जाल बिछा कर अपने खजाने खोल रखे हैं।
लोग इन महंगी ब्याज दरों वाले कर्ज और क्रेडिट कार्डों की मदद से सुख-सुविधा के आधुनिक साधन खरीद रहे हैं। विभिन्न कंपनियों के शोरूमों से निकलकर रोजाना सड़कों पर आ रहीं लगभग पांच हजार कारों और शान-ओ-शौकत की तमाम वस्तुओं की दुकानों और शॉपिग मॉल्स पर लगने वाली भीड़ देखकर भी इस वाचाल स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है।
कुल मिलाकर हर तरफ लालसा का तांडव ही ज्यादा दिखाई पड़ रहा है। तृप्त हो चुकी लालसा से अतृप्त लालसा ज्यादा खतरनाक होती है। देशभर में बढ़ रहे अपराधों-खासकर यौन अपराधों की वजह यही है। यह अकारण नहीं है कि देश के उन्हीं इलाकों में अपराधों का ग्राफ सबसे नीचे है, जिन्हें बाजारवाद ज्यादा स्पर्श नहीं कर पाया है।
यह सब कहने का आशय विपन्नता का महिमा-मंडन करना कतई नहीं है, बल्कि यह अनैतिक समृद्धि की रचनात्मक आलोचना है। हालांकि यह और बात है कि ऐसी आलोचना करने वालों को मौजूदा सरकार और सत्तारुढ़ पार्टी आमतौर पर देशद्रोही करार दे देती है।

Related Posts

दिल्ली जंतर मंतर पर युवाओं के आंदोलन में कहां थी एबीवीपी और झारखंड में कहां है एनएसयूआई ?
  • TN15TN15
  • August 11, 2026

युवाओं नहीं बल्कि अपनी अपनी पार्टियों के लिए…

Continue reading
1942 से लेकर आज तक दिल्ली के सोशलिस्टों की ‌ 9 अगस्त को भागीदारी का इतिहास!
  • TN15TN15
  • August 10, 2026

प्रोफेसर राजकुमार जैन दिल्ली के सोशलिस्ट बड़ी शिद्दत…

Continue reading

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You Missed

सार्थक जीवन की कुँजी है आत्मज्ञान : आचार्य प्रशांत

  • By TN15
  • August 13, 2026
सार्थक जीवन की कुँजी है आत्मज्ञान : आचार्य प्रशांत

वैभव सूर्यवंशी को कैसे आउट करें? हरभजन सिंह ने बताया मास्टरप्लान

  • By TN15
  • August 13, 2026
वैभव सूर्यवंशी को कैसे आउट करें? हरभजन सिंह ने बताया मास्टरप्लान

‘जिन्ना का असली वारिस कोई है तो वो…’, राहुल गांधी पर भड़के निशिकांत दुबे

  • By TN15
  • August 13, 2026
‘जिन्ना का असली वारिस कोई है तो वो…’, राहुल गांधी पर भड़के निशिकांत दुबे

बागपत: चाय में दिया जहर, मंदिर में दफनाकर लगा दी टाइल्स! पुजारी ने किया 2 दोस्तों का कत्ल?

  • By TN15
  • August 13, 2026
बागपत: चाय में दिया जहर, मंदिर में दफनाकर लगा दी टाइल्स! पुजारी ने किया 2 दोस्तों का कत्ल?

बांग्लादेश की छाती के पास से दौड़ेंगी भारतीय ट्रेन, चिकन नेक कॉरिडोर से चौथी रेलवे लाइन को भी मंजूरी

  • By TN15
  • August 13, 2026
बांग्लादेश की छाती के पास से दौड़ेंगी भारतीय ट्रेन, चिकन नेक कॉरिडोर से चौथी रेलवे लाइन को भी मंजूरी

UP में महिलाओं को पैसे बांटेगी BJP? डिंपल यादव बोलीं- ‘बिहार, महाराष्ट्र में देखा…’

  • By TN15
  • August 13, 2026
UP में महिलाओं को पैसे बांटेगी BJP? डिंपल यादव बोलीं- ‘बिहार, महाराष्ट्र में देखा…’